मानस चिंतन,जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहि प्रीती ।
जानने से विस्वास फिर प्रीति अंत में भक्ति सुग्रीव जी पर चरितार्थ होती है।
कबीर दास जी कहते हैं, प्रेम खेत में नहीं उपजता, प्रेम बाज़ार में भी नहीं बिकता, चाहे कोई राजा हो या साधारण प्रजा, यदि प्यार पाना चाहते हैं तो वह आत्म बलिदान से ही मिलेगा। त्याग और समर्पण के बिना प्रेम को नहीं पाया जा सकता। प्रेम गहन-सघन भावना है,प्रेम कोई खरीदी या बेचे जाने वाली वस्तु नहीं।
जिसको ईश्वर प्रेम और भक्ति पाना है उसे अपना शीश (काम, क्रोध, भय, इच्छा) को त्यागना होगा। लालची इंसान अपना शीश (काम, क्रोध, भय, इच्छा) तो त्याग नहीं सकता लेकिन प्रेम पाने की उम्मीद रखता है।
जब तक मेरा ‘मैं’ अर्थात अहंकार रहता है तब तक हरि ( ब्रह्म) का साक्षात्कार नहीं होता। ब्रह्म और जीव के बीच जो अंतर दिखाई देता है वह माया के आवरण अर्थात ‘मैं’ के कारण ही होता है।
मीराबाई कलयुग की एक ऐसी संत हैं, जिसने अपना सब कुछ कृष्ण के लिए अर्पण किया। मीरा का कृष्ण प्रेम ऐसा था कि वह कृष्ण को अपना पति मान बैठी थीं। महराज भक्ति की ऐसी चरम अवस्था कम ही देखने को मिलती है।
रहीम के वाक्य हमें कभी भी खीरे जैसी प्रीति न कीजिए। ऐसी दिखावटी प्रीति का कोई लाभ ही नहीं होता जिसमें आदमी एक दूसरे से जड़ें काटते हो।
प्रेम वास्तव में बाहर की चीज होती भी नहीं, वह तो हृदय से ही होता है और प्रेम हृदय से ही किया जाता है। जो बाहर आता है, वह तो प्रेम का बाहरी ढाँचा होता है, हनुमानजी भगवान श्रीराम का संदेश श्री सीताजी को इस प्रकार सुनाते है।
(तत्त्व=सार) (प्रेमतत्त्व=प्रेम का रहस्य,मर्म)
श्रीराम का संदेश अलौकिक प्रेम के तत्त्व को मैं हो जानता हूँ, संसार उससे अपरिचित है, अतः संसार उसे नहीं समझ सकता।
शिवजी कहते हैं-हे उमा!अनेकों प्रकार के योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करने पर भी श्री रामचंद्रजी वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेम होने पर करते हैं। परमात्मा की प्राप्ति एकमात्र मार्ग है परम प्रेम, परम प्रेम और परम प्रेम है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग है ही नहीं। बिना प्रेम के राम (परमात्मा) की प्राप्ति नहीं होती चाहे कितना भी योग जप तप कर लिया जाये।
(तसि= वैसी,उस प्रकार की) (निष्केवल= विशुंद्ध,पूर्ण शुद्ध)
यही बाबा तुलसी ने कहा-
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