प्रार्थना,सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार अन्त:करण चतुष्टय कहलाते हैं। ये चारो हमारे ह्रदय में वास करते है।
किसी भी बात को सुनने के लिए मन का वहाँ रहना,मन का उसमें लगना आवश्यक है। इसीलिए रामजी ने मन लगाने की बात कही। सुनने के बाद मनन आवश्यक है और यह काम बुद्धि का है। जो सुना है उस पर विचार न किया जाय तो वह तत्काल भूल जायगा। अपनी बुद्धि से,अपने तर्को से उस पर विचार करना मनन है। यही बुद्धि को लगाना है। इससे सुनी बात स्मरण होती है और उसकी उपयोगिता समझ में आ जाती है। श्रवण-मनन की सफलता है चित्त में बैठना। पर इसमें एक शर्त है कि श्रवण और मनन अहंकार शून्य होकर करे।
और महाराज सादर सुनना तो तभी संभव होगा जब उसमे श्रद्धा हो प्रभु की कथा औषधि है,श्रद्धा उसका अनुपान है।
आयुर्वेद के अनुसार-जब औषधि का सेवन अनुपान के साथ ही किया जाता है, तब वह औषधि हमारे शरीर को लाभ पहुंचाती है जैसे–
जैसे शहद कफ रोगों में औषधि का अनुपान माना जाता है।
घी पित्त या मानसिक रोगों में औषधि का अनुपान माना जाता है।
गाय का दूध शरीर को पुष्ट करने वाली औषधियों का अनुपान माना जाता है।
जल सामान्य रोगों में औषधि का अनुपान माना जाता है। इस प्रकार आयुर्वेद के इलाज में कहा गया है कि औषधि अकेले नहीं, बल्कि उचित मात्रा, उचित समय और उचित अनुपान (किसके साथ लेना शहद, घी, गाय का दूध, जल) सही अनुपान के साथ लेने पर ही औषधि पूरा असर दिखाती है।
जिस प्रकार औषधि का अनुपान शहद, घी, गाय का दूध, जल है। ठीक उसी प्रकार भक्ति का अनुपान शुद्ध श्रद्धा है।
इस तरह से अनुपान औषधि को शरीर के उचित स्थान तक ले जाकर औषधि के गुणों को सक्रिय करती है। यदि अनुपान सही नहीं है,तो औषधि का पूरा प्रभाव नहीं दिखता।
ठीक उसी तरह यदि कोई व्यक्ति केवल अनुष्ठान साधन करता है लेकिन श्रद्धा नहीं है, तब अनुष्ठान का प्रभाव आधा-अधूरा रह सकता है। परंतु जब श्रद्धा अखंड होती है, तब वही श्रद्धा अनुष्ठान साधन में छोटी मोटी गलती होने पर भी भक्त को परम पिता परमात्मा से जोड़ देती है।और मनोरथ पूरा होगा इसमें किसी को संसय नहीं होना चाहिए।
संतो ने कहा भी है।बाबा तुलसी ने श्रद्धा का दर्शन कराया है।
बाबा तुलसी ने माँ सबरी के प्रसंग में रामजी के माध्यम से श्रद्धा का दर्शन भी कराया।
इसी परंपरा को मानस के सभी वक्ताओं ने अपने अपने श्रोताओं को कथा को सुनने का तरीका बताया।अपनी मन बुद्धि और चित्त को लगा कर प्रभु के चरित्र को सुनना चाहिए।
सन्त (बुध= पंडित, संत, सज्जन) कथा को इस तरह से कहते और सुनते भी हैं।जैसे मधुकर अर्थात भौंरा फूलों का रस लेते समय यह विचार नहीं करता की फूल तालाब, नदी, वन, वाटिका और बाग अथवा किसी मैली जगह का हैं।,या किसी साफ सुथरी जगह का हैं। भौंरा फूलों के रंग, रूप या जाति का विचार नहीं करता। भौंरा, काँटा, पत्ती आदि को छोड़ केवल फूल के रस को ग्रहण करता है उसे तो गन्ध और रस से ही काम है। उसका उद्देश्य तो रस का सेवन करना है।(मधुकर= भौंरा) (सरिस= समान, तुल्य, सदृश) (बुध= पंडित, संत, सज्जन)
