संसय,बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा॥
काकभुशुण्डि ने कहा हे पक्षीराज गरुड़! मन बड़ा ही चंचल है जैसे वायु का स्थिर करना (दुष्कर= जिसे करना कठिन हो= कष्टसाध्य) है , वैसे से ही मन का स्थिर होना भी कठिन है। अर्जुन ने भी कृष्ण से यही कहा कि मन बड़ा चंचल होता है इसका एक जगह रहना मनुष्यों के लिए बड़ा ही कठिन है प्रभु भी अर्जुन के मत से सहमत होते हुए भी मन को वश में करने का उपाय बताते है, भगवान कृष्ण ने कहा मन निःसदेह चंचल और (दुर्निग्रह=जिसपर काबू पाना कठिन हो) है पर अभ्यास और वैराग्य से मन को भी वश में किया जा सकता है। (सूत्र) जब तक मन एक जगह नहीं होगा तब तक (निज-सुख= निजानंद=आत्मानंद) होगा भी नहीं ! (सूत्र) मन शांत रहेगा तो बड़ी-बड़ी समस्या का हल भी आसानी से हो सकता है। और यदि मन अशांत रहेगा तो छोटी से छोटी समस्या भी हल हो ही नहीं सकती। भजन में भी यही कहा जाता है।
क्या वायु-तत्त्व के बिना स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वास के बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? उत्तर कभी नहीं! इसी प्रकार श्री हरि के भजन बिना जन्म-मृत्यु के भय का नाश नहीं होता। (थीरा= स्थिर) (परस= स्पर्श)
श्रद्धा विस्वास कौन है? तुलसी बाबा ने कहा
इसको राम जी ने कन्फर्म किया शंकर ही विश्वास है इस की पुष्टि स्वयं राम जी ने की,
विश्वास कैसा? सप्तऋषि से पार्वती ने कहा- जिसको गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है उसको सुख और सिद्धि स्वप्न में भी सुगम नहीं होती, जो गुरु के वचन नहीं छोड़ता सारे संसार का वैभव उसके चरणों में आ जाते है। जब ऋषियों ने पार्वती का गुरु नारद के वचनों में में ऐसे प्रेम को देखा तो वे जय हो!, जय हो! कहकर सिर नवाकर चले गए।(सूत्र) पार्वती जी हमारी एक निष्ट गुरु भक्ति कि आचार्य भी है
हे उमा
मुनियों को दुर्लभ क्या है? रामजी ने स्वयं कहा -साधना के विभिन्न साधनों से मुनि जो जप और योग की अग्नि से शरीर जलाते रहते हैं, करोड़ों यत्न करते है अगर विश्वास नहीं है तो वे भी मेरी भक्ति नहीं पाते।
यही तो बाली ने रामजी से कहा-
सुग्रीव जी ने बड़ा ही सुन्दर राम जी से कहा
तो जीव को करना क्या है? शंकर ने कहा हे उमा जीव को केवल और केवल इतना करना है की श्रद्धा और विस्वास के साथ प्रभु के चरित को कहे अथवा सुने अथवा प्रभु की महिमा का अनुमोदन (प्रशंसा) करें है।
काकभुशुण्डि ने कहा हे गरुड़! भक्ति के लिए विश्वास आवश्यक है। बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती और बिना भक्ति के राम द्रवित नहीं होते तथा राम कि कृपा के बिना जीव को विश्राम (मोक्ष) नहीं मिलता। इस प्रसंग में श्री राम-कृपा की ही प्रधानता दिखाते है। (विश्राम= चैन, सुख)
यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है पर महाराज विश्वास करना ही तो असंभव है।
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥
रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥ सादर सुनु॥ राम चरित आदर पूर्वक सुनना चाहिए… Read More
बंदों अवधपुरी आति पावनि। सरजू सारि कलिकलुष नसावनि॥ सरयू का साधारण अर्थ स से सीता… Read More
अवध प्रभाव जान तब प्राणी। जब उर बसें राम धनु पाणी।। किस कारण अयोध्या को… Read More
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥ जितनी वन्दना मानस में बाबा तुलसी… Read More
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥ अवतार के हेतु, प्रतापभानु साधारण… Read More
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥ अवतार के हेतु, फल की आशा को… Read More