श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ,प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन, सरन सुखद रघुबीर॥
विभीषण जी ने किससे सुना?
हे नाथ मुझे हनुमान जी ने अपना स्वयं का निजी अनुभव बताया कि आप सब प्रकार से समर्थ है, प्रभु को सेवक से कोई अपेक्षा नहीं है सेवक पर बिना कारण
के ममता और प्रीति करना तो आपका सहज स्वभाव है। (अपेक्षा= चाह ,आशा)
और प्रीति को एक रस निभाना अत्यंत कठिन है पर मेरे प्रभु आदि से अंत तक निभाते है। (सूत्र) महाराज संसार में प्रेम क्षणभंगुर है,इस संसार में प्रेम स्वार्थ पर टिका हुआ।और जैसे ही स्वार्थ समाप्त होता है,वैसे ही प्रेम भी समाप्त हो जाता है। (सरिस= समान, तुल्य) (बिलोचन= नयन, लोचन, नेत्र)
प्रीति को एक रस अर्थात एक समान निभाने वाले तो केवल और केवल भगवान ही है।
हे श्री रघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करने वाला नहीं है। ऐसा विचार कर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुख का हरण कर लीजिए। (विषम= विकट)
सुग्रीव ने विभीषण के राक्षस होने के कारण इच्छानुसार रूप बदलने वाला तथा मायावी होने, और सेना का भेद लेने वाला बताकर विभीषण को बाँधकर रखने का परामर्श दिया,पर राम ने कहा कि हे मित्र तुमने नीति तो अच्छी बतायी है परन्तु मेरा (प्रण-संकल्प) तो शरणागत के भय को हराना है। सुग्रीव के वचनों का खंडन प्रभु बड़े माधुर्य के साथ कर रहे है जिस से वे उदास ना हो क्योकि वे सखा है सुग्रीव ने अपनी मति के अनकूल हित कहा है जैसे सखा का धर्म वैसा ही हित बात विचार कर कही सुग्रीव के विचार को प्रभु नीक कहते है। (नीक=उत्तम)
हे सुग्रीव तुम्हरी राय अच्छी है निति के अनुरूप है इसके बाद प्रभु सुग्रीव को सरनागति धर्म समझाते है रामजी ने कहा मेरा प्रण तो सरनागत के भय को दूर करना है।
रामजी ने कहा- हे मित्र! मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना। यह सुनकर हनुमान हर्षित हुए (और मन ही मन कहने लगे कि) भगवान कैसे शरणागतवत्सल (शरण में आए हुए पर पिता की भाँति प्रेम करने वाले) है। “सरनागत वत्सल” का भाव है कि जैसे नई व्याही गाय अपने बछड़े की गंदगी को स्वयं जीभ से चाटकर शुद्ध कर देती है और अपने बच्चे के पीछे अति स्नेह से दौड़ती है और उसकी देखभाल करती है वैसे ही भगवान अपने भक्तों के दोषों को दूर कर देते है। (बच्छल= वत्सल) (पन= प्रण, प्रतिज्ञा)
रामजी ने कहा- जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। शरणागत के त्याग करने वाले का तो में मुख ही नहीं देखता,पर जिसे अनगिनत ब्रह्म हत्याये भी लगी हो उसे भी शरण में ले लेता हूँ जो शरणागत की रक्षा नहीं करता वे तो पाप मय हो जाते है। सनमुख होइ जीव= से जनाया कि शरणागति भगवान को अत्यंत प्रिय है।राम ने सुग्रीव से कहा-जो मनुष्य निर्मल मन (हृदय) का होता है,वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल छिद्र नहीं भाते।
और पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता। क्योंकि पाप प्रेम का वाधक है और प्रेम बिना भजन नहीं होता।