प्रभु की कथा तो किसी जाति, वर्ग,ऊँच-नीच, धनी-निर्धन कोई भी क्यों न हो, सभी को सुलभ है।
संस्कृत में “मानस” (मन से उत्पन्न) + सरोवर अर्थात झील मानसरोवर का अर्थ है भगवान ब्रह्मा के मन से उत्पन्न झील।इस झील में डूँबने से मृत्य निश्चित है। मानसरोवर यह भगवान ब्रह्मा के मन से उत्पन्न मानी जाती है। मानसरोवर झील सिंधु, ब्रह्मपुत्र, सतलुज और करनाली जैसी नदियों का उद्गम स्थल भी है।
मानस-सर के रक्षक मुनि और देवता हैं और देवता एवं मुनि ही मानस-सर में स्नान और पान के अधिकारी हैं।
पर राम चरित मानस में मानस सरोवर,का अर्थ है मन का सरोवर, या मन को शांति देने वाला सरोवर और इस सरोवर में अपने मन को डूबने से आनंद अर्थात राम की प्राप्ति निश्चित है। राम का एक नाम आनंद भी है।
राम चरित मानस में दो बातें अधिकारी होने के लिये जरूरी बतायीं-पहली सदा सुनना और दूसरी सादर सुनना। सुनना स्नान है, सदा सुनना सदा स्नान करना है।
मनुस्मृति के अनुसार अमावस्या, प्रतिपदा चतुर्दशी और पूर्णिमा ये चार दिन (अनध्याय =अवकाश) के माने जाते है। इन चारो दिनों में पठन-पाठन को छोड़ कर उपासना, दान, तप, और धार्मिक अनुष्ठान पितृ-तर्पण या व्रत को करना चाहिए।
पर इस घोर कलिकाल जब हमारे पास समय का आभाव है और महाराज समय के आभाव का बहुत ही सुन्दर बहना भी है।इस समस्या से निपटने के किये बाबा तुलसी ने सुन्दर सन्देश दिया। प्रभु के चरित्र को सदा सुनना और सादर सुनना।पर हमारे अंदर यह भावना नहीं होनी चाहिए कि इसे कई बार सुन चुके हैं। महाराज कथा का रस तो रोज सुनने से ही मिलेगा। (अनध्याय =अवकाश)
आदर के साथ जो नर और नारी नियम पूर्वक नित्य सुनते है वे उसी भांति राम चरित के अधिकारी हो जाते है जैसे देवता मानस सरोवर के अधिकारी होते है यहां सुनने वाले का पद वक्ता से बड़ा है प्रायः यह देखा गया है कथा का वक्ता चाहे कितना भी विद्वान क्यों न हो, यदि श्रोता में वक्ता के प्रति रुचि नहीं है, तो उसकी वाणी में प्रभाव नहीं रहता। परंतु जब श्रोता श्रद्धा और रुचि से सुनता है, तो वक्ता का मन भी प्रफुल्लित होता है उसकी वाणी में माधुर्य और दिव्यता अपने आप उतर आती है।
इसी को वक्ता और श्रोता का परस्पर सहयोग कहा जाता है। सादर शब्द बाबा तुलसी ने मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनना, सादर शब्द उत्तम श्रोताओं के लिये कहा है।
जैसे राम जी ने कहा –सुनहु तात मति मन चित लाईं।
नर नारी’ कथा के अधिकारी स्त्री-पुरुष सभी हैं, जाति, वर्ण या स्त्री पुरुष का कोई भेद वा नियम नहीं है।
हे पार्वती मानस तीर्थ है।और तीर्थ में स्नान आदरपूर्वक करना चाहिये तभी फलदायी होता है।
आदरपूर्वक स्नान करने का परिणाम अर्थात फल -मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥ महा घोर त्रयताप न जरई॥
बाबा तुलसी ने सुजन का दर्शन कराया है।
जो लोग केवल भौतिक सुखों के उपायों में लगे रहते हैं
जो मूर्ख हैं (आध्यात्मिक विवेक से रहित)
जो स्त्रीवश हैं (इन्द्रियासक्त हैं, विषयवासनाओं के दास हैं)
जो सूम हैं (दुष्ट स्वभाव वाले)
जो शठ हैं (कपटपूर्ण)
