इंद्र का पुत्र बालि का विवाह वानर वैद्यराज सुषेण की पुत्री तारा के साथ सम्पन्न हुआ था। एक कथा के अनुसार समुद्र मन्थन के दौरान चौदह मणियों में से एक अप्सराएँ थीं। उन्हीं अप्सराओं में से एक तारा थी। बालि और सुषेण दोनों मन्थन में देवता गण की मदद कर रहे थे। जब उन्होंने तारा को देखा तो दोनों में उसे पत्नी बनाने की होड़ लगी। वालि तारा के दाहिनी तरफ़ तथा सुषेण उसके बायीं तरफ़ खड़े हो गये। तब विष्णु ने फ़ैसला सुनाया कि विवाह के समय कन्या के दाहिनी तरफ़ उसका होने वाला पति तथा बायीं तरफ़ कन्यादान करने वाला पिता होता है। अतः बालि तारा का पति तथा सुषेण उसका पिता घोषित किये गये।
बालि प्रभु को लेकर अत्यंत भ्रम की स्थिति में था। इधर सुग्रीव के मन की अवस्था भी लगभग वैसी ही थी। उसमें भी राम के प्रति अडिग विश्वास का अभाव था। तभी तो सुग्रीव राम की परीक्षा तक ले लेता है।उनसे ताड़ के पेड़ कटवाता है व दुदुंभि राक्षस के पिंजर तक उठवाता है। केवल राम जी के प्रति ही नहीं अपितु सुग्रीव तो बालि के प्रति भी भ्रम की स्थिति में है। वह बालि को कभी अपने परम शत्रु के रूप में देखता है और कभी अपने क्षणिक वैराग्य के कारण माया रचित कोई लीला का अंश मानता है। अर्थात सुग्रीव सिर्फ भ्रम नहीं अपितु महा भ्रम की स्थिति में है।
बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।।
प्रभु ने जब देखा कि सुग्रीव और बालि दोनों ही भ्रम की स्थिति में हैं तो निष्कर्ष यही था कि भ्रम का भ्रम से कभी युद्ध हो ही नहीं सकता। केवल मिलन होता है। ठीक वैसे जैसे अंधकार और अंधकार का मिलन स्वाभाविक है। लेकिन युद्ध की बात हो तो युद्ध अंधकार और प्रकाश के मध्य होता है। बालि अंधकार है और सुग्रीव प्रकाश, तो युद्ध होना निश्चित ही था। लेकिन यहाँ तो वह दोनों भाई ही अंधकार व भ्रम के रूप में एक जैसे हैं। ऐसे में भला मैं किसे मारूँ और किसे छोडूँ। इस स्थिति में हमने भी आपके इस भ्रम−भ्रम के खेल में शामिल होने का मन बना लिया। और कह दिया कि हमें भी भ्रम हो गया।
वाल्मीकि जी के वचन-दोनों वीर समान थे। अश्विनीकुमारों के समान उनमें कुछ भी भेद न जान पड़ता था। अलंकार, वेष, शरीर की उँचाई लम्बाई चौड़ाई इत्यादि और चाल से तुम दोनों समान हो। स्वर, तेज, दृष्टि, पराक्रम ओर वाक्यों से दोनों में भेद न जान पड़ा। इसी रूप-सादश्य से मोहित होकर मैंने शत्रुनिहंता वाण नहीं छोड़ा। वीर कवि जी बालि को परमहित कहा था, इसी से न मारा पुनः, (भ्रम=करुणा) को भी कहते हैं इससे यह अर्थ हुआ कि श्री राम जी ने विचारा कि कि यदि वालि भी सुग्रीव ऐसा अनुरागी हो जाता तो बच जाता। तुमको तो मेरा विस्वास सप्त ताल वेधन से हो गया पर वालि ने भी मुझे समदर्शी कहा हैं । अतएवं शरणागत के भ्रम से नहीं मारा! प्रभु तो शत्रु मित्र भाव रहित सबसे एक रस हैं !(ख) बालि ने समदर्शी कहा और सुग्रीव ने भी उसे परमहित कहा। (अतएव यदि बालि को मारते तो संभव था कि सुग्रीव कहता कि उसको व्यर्थ मारा,उससे तो मेरा वेर भाव नहीं रह गया था) इस विचार से दोनों को एकरूप कहा।
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ।।
सुनो सुग्रीव तुम्हारा भ्रम (तुम दोनों ही भ्रम की अवस्था में थे)
हे रघुवीर! सुनिए,बालि महान बलवान और अत्यंत रणधीर है। फिर सुग्रीव ने रामजी को दुंदुभि राक्षस की हड्डियाँ व ताल के वृक्ष दिखलाए। रघुनाथजी ने उन्हें बिना ही परिश्रम के (आसानी से) ढहा दिया।
श्री रामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गई और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालि का वध अवश्य करेंगे। वे बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे। प्रभु को पहचान कर सुग्रीव मन में हर्षित हो रहे थे। (परतीती= किसी बात या विषय के संबंध में होने वाला दृढ़ निश्चय या विश्वास,यकीन) (अलोल= अचंचल, इच्छा या तृष्णा से रहित) (लोल= चंचल) (अलोल= शांत) (रनधीरा= युद्ध में धैर्यपूर्वक लड़नेवाला)
राम जी ने कहा हे सखा सुग्रीव तुम्हारा भ्रम तो ये सब देख कर भी दूर नहीं हुआ पर तुम्हारा भाई बाली का भ्रम तो मुझे बिना देखे ही अपनी पत्नी से बोल रहा है!
दूसरे, कोई शरणागति का चिन्ह भी सुग्रीव को ना दिया था जिससे बालि जान लेता कि सुग्रीव रामाश्रित हो चुका है,अब भागवतापराध अब प्रभु न क्षमा करेंगे। अब सुग्रीव ने उसे काल कहा है,अतःअब मारेगे!
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