गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।
भगवान राम ने दशरथजी के कुल मैं जन्म लेकर चक्रवर्ती राजा दशरथ जी इस कमी को दूर किया और जन्म लेकर डूबते हुए रघुवंश को बचाया। (गलानि=मन की खिन्नता या उदासी)
विश्वामित्रजी का यज्ञ मारीच आदि राक्षसों के उपद्रव से बार-बार नष्ट हो जाते थे, इसलिए पृथ्वी पर यज्ञ कार्य बंद से हो गए थे।
विश्वामित्रजी अत्यंत दुखी थे जब जब ऋषि-मुनि यज्ञ, तप और धर्मकार्य करते थे, तब राक्षस बार-बार आकर विघ्न डालते थे। वे यज्ञ की सामग्री नष्ट कर देते, भय उत्पन्न करते और साधुओं को कष्ट पहुँचाते थे।इस कारण धार्मिक कार्य निर्बाध रूप से संपन्न नहीं हो पा रहे थे। (निर्बाध=बिना किसी रुकावट या बाधा के)
(सूत्र) जब जब हम जीवन में शुभ कार्य,साधना,भक्ति या धर्ममार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं, तब तब अनेक प्रकार की रुकावट, अवरोध आते हैं। राक्षस उन बाहरी और आंतरिक बाधाओं के प्रतीक हैं जो साधना को भंग करते हैं। जब मनुष्य ईश्वर का आश्रय लेता है, तब वे बाधाएँ दूर होने लगती है।
राम ने विश्वामित्रजी से प्रार्थना की आप निर्भय होकर यज्ञ कीजिए।
प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥
होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥
राम उत्तम सेवक हैं कि गुरुजी को बताने की आवश्यकता नहीं पड़ी कि तुम यज्ञ की रक्षा करना। उन्होंने गुरु के मनोभाव को स्वयं समझ लिया और अपनी ओर से यज्ञ आरम्भ करने का निवेदन किया।
केवल आदेश मिलने पर कार्य करना नहीं,बल्कि स्वामी अथवा गुरु की आवश्यकता को पहले ही समझ लेना।(सूत्र) सेवक को संकेत से ही कार्य को समझ लेना चाहिए। गुरु की इच्छा जानकर तुरंत कार्य करना चाहिए। सेवा में आलस्य, प्रतीक्षा या बहाने का कोई स्थान नहीं होता। (झारी=झुण्ड के झुण्ड,सब)
ताड़का-वध के समय विश्वामित्रजी श्रीराम का असाधारण पराक्रम देख चुके थे और जान चुके थे कि ये साधारण राजकुमार नहीं हैं, तब श्रीराम ने उनसे क्यों कहा—निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।पं. रामकुमार मिश्रजी कहते हैं कि ताड़का-वध से विश्वामित्र जी को श्रीराम के ऐश्वर्य का ज्ञान हो गया था, किन्तु भक्त के हृदय में केवल ऐश्वर्य ही नहीं रहता। वहाँ प्रेम भी रहता है। प्रेम का स्वभाव है कि वह ऐश्वर्य को दबा देता है।
जब वात्सल्य और प्रेम बढ़ता है, तब भक्त भगवान को सर्वशक्तिमान ईश्वर के रूप में नहीं,अपने प्रियतम के रूप में देखने लगता है। विश्वामित्रजी के हृदय में भी श्रीराम के प्रति वात्सल्य जागृत हो गया था। और ऐश्वर्य को भूल गए। उनके मन में इन दोनों बालकों की चिन्ता प्रबल हो गई।तब श्रीराम ने कहा—निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।
इसके बाद राम ने मारीच और सुबाहु आदि राक्षसों का दमन किया।