जो अभिमानी हैं (अहंकार में डूबे हुए)
जो क्रोधी हैं (क्षमा से रहित)
और जो असाधु हैं (सज्जनता से दूर हैं)
इन गुणों वाले लोग (श्रोता) सुजन नहीं कहलाते, इनको कथा सुहाती भी नहीं है।
यग्वालिक जी ने भारद्वाज जी से कहा
हे तात में जानता हूँ कि आपको राम जी की प्रभुता का ज्ञान है और तुम मन वचन और कर्म से राम भक्त हो पर तुम्हारा प्रश्न चतुरता पूर्वक है तुम राम जी के रहस्य मय गुणों को सुनना चाहते हो तुम अब आदर सहित मन लगा कर कथा को सुनो राम कथा भयंकर अग्यान रूपी महिषासुर का अंत करने वाली भयंकर कालिका अर्थात दुर्गा है। (कालिका =दुर्गा)
और जब याज्ञवल्क्य जी ने भरद्वाज मुनि को दूसरी वार सावधान करने का कारण यह है कि नारद जी के शिष्य वाल्मीकि जी हैं और वाल्मीकि जी के शिष्य भरद्वाज जी, याज्ञवल्क्यजी कहते हैं किअब में तुम्हारे दादा अर्थात गुरु नारद जी की कथा कहता हूँ, नारद जी को भी मोह हुआ था, इसलिए कथा को सावधान होकर सुनो।
इसी दोहे की दूसरी लाइन में बाबा तुलसी अपने मन से कहते है अरे मन मोह, मान और मद-ये सब भजन के बाधक हैं। मान मद में भजन नहीं होता, इसी से बाबा तुलसी इनको त्यागकर भजन करने को कहते हैं।
(सूत्र) यह कि मोह, मद, मान, नारद-जैसे महात्माओं को भी दूषित कर देते हैं।अतः हम सभी को इनसे सदा डरते तथा दूर रहना चाहिये। भजन करने में भी तुम्हारा पुरुषार्थ नहीं है, उसकी कृपा से ही तुम भजन करते हो,अत:भजन का श्रेय तुम्हें कुछ नहीं, इसलिये बाबा तुलसी मान-मद छोड़ने का उपदेश देते है। कथा सुनने से ही भक्ति उपजती है।
भुशुण्ड जी गरुड़जी को अपनी आप बीती सुनाते है।
हे गरुड़जी!आपकी बुद्धि धन्य है। आपके प्रश्न मुझे अत्यन्त प्यारे लगे आपके प्रश्नो सुनकर मुझे अपने अनेक जन्मों की याद आ गयी क्योंकि गरुड़जी के प्रश्नो का उत्तर बिना उन सब कथाओं के कहे पूरा हो नहीं सकता।
शिवजी ने हे पार्वती-
ताली दोनों हाथों से बजती है। भवानी, गरुड़ आदि श्रोता और शिष्य बायें हाथ (left hand)के समान हैं बायाँ हाथ सहायक और ग्रहण करने वाला माना गया है। और श्रीशिवजी, भुशुण्डिजी आदि वक्ता और गुरु दक्षिण हस्तवत् हैं। right hand दायाँ हाथ कर्मप्रधान, दान और कर्तृत्व का प्रतीक है। यह हाथ सक्रिय है कार्य करता है,देता है,संचालित करता है।
श्रोता और वक्ता दो हाथ के सामान है प्रश्नोत्तर होना कहना और सुनना ताली बजाना है।
जो इसे कहते-सुनते और अनुमोदन (प्रशंसा) करते हैं, वे संसार रूपी समुद्र को गो के खुर से बने हुए गड्ढे की भाँति पार कर जाते हैं।
‘राम’ को ब्रह्म जानकर उनकी कथा कहना, सुनना या कहने-सुनने में सहायता करने का यह फल है कि अनायास (बिना प्रयास) लोग भवसागर पार कर जाते हैं और जो ब्रह्म से भिन्न मानकर कहते-सुनते हैं वे अधम हैं।
कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच। “गोपद कहने का भाव कि इनके लिये भवसिंधु बिलकुल सूखा-सा हो जाता है, वे उसे अनायास पार कर जाते हैं जैसे गौ के खुर से बने गड्ढे को लाँघ जाने में परिश्रम नहीं होता।
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