पार्वती विवाह,देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा।।
सप्त ऋषियों ने कहा हे सैलकुमारी आप भारी तपस्या क्यों कर रही हो तुम किसकी आराधना कर रही हो और क्या चाहती हो हमसे यह सत्य भेद कहो हे पार्वती जिस के लिए तप करते है वह तो तुमको बिना तप के स्वतः ही प्राप्त है आपका जन्म सर्वप्रथम ब्रह्मा के कुल में हुआ है। आपका शरीर त्रिलोकी के सौन्दर्य से निर्मित प्रतीत होता है । मनचाहे ऐश्वर्य का आनन्द आपको प्राप्त है । अब यह तो बताइए कि आप इससे अधिक और किस फल की कामना से तप कर रही हैं? (अवराधहु= अवराधना=उपासना करना, पूजना, सेवा करना)
सप्तऋषियों ने कहा गुरु जी तो सोच विचार कर बनना चाहिये सप्तऋषियों ने नारद जी का चरित बताया सप्तऋषियों ने कहा जिसने नारद जी की सलाह मानी है उनका घर बसा नहीं है बल्कि नारद जी ने बहुतों के घर उजड़े है दक्ष ,चित्रकेतु ,हिरणाकश्यप, ऐसे कई उदाहरण है।
नारद जी का जब से विवाह नहीं हुआ तब से नारद जी ने मन में पक्की ठान ली मेरा विवाह नहीं हुआ तो किसी और का विवाह ना हो और अगर हो भी जाये तो उसको गृहस्थ का सुख ही ना मिले अब तुम शंकर से विवाह करके क्या सुख भोगोगी अब सप्त ऋषि शंकर जी के अवगुणों का बखान करते है। (सरिस= सदृश, समान, तुल्य)
और जिस शिव जी को पति रूप में चाहती हो वो तो जन्म से ही उदासीन है ,गुणहीन, निर्ल्लज, बुरे वेश वाला ,नर मुंडो को धारण करता है ,कुलहीन ,घरबार रहित ,नंगा और पूरे शरीर पर सर्पो को धारण करता है।
हे पार्वती अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है अर्थात नारद के वचनों को त्याग दो हम तुम्हारे योग्य वर बता सकते है और उसके लिए कठोर तप की जरूरत भी नहीं है संसार में सबसे अधिक सुन्दर है स्त्रियो को भी पति की सुंदरता प्रिय होती है जटा, पांच मुख, पंद्रह नेत्र आदि की कुरूपता इनमें नहीं है ये परम रूपवान है शिव जी की तरह चिता की अपावन भस्म मुंडमाला, सर्प, बाघंबर. धारण नहीं करते वैजंतीमाला कौस्तूभ मणि धारण करते है शिव जी के तरह भयंकर नहीं है इनके दर्शन से सुख होता है सुशील है किसी का अनादर नहीं करते जैसे शिव जी ने दक्ष का किया सुंदर स्वभाव है भृगु जी के चरण प्रहार को सहा। (नीक= अच्छा, सुंदर,अनुकूल)
पार्वती ने कहा -हे महाराज में जानती हूँ कि महादेवजी अवगुणों के भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणों के धाम हैं, पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको किसी अन्य से कोई लेना देना नहीं होता।वह किसी की सलाह भी नहीं मानता गुणों और अवगुणों का तो सभी को ज्ञान होता है परन्तु जिसे जो भाता है,उसे वही अच्छा लगता है।
परन्तु अब तो मैं अपना जन्म शिवजी के लिए हार चुकी, फिर गुण-दोषों का विचार कौन करे?
हे पार्वती अगर फिर भी शंकर जी विवाह के लिए तैयार नहीं हुए तब क्या करोगी।
हे मुनियों आपके उपदेश के लिए मेरे पास कोई स्थान नहीं है और अगर आप यह सोचते हो कि यह जन्म तो गया अगले जन्म के लिए उपदेश है तो आप सुनिए मेरा हट तो करोड़ जन्मों तक यही रहेगा कि विवाह शिवजी से ही करूगी अन्यथा कुँआरी रहूँगी।
हे पार्वती शिव जी के लिए तप कर रही हो शिव जी को पति मान चुकी हो फिर भी उनका कहना नहीं मानोगी हे मुनियों इष्ट से आचार्य का पद हमेशा बड़ा होता है।
सप्त ऋषियों द्वारा पार्वती जी का सारा चरित सुनकर शिव जी ऐसे आनन्द मगन हुए की समाधि लग गई।
उसी समय तारक नाम का असुर हुआ, जिसकी भुजाओं का बल, प्रताप और तेज बहुत बड़ा था। उसने सब लोक और लोकपालों को जीत लिया, सब देवता सुख और सम्पत्ति से रहित हो गए, ब्रह्माजी ने सभी देवताओ से कहा- इस दैत्य की मृत्यु शिवजी के पुत्र से होगी, इसको युद्ध में वही जीतेगा।
पार्वती विवाह NEXT
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा।।
रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥ सादर सुनु॥ राम चरित आदर पूर्वक सुनना चाहिए… Read More
बंदों अवधपुरी आति पावनि। सरजू सारि कलिकलुष नसावनि॥ सरयू का साधारण अर्थ स से सीता… Read More
अवध प्रभाव जान तब प्राणी। जब उर बसें राम धनु पाणी।। किस कारण अयोध्या को… Read More
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥ जितनी वन्दना मानस में बाबा तुलसी… Read More
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥ अवतार के हेतु, प्रतापभानु साधारण… Read More
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥ अवतार के हेतु, फल की आशा को… Read More