गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति
कमल जैसे नेत्रवाले रामचन्द्रजी पिता के राज्य को पथिक की तरह छोड़कर चल दिये। (राजीव=कमल, नलिन, पंकज, नीरज, अरविंद, सरोज, जलज, नीलकमल) (बटाऊ= राही, पथिक)
दूसरा दयावीर– जो विश्व का मित्र हो वही विश्वामित्र होता है। गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के दुख को विश्वामित्र नहीं सह पाए और प्रभु से विनय करते हुए कहा कि यदि कोई भिक्षा मांगता है उसे भिक्षा मिलती है, प्रभु यह आपके चरण रज की भीख मांग रही है इन्हें चरण रज प्रदान करें। राम नाम तो वसिष्ठ जी ने रखा पर आज रघुवीर नाम से नामकरण दूसरे गुरु विश्वामित्र जी ने दिया। रघुवीर का भाव- आप कृपा करने में भी वीर है। (उपल= ओला,पत्थर)
रावण ने विभीषण पर शक्ति अर्थात अस्त्र को छोड़ा, पर रामजी ने उस शक्ति को अपने ऊपर ले लिया, (सूत्र) संकट के समय तो परिवार वाले मित्र सखा भी साथ छोड़ देते है। पर प्रभु राम ने विभीषण की रक्षा की। (शक्ति= अस्त्र)
तीसरा विद्या वीर– जल में पत्थरों का तैरना भी एक विद्या है। (पाषाण= पत्थर, शिला)
केवल एक ही बाण से तड़का का वध किया विद्या वीर कहलाये। और तड़का को अपने धाम में स्थान देने से दयावीर कहलाये।
धर्मनीति, राजनीति, प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ सभी में रामजी परिपूर्ण है पूरे ब्रह्मांड में कोई भी वैसा समझने वाला नहीं हैं जैसा कि रामजी समझते है नीति रावण और बाली को सिखाई और बाली को तो ऐसी सिखाई कि बाली के पास उत्तर ही नहीं था। रामजी लोक व्यवहार में निपुण, इसी से राम सबको प्राणो से अधिक प्रिय लगते है! प्रीति के उदाहरण, गुह जी, सबरी, सुग्रीव, जटायु जी, है। परमार्थ में अयोध्या की प्रजा को सुन्दर उपदेश दिया और स्वार्थ तो रामजी में है ही नहीं।
वसिष्ठ जी जैसे ज्ञानी बोल रहे है कि नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थ इन चारों में सामंजस्य बैठना बड़ी ही पडिताई का काम है मैं भी थोड़ा बहुत जनता हूँ पर इन सभी का यथार्थ ज्ञान तो रामजी को ही है।मात्र यही एक कारण है कि रामजी सभी को प्राणों से प्रिय है। (यथार्थ= वास्तविक, उचित, सत्य) (जथारथु= यथार्थ एवं न्याययुक्त बात, विश्वसनीय व्यक्ति)
इन चारों को विचार ही राम जी ने वनवास लिया था।
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर॥
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू॥
धर्मानुकूल नीति का पालन
राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका ॥
जानत प्रीति-रीति रघुराई ।
नाते सब हाते करि राखत, राम सनेह-सगाई ॥
चौथा धर्मवीर–विभीषण कह रहे है कि मैंने तो हनुमान जी से आपका सुयश सुना कि आप भव के भय का नाश करने वाले हैं। तब आया हूँ, हे दुखियों के दुख दूर करने वाले और शरणागत को सुख देने वाले श्री रघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। (भव= जन्म-मरण) (त्राहि= रक्षा करो, बचाओ) (आरति= पीड़ा)
राम जी सुमंत्र जी से बोले-
पाचवा पराक्रम वीर–परशुरामजी के आगमन पर राम सब लोगों को भयभीत देखकर और सीता को डरी हुई जानकर बोले-उनके हृदय में न कुछ हर्ष था न विषाद था।
गुप्तचरों ने रावण से बोल- रामजी एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सोख सकते है,परंतु नीति निपुण रामजी ने नीति की रक्षा के लिए आपके भाई विभीषण से समुद्र पार करने का उपाय पूछा। (नागर= सभ्य, चतुर, स्वामी, ईश्वर)
यहाँ रामजी ने स्वयं कहा- (बलवंत= शक्तिशाली, ताकतवर)
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥
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