प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥
इस संसार मे जो भी दिखाई दे रहा है सब माया के आधीन है और यह मायापति की लीला है किंतु जो संत है ( सर्वोच्च गुण, कर्म, स्वभाव) से परिपूर्ण उनके वाणी, कर्म ,स्वभाव मे ईश्वर का वास होता है यह सब हरि की माया है।
यह प्राप्ति पूर्व जन्म के कर्मानुसार प्राप्त होती है और सत्संग से इस पर कुंदन सी चमक आती है!
नारद जी का वैराग्य देखिये माया ने सौ योजन सुन्दर नगर बनाया वह उनको मोहित ना कर सका, रति सामान सुन्दर स्त्री बनाई उनको भी देख कर वो मोहित ना हुए, सेकड़ो इंद्र के सामान वैभव विलास रचा उसको भी देख कर नारद का मन ना डिगा, ऐसा परम वैराग्य था पर विश्वमोहनी का सौन्दर्य ऐसा था कि वे मुग्ध हो गए वैराग्य ना रहा टकटकी लगाय देखते रहने से वैराग्य चला गया। विश्वमोहिनी नाम की एक (ऐसी रूपवती) कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मीजी भी मोहित हो जाएँ, वह सब गुणों की खान भगवान की माया ही थी। उसकी शोभा का वर्णन कैसे किया जा सकता है। (बड़ी=देर,समय) देखि रूप मुनि बिरति बिसारी अतः बिरति (वैराग्य) की इच्छा ना रह गई वैराग्य को भूल कर बड़ी देर तक देखते रह गए अथार्त मोह को प्राप्त हो गए। रूप ऐसा है की जो देखे मोहित हो जाय श्री जी तक मोहित हो जाय।
तब नारद कैसे ना मोह को प्राप्त होते ? (बिमोह=मतिभ्रम,भ्रम)
(सूत्र) देखने के लिए मानस में मना नहीं किया है पर निहारने अर्थात एक टक देखने में दोष है यही दोष नारद जी को ले डूबा। (भगवान की) माया के वशीभूत हुए मुनि ऐसे (मूढ़=मूर्ख) हो गए कि वे भगवान की अगूढ़ (स्पष्ट) वाणी को भी न समझ सके। ऋषिराज नारद तुरंत वहाँ गए जहाँ स्वयंवर की भूमि बनाई गई थी। (रिषिराई=ऋषिराज नारद)
शिवजी कहते- हे पार्वती ब्रह्माजी मन में विचार करने लगे कि कवि, कोविद और ज्ञानी सभी माया के वश हैं। भगवान की माया का प्रभाव असीम है, जिसने मुझ तक को अनेकों बार नचाया है। (कोबिद=पंडित, विद्वान, ज्ञानवान,प्रबुद्ध) (ग्याता=ज्ञानी) (बिपुल= अधिक,पर्याप्त,विशाल)
ब्रह्माजी कहते है – यह सारा चराचर जगत् तो मेरा रचा हुआ है। जब मैं ही मायावश नाचने लगता हूँ, तब गरुड़ को मोह होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तदनन्तर ब्रह्माजी सुंदर वाणी बोले- श्री रामजी की महिमा को महादेवजी जानते हैं। (अग= अचल,वक्र गतिवाला) (जगमय= सारा चराचर जगत्)
माया से बचाव छुटकारा
माया के आकर्षण से निकलना तो तब हो जब हमें बुरा लगे माया जादूगरनी की ऐसी आकर्षण वृत्ति है जो वो रचती है सब का सब प्रिय लगता है जिससे आपको घृणा होती है वही दूसरे अपना जीवन समझ रहा है हमें किसी भी वस्तु ,व्यक्ति ,स्थान का आकर्षण हमें भगवत विस्मरण ना करा पावे या किसी भी प्रकार का मान अपमान , लाभ हानि, निंदा इस्तुति, हमें अपने मार्ग से विचलित न कर पावे तब समझना चाहिए माया का प्रभाव पड़ना आप पर कम हो रहा है और यह तभी संभव होगा जब प्रभु की कृपा होगी कोई ये ना सोचे कि में माया से मुक्त हूँ जब तक सोच है तभी तक माया है शिव जी जीवन मुक्त है पर मोहनी रूप देख कर भाग पड़े ,ब्रह्मा जी समस्त ज्ञान शिरोमणि भी भी इस माया के प्रभाव से नहीं बच सके जब जब जीव को भगवत विस्मरण हुआ कि माया जाल में फसे। अतः हमेशा भगवत स्मरण चिंतन करें।
प्रभु कृपा के बिना माया से निवृत्ति संभव ही नहीं है।
प्रभु कृपा कब होगी? जब आपका भाव
जब मन वचन कर्म से सम्पूर्ण शरणागति होगी।
उपरोक्त भाव होने पर भगवान ने स्वयं कहा है में उसकी सुरक्षा बच्चे की तरह करता हूँ इस तरह जीव माया से निवृत होता है।
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