दोनों भाइयों ने असुरों को मारकर ब्राह्मणों (ऋषियों) को निर्भय कर दिया।
इन्द्र ने अहिल्या के पतिव्रत धर्म को नष्ट किया, गौतम जी के श्राप के कारण पत्थर की नारि बन गई रामजी ने अहिल्या को पाषाण से नारी बनाया पुनः उसका रूप दिया और फिर अहिल्या को अपने पति से मिलाया। (उपल= पत्थर,पाषाण,शिला)
प्रभु की स्तुति की और पुनः अपने पति गौतम ऋषि के साथ सम्मानपूर्वक रहने लगीं।
(सूत्र) मनुष्य से भूल हो सकती है। अपराध या पतन के बाद भी ईश्वर की कृपा से उद्धार संभव है। भगवान की करुणा पतित से पतित जीव को भी पुनः सम्मान और पवित्रता प्रदान कर सकती है।
ईश्वर-विस्मृति से हृदय कठोर (पाषाणवत्) हो जाता है। प्रभु-चरणों का स्पर्श अर्थात् भक्ति, सत्संग और प्रभु की कृपा से वही कठोर हृदय पुनः चेतन, निर्मल और प्रेममय बन जाता है। इसलिए तुलसीदासजी अहिल्या को पापिनी के रूप में नहीं, बल्कि भगवत-कृपा की पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं। श्रीराम ने उन्हें समाज में पुनः प्रतिष्ठा दिलाई,उनका खोया हुआ सम्मान लौटाया और पति-पत्नी का पुनर्मिलन कराया। इसलिए अहिल्या उद्धार का प्रसंग यह संदेश देता है कि भगवान की कृपा किसी भी जीव के जीवन को बदल सकती है।कोई भी इतना पतित नहीं कि उसका उद्धार न हो सके।
आपकी कृपा से गौतम ऋषि को उनकी पत्नी अहिल्या पुनः प्राप्त हुई और वे फिर से उनके पति (खसम) बने। आपकी ही कृपा से शतानन्द को भी अपनी माता अहिल्या का फिर से स्नेह और सान्निध्य प्राप्त हुआ। जो पति शाप देकर उनसे दूर हो गए थे, वे फिर से उनके स्वामी बन गए। अर्थात श्रीराम की कृपा से अहिल्या को पति, पुत्र, परिवार, सम्मान और प्रतिष्ठा सब कुछ वापस मिल गया। (रावरे = आपका,आप,आपके)
रामजी की कृपा केवल शाप-मुक्ति तक सीमित नहीं रही उन्होंने अहिल्या के जीवन की टूटी हुई पारिवारिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्थिति को भी पूर्णतः पुनर्स्थापित कर दिया।
प्रसाद का अर्थ है कृपा। संदेश यह है कि भगवान की कृपा से खोया हुआ सम्मान, बिछुड़े हुए संबंध और जीवन का आनंद भी पुनः प्राप्त हो सकता है।
श्री जनकजी-प्रतिज्ञा की रक्षा की,उनके प्रण को बचाया।
(हँसाई=हँसी का पात्र) (सुकृत=धर्म, पुण्य)
जिस प्रकार कोई व्यक्ति गहरे जल में डूब रहा हो और अचानक उसे सहारा या थाह मिल जाए, तो उसके हृदय में अपार राहत और आनंद होता है, उसी प्रकार जनकजी को भी राम द्वारा धनुष-भंग करने पर असीम सुख प्राप्त हुआ। (कोदंड= धनुष)
सुग्रीव को खोया हुआ राज्य वापस दिलाया।
(विरद = स्वभाव)
सरल-रामजी अपने भक्तों के लिए अत्यन्त सरल, सहज, कोमल और निष्कपट हैं।
शबरीजी के बेर प्रेम से स्वीकार करते हैं।
निषादराज गुह को मित्र बनाते हैं।
सुग्रीवजी और विभीषणजी को शरण देते हैं।
इसलिए भक्तों के लिए वे सरल स्वभाव हैं।
