प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥ माया का प्रभाव - गरुण जी कोई साधारण नहीं है… Read More
यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।। माया का परिवार-संतो द्वारा सुन्दर व्याख्या माया अकेली नहीं है इसके परिवार… Read More
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥ माया जड़ है जैसे कुल्हाड़ी स्वयं कुछ नहीं कर… Read More
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।। लक्ष्मणजी के वचनों में ही क्या, उनके हृदय में, उनके आचरण… Read More
जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहि प्रीती । जिसे हम जानते ही नहीं, उससे प्रेम कैसे… Read More
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर। विभीषण की शरणागति के माध्यम से गोस्वामी जी- ने मनुष्य को ईश्वर की… Read More
गहि सरनागति राम की भवसागर की नाव। सभी युगों में शरणागति की महिमा भारी है सारे वेद, बेदान्त, रामायण, गीता… Read More
परहित,वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर। साधु का स्वभाव परोपकारी होता है, जैसे वृक्ष कभी अपना फल… Read More
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करऊँ दुराऊ॥ राम जी नारद से हे मुनि! यहाँ प्रभु ने… Read More
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥ श्री रामजी भाई लक्ष्मण से बोले- सहज सुभाऊ' अर्थात् उनका मन… Read More