परहित,वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।
वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं और सरोवर(तालाब)भी अपना पानी स्वयं नहीं पीते है। इसी तरह अच्छे और सज्जन व्यक्ति वो हैं जो दूसरों के कार्य के लिए संपत्ति को संचित करते हैं।
मैथिलीशरण गुप्त ने तो अपना स्वार्थ साधने वाले मनुष्य को पशु कहा है।
काकभुशुण्डिजी ने कहा हे गरुड़जी मन,वचन और शरीर से परोपकार करना, यह तो संतों का सहज स्वभाव है।
वचन मन काया मन वाणी और कर्म का एक रंग होना संत का लक्षण है अगर मन वाणी और कर्म में भेद है तो यह कुटिलता है। (तुलसी जी कृत वैराग्य-संदीपनी)
संत सहज सुभाउ भाव यह कि संत पैदा होते है! संत बनाये नहीं जाते जो गर्भ ज्ञानी है ,पूर्ण काम है। जिनका जन्म किसी पूर्व जन्म के संस्कार शेष रहने के कारण हुआ। ऐसे व्यक्ति ही वचन मन कर्म से परोपकार करने की योग्यता रखते है। और वे ही संत है जो पहले द्रोही रहे और बाद में सत्संग द्वारा जिनकी बुद्धि सुधर गई और परोपकार रत हुए वे सब के संत सामान है। प्रभु राम ने स्वयं कहा –
भूर्ज तरू भोज पत्र का पेड़ यह हिमालय क्षेत्र में उगने वाला एक वृक्ष है। जो 4500 से14000 फ़ीट की ऊँचाई तक उगता है। यह बहुपयोगी वृक्ष है इसका छाल सफेद रंग की होती है जो प्राचीन काल से ग्रंथों की रचना के लिये उपयोग में आती थी। दरअसल,भोजपत्र भोज नाम के वृक्ष की छाल का नाम है, पत्ते का नहीं। इस वृक्ष की छाल ही सर्दियों में पतली-पतली परतों के रूप में निकलती हैं, जिन्हे मुख्य रूप से कागज की तरह इस्तेमाल किया जाता था।
तांत्रिक लोग इसे पवित्र मानते है और इस पर प्रायः यंत्र मन्त्र लिखते है पहले लोग इसको वस्त्र की जगह पहनते थे। और इससे मकान भी छाते थे, संत दूसरों की भलाई के लिए दुख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुख पहुँचाने के लिए दुख सहते हैं । कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं। अर्थात अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं। (भूर्ज तरू=भोज के वृक्ष)
संत दुख क्यों सहते है?
शंकर जी ने भी संत की महिमा कही हे उमा! संत की यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करने पर भी (बुराई करने वाले की) भलाई ही करते हैं। विभीषणजी ने भी रावण से कहा आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया, परंतु हे नाथ! आपका भला श्री रामजी को भजने में ही है।
क्योकि विभीषणजी संत है।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। विभीषण यही कहता है आपका हित रामजी के भजन से ही होगा! विभीषण जी पिछले जन्म में भी धरमरुचि नामक मंत्री के रूप में रावण के परम हितेषी थे। यथाः राजा का हित करने वाला और शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान धर्मरुचि नामक उसका मंत्री था।
गरुड़जी प्रेमसहित वचन बोले= हे भुशुण्डि जी
हे भुशुण्डि जी आप पूर्ण काम (जिनको किसी प्रकार की कामना नहीं रह गई सर्व कामना पूर्ण) आपको तो यह आशीर्वाद भी है।
यदि किसी को कोई भी कामना है तो वह राम अनुरागी नहीं हो सकता! जिन रामजी का स्मरण करने से ही भक्तजन तमाम भोग-विलास को तिनके के समान त्याग देते हैं, उन रामजी की प्रिय पत्नी और जगत की माता सीताजी के लिए यह (भोग-विलास का त्याग) कुछ भी आश्चर्य नहीं है।
जबकि सन का पौधा काट कर पानी में सड़ाया जाता है फिर पटक पटक कर धोया जाता है। फिर उसकी खाल निकली जाती है, फिर उसका रेशा अलग अलग कर बटा जाता है तब वह रस्सी बनकर दूसरो को बांधने में समर्थ होता है। ऐसे ही खल अपनी दुर्दशा सह कर भी दूसरो के काम बिगाड़ते है।
हे सर्पो के शत्रु गरुण जी सुनिए,खल बिना स्वार्थ के ही सर्प और मूसे के सामान दूसरो का अपकार करते है। दूसरे की संपत्ति का नाश करके स्वयं भी ऐसे नष्ट हो जाते है। (अपकार=अहित उपकार का उल्टा) (इव= जैसे)
तुलसी ने कहा:- छिद्र का अर्थ छेद भी है और छिद्र का अर्थ दोष भी है। कपास पक्ष में उसका अर्थ इन्द्रिया का छिद्र होगा और साथु पक्ष में ‘दोष’ अर्थ होगा। साधु नाना यातनाएँ सहकर भी दूसरे के दोषो पर परदा डालते है! कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढँकता है। उसी प्रकार संत स्वयं दुख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों) को ढँकता है , जिसके कारण उसने जगत में वंदनीय यश प्राप्त किया है। (निरस= जिसमें रस न हो, रसहीन, बेस्वाद) (बिसद= स्वच्छ, निर्मल, उज्ज्वल)
क्योंकि साधु का जीवन तथा उनके कर्म परोपकार के लिये ही होते हैं।
यही विचार कामदेव ने देवताओं से कहा (संतत=सदा, निरंतर, बराबर,लगातार)
कामदेव ने मन में विचार किया कि शिव से वैर करना कल्याण से वैर करना है! अतः अकल्याण छोड़ और क्या हो सकता है? पर वेदों में परोपकार को ही परम धर्म बतलाया है।
कामदेव ने देवताओं से कहा अभी तक तो वीरों में मेरी गिनती रही, वीरों में ही प्रशंसा होती रही पर संत समाज मेरी प्रशंसा नहीं करते है। पर अब मेरी परोपकारियों में प्रशंसा होगी। आज तक मेरी गिनती (षडरिपु=मानव के छह विकार, काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह एवं मत्सर)में होती रही है, संत समाज मेरी निंदा करते रहे, पर अब परोपकार के लिये शरीर छोड़ने से संत समाज में भी मेरी प्रशंसा सदा होगी।
खल और दुष्ट दूसरे का काम बिगाड़ने के लिये अपना शरीर तक छोड़ देते हे। जेसे ओले खेती का नाश करके स्वयं भी गल जाते है, सन्त दूसरे के काज के लिये,और अकाज की रक्षा में, अपना शरीर तक छोड़ देते हें। जैसे गीधराज जटायु ने किया। उसी के विपरीत खल और दुष्ट पर अकाज अर्थात दूसरों के नुकसान के लिये अपना तन त्याग देते हैँ जैसे कालनेमि, मारीच ने किया, अपने शरीर की भी परवाह नहीं करते है। वे पराई संपत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते। (हिमउपल =बर्फ का,ओले) (परिहरहीं= परिहरना= छोड़ देना,त्याग देना) (दलि=दलकर, नाश करके)
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