रामजी ने पुष्पवाटिका में सीताजी के अलौकिक सौन्दर्य को देख कर उनके हृदय में जो भाव उत्पन्न हुए,उनको भी रामजी ने अपने गुरु विश्वामित्रजी से कह दिया। सामान्यतः मनुष्य अपने मन के ऐसे भावों को गुप्त रखता है, परन्तु रामजी के जीवन में कोई दुराव-छिपाव नहीं है। उनका हृदय निर्मल जल के समान स्वच्छ है। यही कारण है कि सीताजी की उस अनुपम शोभा का वर्णन, जो कहने योग्य नहीं था, उसे भी उन्होंने अपने गुरु के समक्ष सरल भाव से ज्यों का त्यों कह दिया। (सूत्र) गुरु के सामने मन को छिपाना नहीं चाहिए क्योंकि गुरु केवल आचरण ही नहीं,हृदय की दिशा का भी मार्गदर्शन करते हैं। (लोनाई= लावण्य,आकर्षण, सुंदरता) (ऐन=घर,निवास,मृग,हिरण) (बैन=वचन, बात, बयान, बोल)
बाबा तुलसी ने भगवान राम की अद्भुत विनम्रता का वर्णन करते हैं।
श्रीराम स्वयं परब्रह्म हैं वेद जिनका पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते,मुनियों का मन भी जिनकी महिमा का अंत नहीं पा सकता,कोल भीलो कि बातों को ऐसे सुनते हैं जैसे कोई पिता अपने छोटे बालक की बातों को प्रेमपूर्वक सुनता है।
सबल- दुष्टों, राक्षसों और अधर्मियों का नाश करने में वे अपार पराक्रमी हैं।
ताड़का-वध
खर-दूषण-वध
बालि-वध
रावण-वध
रामजी द्वारा इन कार्यों से उनके सबल स्वरूप का दर्शन होता है।
लक्ष्मणजी सूर्य के उदय का उदाहरण देकर श्रीराम के प्रताप की चर्चा कर रहे हैं
उदयाचल पर सूर्य के प्रकट होने से जैसे उसका प्रकाश संसार में फैल जाता है, वैसे ही धनुष-भंग की घटना से श्रीराम के भुजबल और प्रताप का प्रकट होगा।
हे रघुनाथजी! जैसे उदयाचल सूर्य के तेज को प्रकट करता है, वैसे ही यह धनुष-भंग की व्यवस्था आपके भुजबल की महिमा को प्रकट करने वाली सिद्ध होगी। जब आप इस धनुष को तोड़ेंगे, तब आपका प्रताप समस्त राजाओं और संसार के सामने स्वयं प्रकाशित हो जाएगा।
धनुष-भंग से श्रीराम के प्रताप का उदय होगा।
आगे विराध, खर-दूषण, बाली, कुम्भकर्ण और रावण-वध के साथ वह प्रताप क्रमशः और अधिक प्रकट होगा।
जैसे सूर्य उदयाचल से ऊपर उठते हुए अधिक तेजस्वी दिखाई देता है, वैसे ही श्रीराम का यश और पराक्रम भी लीलाओं के साथ-साथ अधिकाधिक प्रकाशित होता जाएगा।
निष्कर्ष
इस चौपाई में लक्ष्मणजी का आशय यह नहीं कि केवल धनुष टूटेगा, बल्कि यह है कि— धनुष-भंग वह अवसर है जो श्रीराम के छिपे हुए ऐश्वर्य, भुजबल और प्रताप को संसार के सामने उद्घाटित करेगा, जैसे उदयाचल सूर्य के प्रकाश को प्रकट करता है।
साहिब- रामजी तीनों लोकों के स्वामी साहिब का अर्थ केवल मालिक नहीं, बल्कि ऐसा समर्थ रक्षक और शासक जो समस्त जगत का पालन करे।
देवताओं की रक्षा करते हैं।
ऋषियों के यज्ञों की रक्षा करते हैं।
पृथ्वी को राक्षसों के आतंक से मुक्त करते हैं।
इसलिए वे तीनों लोकों के साहिब हैं।
रघुराज-धर्म के आदर्श राजा रघुराज शब्द श्रीराम की धर्मनिष्ठा और आदर्श राजधर्म का बोध कराता है।
