सरल,जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करऊँ दुराऊ॥
इसी तरह विभीषणजी से भी रामजी ने अपना स्वभाव कहा है।
पर जीव शरण में किस तरह से आये? उसका तरीका भी रामजी ने स्वयं बताया है।
श्रीराम कहते हैं (जननी=माता) (जनक=पिता) (बंधु=भाई) (सुत=पुत्र) (दारा= स्त्री) (तनु=शरीर) (धनु=धन) (भवन=घर) (सुह्रद=मित्र) और (परिवारा= परिवार) इन दस बातों को मुझ से जोड़ दो। सब के ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बांध देता है यानी सारे सांसारिक संबंधों का केंद्र मुझे बना लेता है, अर्थात मेरे प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है। जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है। ऐसे भक्त मेरे हृदय में बसते है,जिस
प्रकार लोभी के हृदय में धन बसा करता है। तुम–सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। (सूत्र) भगवान का सीधा संदेश है कि मेरे लिए कुछ छोडऩे की जरूरत नहीं है, और तुमसे कुछ छूट भी नहीं सकता अतः श्रीराम कहते हैं जरूरत है तो केवल और केवल मुझ से जुडऩे की।
अतः में दुष्टों को मारने के लिए जन्म नहीं लेता में तो तुम्हारे जैसे संतो के लिए ही जन्म लेता हूँ।
भरतजी, शंकरजी ने भी रामजी का कुछ न कुछ स्वभाव कहा हैं।
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