माया,मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥
जीव का अनेक जन्मों से माया का सम्बन्ध है। उसका स्वरूप जानने में उसकी रुचि रहती है। जन्म-मरण-आदि का भी कारण माया ही है में ओर मेरा आ जाने पर ही दूसरों के प्रति भेद बुद्धि होना अनिवार्य है। अतः मैं और मोर के बाद तू ओर तेरा भाव स्वतः ही आ जाता है।मैं, मेरा, तू, तेरा की भ्रान्तिपूर्ण धारणा ही माया है, जो सभी जीवों को भरमाए रखती है। यही में और मोर! ही सभी अनर्थो की जड़ है।
(सूत्र) माया में हम तभी तक फसे है जब तक माया को अपनी समझे बैठे है माया तो (माया पति= भगवान) की है जब माया आपकी है ही नहीं तो माया जिसकी है उसी को सौप दो आप माया से मुक्त हो जाओगे। पर साहिब यह इतना भी आसान नहीं है। (निशा=रात, रात्रि)
में और मोर को ही मोह निशा कहा है।स्वयं लछ्मण जी ने निषाद राज से भी कहा
कालनेमि राक्षस ने भी रावण से यही कहा
माया का कार्य क्षेत्र क्या है? आपका मन जहाँ तक जाता है जो कुछ आप सोचते है, वह माया है। तब प्रश्न होता हैं कि भगवान में भी तो मन लगता है। तब तो वह भी तो माया हुई इसी से कहते हैं. कि माया दो प्रकार की है। विद्या माया यह माया जीव में दिव्य गुण उत्पन्न करती है, भगवान में मन लगने पर वह निरंतर भजन करता है। और निरंतर भगवान का संयोग चाहता है, तब भगवान प्रेम पूर्वक वह पूर्ण बुद्धि देते है जिससे वह प्रभु को प्राप्त हो जाता है। (गो=इन्द्रियां ,बुद्धि) (गोचर= विचरना,रमना )
वेद शास्त्र कहते है कि संसार भगवान और माया दोनों के मिलन से बना है कबीर दास जी द्वारा सुन्दर व्याख्या-
रामजी ने स्वयं कहा
मंदोदरी ने रावण से रामजी की महिमा में कहा भगवान का हँसना भी माया है।
और प्रत्येक जीव भी तो ईश्वर का अंश है में मेरा तू तेरा के कारण इस माया में लिप्त है।
हे जीव! जब से तुम भगवान से अलग हुआ तभी से तुमने शरीर को अपना घर मान लिया।
मैं अरु मोर तोर तैं माया। से कोई बचा भी नहीं।
भरत जी माया में फसे नहीं इसका कारण भरत जी का अपना कुछ है ही नहीं जो कुछ भी है वह सब राम जी का है चित्रकूट जाते समय और प्रयाग राज से यही कहा।
प्रयाग राज से भरत जी ने यही कहा। (निरबान= मुक्ति) (आन= मर्यादा, शपथ, सौगंध) (रति= प्रेम, आसक्ति, प्रीति, अनुराग)
क्योकि भरत जी के जीवन का आधार तो राम जी के चरणों में है। (अनुदिन=प्रतिदिन)
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