पिता की आज्ञा के लिए वनवास स्वीकार किया।
सत्य और मर्यादा का पालन किया।
रामराज्य स्थापित किया।
रामचंद्रजी के राज्य में चंद्रमा अपनी (अमृतमयी) किरणों से पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं, जितने की आवश्यकता होती है और मेघ माँगने से (जब जहाँ जितना चाहिए उतना ही) जल देते है।
बाबा तुलसी ने इस एक चौपाई से भगवान के सभी अवतारों का दर्शन भी कराया। गई बहोर से तीन अवतार-
1.मत्स्य अवतार- वेदों की रक्षा, भगवान ने(मीन) रूप धारण करके शंखासुर से वेदों को छुड़ाया और उन्हें पुनः ब्रह्माजी को प्रदान किया।
2.कूर्म अवतार समुद्र मंथन – कच्छप (कूर्म) रूप धारण कर देवताओं की सहायता की भगवान ने समुद्र-मंथन में मंदराचल पर्वत को रोका कच्छप रूप में आधार बने। उसी मंथन से महालक्ष्मी फिर से प्रकट हुईं, जो दुर्वासा ऋषि के शाप के प्रभाव से समुद्र में लुप्त हो गई थीं। (कूर्म= कमठ, कछुआ, कच्छप)
3.वराह अवतार-भगवान ने वराह रूप में हिरण्याक्ष द्वारा रसातल में ले जाई गई पृथ्वी को पुनः उसके स्थान पर स्थापित किया। पृथ्वी का उद्धार किया। (वराह= सूअर, जंगली सुअर) (रसातल=पाताल)
4.नरसिंह अवतार-भक्त की रक्षा,गरीब निवाज (दीनों पर कृपा करने वाले) शब्द से नरसिंह अवतार का दर्शन कराया। क्योंकि भगवान ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए प्रकट होकर अत्याचारी हिरण्यकशिपु का वध किया।
5.वामन अवतार-दंभ का विनाश-वामन अवतार से सरलता के गुण का दर्शन कराया। भगवान ने सर्वसमर्थ होते हुए भी एक विनम्र ब्राह्मण बालक का रूप धारण किया और राजा बलि से तीन पग भूमि का दान माँगा। अपनी प्रभुता को त्याग कर भिखारी बने।
6.परशुराम अवतार-अधर्म का दमन,सबल अर्थात अत्यंत शक्तिशाली के गुण का दर्शन कराया। जिन्होंने अपने पराक्रम से पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय-विहीन कर दिया।
7.राम अवतार-धर्मराज्य की स्थापना और साहिब रघुराज से भगवान श्रीराम के अखिल ब्रम्हांड के नायक होने का दर्शन होता है।
रामजी ने—
वानरों और भालुओं को अपना सेवक बनाकर अपनाया,
राक्षसों का विनाश किया,
सज्जनों और भक्तों की रक्षा की,
धर्म की स्थापना की,
और रघुवंश की राजगद्दी पर आदर्श शासन किया।इसलिए
(बुध = ज्ञानी, विवेकी पुरुष) (हरिजस= भगवान श्रीराम का यश, गुण और चरित्र) (पुनीत = पवित्र) (सुफल= सफल, कृतार्थ) (सुफल निज बानी=जो मुख से निकले वह सच हो यही वाणी की सफलता है)
बाबा तुलसी स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्होंने अपनी वाणी को पवित्र बनाने के लिए रामयश का गान किया है।
आध्यात्मिक संदेश
मनुष्य की वाणी तब सार्थक होती है जब वह—
भगवान के गुणों का वर्णन करे,
लोकमंगल की बात कहे,
सत्य और धर्म का प्रचार करे।
गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।
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