कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता।।
अयोध्या आगमन पर रामजी ने युद्ध के जीत का श्रेय गुरु जी को दिया और अपने सभी सहयोगियों विभीषण ,सुग्रीव ,नल ,नील ,अंगद ,जामवंत ,हनुमान सभी से कहा गुरु वशिष्ठ जी हमारे कुल के पूज्य हैं। इन्हीं की कृपा से रण में राक्षस मारे गए हैं। संतो का मत कृपा में दूरी या पास का कोई फर्क नहीं पड़ता।
रामजी अपने साथियों का परिचय गुरु वशिष्ठ जी से कराते हुए कहा युद्ध को जीतने में मेरे लिए इन सभी ने जान की बाजी लगा दी। (सूत्र) अक्सर काम पूरा हो जाने के बाद व्यक्ति उन सहयोगियों को भूल ही जाता है जिनकी वजह से उसने सफलता हासिल की इसी कारण आज भी रामजी एक आदर्श के रूप में पूजे जाते है। कृष्णा और राम में यह बहुत बड़ा भेद भी यही है कि भगवान कृष्णा ने कई लीला ऐश्वर्य युक्त है।
वास्तव में कृतज्ञता और कुशल नेतृत्व में राम जी से बड़ा कोई है ही नहीं रामजी ने केवल विजय का श्रेय ही नहीं दिया बल्कि कहा।
अतः छोटे भाई, राज्य, संपत्ति, जानकी, अपना शरीर, घर, कुटुम्ब और मित्र-ये सभी मुझे प्रिय तो हैं, पर तुम्हारे समान नहीं, ऐसी है रामजी की कृतज्ञता।
कृतज्ञता का अर्थ केवल “थैंक यू” कह देना नहीं है उस क्षण को पूरी आत्मा से महसूस करना,जब किसी ने आपके लिए कुछ किया।
(मृषा= झूठ मूठ, व्यर्थ) (बाना= स्वभाव,रीति)
पर शरणागत पालन में रामजी अदुतीय है इसी से शरणागत में लक्ष्मणजी का नाम नहीं लिया गया पर निशाचर वध में लक्ष्मणजी अदुतीय है इसी से इस सम्बन्ध में राम का नाम नहीं लिया गया।
रामजी सुग्रीव को लक्ष्मण जी का ऐश्वर्य बताते हुए कहते है जगत में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षण भर में उन सबको मार सकते हैं और यदि विभीषण भयभीत होकर मेरी शरण में आया है तो मैं तो उसे प्राणों की तरह रखूँगा।(निमिष= उतना समय जितना पलक गिरने में लगता है)
जौं सभीत । सभीत का भाव है कि यदि वह भय से आया तो भय हरेगे,भय चाहे संसार का हो ,चाहे शत्रु का,चाहे पाप का सरनागत मुझे प्राणो के सामान प्रिय है। और शरणागत के लिए तो में प्राण भी दे सकता हूँ।
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