उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।
उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।
निज धर्म- अपना साधु धर्म, वेद सम्मत धर्म ,अपने गुरु का किया हुआ उपदेश धर्म यथाः जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने (वर्णाश्रम के) धर्म, श्रुतियों से उत्पन्न (वेदविहित) एवं बहुत से शुभ कर्म जैसे , ज्ञान, दया, दम (इंद्रियनिग्रह), तीर्थस्नान आदि जहाँ तक वेद और संत जनों ने धर्म कहे हैं उनको करें।(इंद्रियनिग्रह= इंद्रियदमन= इच्छाओं को वश में रखना)
वशिष्ठ जी
वशिष्ठ जी हे प्रभो!अनेक तंत्र,वेद और पुराणों के पढ़ने और सुनने का सर्वोत्तम फल एक ही है और अन्य सभी साधनों का भी यही एक सुंदर फल है, कि आपके चरणकमलों में सदा-सर्वदा प्रेम हो।
ईश्वर को पाने के लिए सच्ची श्रद्धा, अनन्य भक्ति, पूर्ण विश्वास एवं गहरी आस्था होनी चाहिए, तभी प्रभु के दर्शन हो सकते हैं। तुलसीदास जी ने कहा है।
1 जिसकी जैसी दृष्टि होती है, उसे वैसी ही मूरत नज़र आती है।
2 मात्र ग्रहणता की बात है कि आप क्या ग्रहण करते हैं, गुण या अवगुण?
3 दुनिया में ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जो पूरी तरह सर्व गुण संपन्न हो या पूरी तरह गुण हीन हो. एक न एक गुण या अवगुण सभी में होते है।
4 जिनकी गुण ग्रहण की प्रकृति है, वे हज़ार अवगुण होने पर भी गुण देख लेते हैं! और जिनकी निंदा-आलोचना करने की आदत हो गई है, दोष ढूंढने की आदत पड़ गई है, वे हज़ारों गुण होने पर भी एक न एक दोष ढूंढ ही लेते है।
तन मन वचन तीनो से स्नेह होना ही है सच्चा स्नेह कहलाता है! भावना के कारण ही मनुष्य पत्थरों मे प्रभु का दर्शन करता है और मन को आनंदित करता है किंतु विपरीत सोच के लोग केवल पत्थर ही समझते है।
सत्य प्रेम ही विस्वास का मूल मंत्र है।
श्री रामचंद्जी शबरी से बोले- मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझ में दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है।सबसे पहले ये ध्यान रखें कि मंत्र आस्था से जुड़ा है और यदि आपका मन इन मंत्रों को स्वीकार करता है तभी इसका जाप करें। मंत्र जप करते समय शांत चित्त रहने का प्रयास करें। ईश्वर और स्वयं पर विश्वास आवश्यक है।
मंत्र शब्द का निर्माण मन से हुआ है। मन के द्वारा और मन के लिए। मन के द्वारा यानी मनन करके और मन के लिए यानी ‘मननेन त्रायते इति मन्त्रः’ जो मनन करने पर त्राण यानी लक्ष्य पूर्ति कर दे, उसे मन्त्र कहते हैं।हे सती जब रामजी के चरणों में विश्वास उत्पन्न होता है, तब मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र को पार कर जाता है।
पार्वती सप्तऋषि से कहा- मैं नारदजी के वचनों को नहीं छोड़ूँगी, चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। (सूत्र) जिसको गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्न में भी प्राप्त नहीं होती माता पार्वती का गुरु के वचनों में इतना दृंढ विश्वास के कारण ही माता पार्वती एक निष्ट भक्ति की आचर्य भी है।
मीरा ने भी कृष्ण में इतना ही विश्वास किया।
रामजी ने स्वयं कहा यह सोच जिस किसी भी जीव की है तो मैं इसी गुण के कारण उस जीव के वश में रहता हूँ।
पर मेरा दास कहला कर यदि कोई मनुष्यों से आशा करता है, तो उसका क्या विश्वास है? (अर्थात उसकी मुझ पर आस्था बहुत ही निर्बल है)
जीव न किसी से वैर करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे। उसके लिए सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं। जो कोई भी आरंभ (फल की इच्छा से कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घर में ममता नहीं है) जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो (भक्ति करने में) निपुण और विज्ञानवान है। (अनारंभ=आरंभ का अभाव, फल की इच्छा से कर्म नहीं करता) (अनिकेत =बेघर) (अमानी= निरभिमान,मानहीन) (अनघ=पुण्य,पापहीन) (बिग्यानी =अध्यात्म संबंधी अनुभव,आत्मा का अनुभव,जैसे आत्मा ज्ञान)
सीता जी ने राम जी एवं सुमन्त्र से कहा- मेरे पिता का घर भी, जो सब प्रकार के सुखों का भंडार है,सुखों का समुद्र है पर वह घर भी पति के बिना मेरे मन को भूलकर भी नहीं भाता संसार का कोई भी सुख श्री रघुनाथजी के चरण कमलों की रज के बिना मुझे स्वप्न में भी सुखदायक नहीं लगते। (सुखनिधान= शांति का खजाना) (पदम= कमल)
रामजी ने नारदजी से कहा- हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्ष के साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं। (सहरोसा= हर्ष)
बालि ने तारा से कहा- हे भीरु! (डरपोक) प्रिये! सुनो, श्री रघुनाथजी समदर्शी हैं। जो कदाचित् वे मुझे मारेंगे तो मैं सनाथ हो जाऊँगा। (परमपद पा जाऊँगा) (भीरु=डरा हुआ, कायर, डरपोक) (समदरसी=वह जो सभी को समान दृष्टि से देखता हो,न्यायप्रिय)
तुलसीदास जी ने कहा जैसे चातक की नजर एक ही जगह पर होती है, ऐसे ही हे प्रभु! हमारी दृष्टि तुम पर हो। भगवान पर भरोसा करोगे तो क्या शरीर बीमार नहीं होगा,क्या शरीर बूढा नहीं होगा, मरेगा नहीं? अरे भाई! जब शरीर पर, परिस्थितियों पर भरोसा करोगे तो जल्दी बूढ़ा होगा, जल्दी अशांत होगा, अकाल भी मर सकता है। भगवान पर भरोसा करोगे तब भी बूढ़ा होगा, मरेगा लेकिन भरोसा जिसका है देर-सवेर उससे मिलकर मुक्त हो जाओगे और भरोसा नश्वर पर है तो बार-बार नाश होते जाओगे। पतंगे का विश्वास अर्थात भरोसा दीप ज्योति के मजे पर है तो उसे क्या मिलता है? परिणाम जल मरता है।(चातक= पपीहा पक्षी)
शिवजी ने पार्वतीजी से कहा जो मनुष्य विश्वास मानकर यह कथा निरंतर सुनते हैं, वे बिना ही परिश्रम उस दुर्लभ हरि भक्ति को प्राप्त कर लेते हैं।
उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।
तुलसीदास जी ने कहा जिनके पास श्रद्धा रूपी राह-खर्च नहीं है संतों का साथ नहीं है,उनके लिये यह मानस अत्यन्त अगम है।अर्थात् श्रद्धा सत्संग और भगवत्प्रेम के बिना कोई इसको पा नहीं सकता। (अगम= दुर्गम)
तुलसीदास जी विपत्ति के समय आपको ये सात गुण बचायेंगे-आपका ज्ञान या शिक्षा, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने की आदत और ईश्वर में विश्वास।
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