रामजी बोले- जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आए हुए का त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) हैं,वे पापमय हैं, उन्हें देखने में भी हानि होती है अर्थात पाप लगता है। भगवान ने सर्व तीर्थ पति समुद्र के तट पर सभी के सामने कहा की यदि कोई एक बार दीन होकर कहता है कि में आपका हूँ तो में उसको समस्त प्राणियों से में अभय कर देता हूँ यह मेरा व्रत अर्थात प्रण है। (सूत्र) चाहे संसार का भय हो, चाहे शत्रु का भय हो, चाहे पाप का भय, हो सबसे अभय तो सबका स्वामी अर्थात रामजी ही करेंगे। निज अनहित अनुमानि।कह कर जनाया की अपना अहित भी होता हो तो भी शरणागत का त्याग नहीं करना चाहिए।
(बिलोकत= बिलोकना=देखना)
क्योकि
हे सुग्रीव यदि कोई लोक या परलोक के भय से शरण में आये तो उसकी प्राणों के सामान सुरक्षा करूँगा सरनागत पालन में राम अदुतीय अर्थात रामजी का कोई मुकाबला नहीं है।
पर निशाचर वध में श्री लक्ष्मण जी अदुतीय है,सुग्रीव यदि तुम शत्रु या युद्ध कि सोचते हो तो हे सखा मुझको कुछ भी नहीं करना पड़ेगा, हम तो लीला करते है लक्ष्मण जी का अवतार तो निसाचरो के नाश के लिए ही हुआ है। शेषनाग भगवान की सर्पवत आकृति विशेष होती है। सारी सृष्टि के विनाश के पश्चात भी ये बचे रहते हैं, इसीलिए इनका नाम शेष हैं। सर्पाकार होने से इनके नाम से नाग विशेषण जुड़ा हुआ है। शेषनाग स्वर्ण पर्वत पर रहते हैं। शेष नाग के हज़ार मस्तक हैं। वे नील वस्त्र धारण करते हैं तथा समस्त देवी-देवताओं से पूजित हैं। उस पर्वत पर तीन शाखाओं वाला सोने का एक ताल वृक्ष है जो महाप्रभु की ध्वजा का काम करता है। रात्रि के समय आकाश में जो वक्राकृति आकाश गंगा दिखाई पड़ती है और जो क्रमश: दिशा परिवर्तन करती रहती है, यह निखिल अर्थात समस्त ब्रह्मांडों को अपने में समेटे हुए हैं। उसकी अनेक शाखाएँ दिखाई पड़ती हैं। वह सर्पाकृति होती है। इसी को शेषनाग कहा गया है। पुराणों तथा काव्यों में शेष का वर्ण श्वेत कहा गया है। आकाश गंगा श्वेत होती ही है। यहाँ ‘ऊँ’ की आकृति में विश्व ब्रह्मांड को घेरती है। ‘ऊँ’ को ब्रह्म कहा गया है। वही शेषनाग है।यहाँ भगवान ऐश्वर्या (ईश्वरता) दिखाते है कि भगवान का आँख बंद करना प्रलय है और पलक खोलना सृष्टि का विस्तार होता है। (निमिष महुँ= अर्थात इच्छा मात्र से) (निखिल= अखिल, संपूर्ण,सारा,समस्त)
शरणागति का फल-
जिस लंका के अतुलनीय वैभव को शिव जी ने रावण को दसो सिर स्वयं काटकर अर्पण करने पर दिए, उसी को राम जी विभीषण को संकोच के साथ देते हैं।महाराज लोग थोड़ा सा दान कर समाचार पत्रों में ढिंढोरा पिटते हैं कि मैंने इतना दिया लेकिन राम जी स्वयं जगत पिता होकर संकोच करते हैं, कि मैंने कुछ नहीं दिया। अक्सर संसार में लेने वाले को संतोष नहीं होता लेकिन जगत पिता राम जी को भक्त को लंका जैसे राज्य को देने में संतोष नहीं होता बल्कि संकोच होता है कि मैंने इसे बहुत कम दिया। (सूत्र) विभिषण की भक्ति, नीति व ईश्वर प्रेम के आगे रावण को शिव द्वारा प्रदान की गई संपदा विभिषण को देने में राम को तुच्छ लगी।
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ,प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन, सरन सुखद रघुबीर॥
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