गुरु महिमा,गुर बिनु भव निध तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥
सभी से ममता हटाकर प्रभु को ही प्रेम करना यही डोरी बटना है। क्योंकि ये सब के सब राम भक्ति के बाधक हैं, इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है। अर्थात सारे सांसारिक संबंधों का केंद्र मुझे बना लेता है।
क्योंकि ये सब के सब रामभक्ति के बाधक हैं।
भक्त का मन जब संसार के विषयों से हट जायेगा तब वह सभी में अपने प्रभु का दर्शन पाता है। तभी भक्त के मन में
अस सज्जन मम उर बस कैसें।लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
रामजी ने कहा हे विभीषण ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन बसा करता है। मुझको तो केवल तुम सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। मैं और किसी के निहोरे से (कृतज्ञतावश) देह धारण नहीं करता। ऐसे सन्त मुझे इतने प्रिय हैं कि मैं उनका दुख देख नहीं सकता,अतः उनकी रक्षा के लिए अवतार लेता हूँ।
और भगवान बोले ऐसे सज्जन से हनुमान जी भी हठपूर्वक मित्रता करते हैं।
हनुमानजी कहते हैं सज्जन कौन है, जो बोलते, उठते, सोते, जागते हरि नाम लेता है, भगवान का सुमिरन करता है वह सज्जन हैं, सागर की तरह दूसरे को बढते हुए देख उमड़ता हो वो सज्जन हैं, जो सबकी ममता प्रभु से जोड दे, प्रभु के चरणों में छोड़ दे “सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणंब्रज” वह सज्जन है।
भगवान श्री रामजी ने नारद जी को कहा है- मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ, जैसे माता बालक की रक्षा करती है। बच्चे को माँ एक मिनिट भी दूर नहीं रखती उसी तरह भगवान भी जीव से दूर नहीं रहता है।
एक मात्र परमात्मा ही हैं जो हर विपत्ति व काल से भी रक्षा करने में समर्थ हैं। संसार में ऐसा कोई जन्मा ही नहीं जो किसी को सुखी कर सके या उसकी सदैव रक्षा कर सके। यदि रक्षा का बन्धन ही बांधना है तो एकमात्र परमात्मा से ही बांधे, जिसका तरीका स्वयं भगवान राम ने बताया और यदि एक बार बंधन परमात्मा से बंध गया, डोर लग गयी तो वही रक्षा करते है।
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