सरल,अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥
रामजी ने हाथ जोड़कर परशुराम जी के प्रति सम्मान, विनय और समर्पण प्रकट किया इसका कारण बताते हुए संत कहते है पहला परशुराम जी ब्राह्मण हैं, दूसरा परशुराम जी शिवजी के शिष्य हैं, तीसरा अवस्था में बड़े हैं,चौथा परशुराम जी गुरु विश्वामित्रजी के सम्बन्धी हैं।
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
रामजी ने अपने को दास कहा कि तुम्हारा कोई एक दास होगा ऐसा भाव युद्ध के बाद रामजी ने सीता एवं गुरुवशिष्ठ से भी कहा,
रामजी परशुराम जी से कहा – हे नाथ,हमारी और आपकी बराबरी कैसी? कहिए न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक! कहाँ मेरा राम मात्र छोटा-सा नाम और कहाँ आपका परशुसहित बड़ा नाम है। (सूत्र) जब हम आपके चरणों में हम अपना मस्तक नवाते है। तब बराबरी कहाँ रही? हमहि तुमहि का भाव हम सेवक है आप नाथ अर्थात स्वामी है। क्या सेवक स्वामी में कभी बराबरी होती है? कभी नहीं दूसरा भाव हम क्षत्रिय है और आप ब्राह्मण है, क्या बराबरी संभव है? कभी नहीं (सरिबरि= बराबरी,समता) (मुनिराया= मुनिराज)
अतः हे नाथ अनजान में की हुई चूक छमा योग्य होती है, अंत में परशुराम जी ने स्वयं यही कहा है। (अनजानत=अनजाने की चूक)
(सूत्र) राम मात्र पद से नाम जाप करने वालों को श्री रामजी के मुखारविन्द से उपदेश हो रहा है कि (क) हमारा दो अक्षर का मंत्र है, इसमें आप और कुछ न मिलावें। (ख)-लघु कहकर सूचित किया कि मंत्र जितना ही छोटा होता हे, उतना ही उसका प्रभाव अधिक होता है । (ग) हमारा (बहु वचन) कहने का भाव कि इस मंत्र पर हमारा बड़ा ममत्व है, इसी से राम नाम सब नामों से अधिक है।
पुनः भाव यह कि हमें यह, दो अक्षर का ही नाम प्रिय है ओर जो इसे जपते हैं वे भी हमें प्रिय है। पुनः इसमें समस्त योगी लोग रमते है और प्रभु आपका पाँच अक्षर का नाम है सो उसमें केवल फरसा ही रमा है।
जिसके वश में ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवता हैं, वह मंत्र अत्यंत छोटा है। जैसे महान मतवाले गजराज अर्थात हाथी को छोटा-सा अंकुश अपने वश में करता है। (खर्ब= लघु,छोटा)
छोटा तो है पर राम नाम सब नामों से बढ़कर है और पाप रूपी पक्षियों के समूह के लिए यह वधिक अर्थात शिकारी के समान है।
राम जी अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ प्रगट हुए तब गुरू वशिष्ठ जी ने इनका नाम राम रखा। और तभी से राम नाम चला आ रहा है। ऐसा कहना सही नहीं है। राम जी तो राजा दशरथ के यहाँ पुत्र रूप में प्रगट होने से पहले भी थे। राम जी अनादि हैं, अजन्मा हैं, अनंत हैं, ठीक ऐसे ही राम नाम भी अनादि है। राम नाम अनादि काल से ही चला आ रहा है (सूत्र) राम नाम मंत्र है। राम नाम महामंत्र है । राम नाम श्रेष्ठ है। रामनाम सर्वश्रेष्ठ है। राम नाम सरल है। राम नाम सुंदर है। राम नाम राम जी के ही समान (सहज, सरल) भी है।
राम परशुराम से – हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र (शम, दम, ,शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता-ये) नौ गुण हैं। आप नाम में ही बड़े नही, आप गुण में भी बड़े है। मुझ मे केवल एक गुण है। धनुर्वेद जानता हूँ।रामजी ने परशुरामजी को बारबार मुनि और विप्रवर कहा (अर्थात रामजी ने एक बार भी उनको वीर नहीं कहा और ना ही वीर स्वीकार किया) तब परशुरामजी रुष्ट होकर रामजी से बोले कि तू भी तेरे भाई जैसा सरीखा टेड़ा है। (धनुर्वेद=यजुर्वेद का एक उपवेद है। इसके अन्तर्गत धनुर्विद्या आती है।)
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