दीनता,नम्रता छोटा,मेरा मुझ में कुछ नहीं,जो कुछ है सो तोर ।
तुलसीदास जी ने कहा हे श्री रघुबीर! मेरे समान कोई दीन नही है और आपके समान कोई दीनो का हित करनेवाला नही है। ऐसा विचार कर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म मरण के भयानक दुख का हरण कर लीजिये। (बिसम= विकट, भीषण, प्रचंड भयंकर विकट) (भव भीर= जन्म मरण)
तुलसीदास जी ने कहा मुझको अपना दास जानकर कृपा की खान आप सब लोग मिलकर छल छोड़कर कृपा कीजिए। (छोह= कृपा) (कृपाकर= कृपा+ आकर=कृपा की खानि) दूसरा (कृपा+कर= कृपा करनेवाले) (किंकर= दास, सेवक)
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥
सब जगत को सियाराम मय मानकर वंदना की और अपने में किंकर,भाव रखा यह गोस्वामी जी का अनन्य भाव है यथा
मुझे अपने बुद्धि-बल का भरोसा नहीं है, इसीलिए मैं सबसे विनती करता हूँ।
आगे अपने को संतो का बालक कहा,
तुलसीदास जी ने कहा। मैं न तो कवि हूँ, न वाक्य रचना में ही कुशल हूँ,मैं तो सब कलाओं तथा सब विद्याओं से रहित हूँ, इनमें से काव्य सम्बन्धी एक भी बात का ज्ञान मुझमें नहीं है यह मैं कोरे कागज पर लिखकर(शपथपूर्वक)सत्य-सत्य कहता हूँ। वेजनाथ के अनुसार कि अपने मुँह अपनी बड़ाई करना दूषण है।अपनी बड़ाई करने वाला लघुत्व को प्राप्त होता है। अतः यहाँ यह चतुरता गोसाई जी ने की कि काव्य के सर्वाग प्रथम गिना आए, फिर अंत में कह दिया कि हममें एक भी काव्यगुण नहीं हैं। जैसे पूजन कर अंत में अपराध निवारण हेतु प्रार्थना की जाती है, वैसे ही यहाँ जानिये।
गोस्वामी जी सब गुणों से पूर्ण होते हुए भी ऐसा “कवि न होउँ” कह रहे है इन्होने तो विनम्रता की हद ही पार कर दी यह कार्पण्य यानि दीनता अथवा चित् का गर्वहीन भाव को कार्पण्य शस्णागति कहते है! जैसे हनुमानजी भक्ति के पूर्ण ज्ञाता हैं,फिर भी शपथ करके कहा है, ऐसा कहकर अपने हृदय की निष्कपटता दर्शित करता है।यथा
आप यह यथार्थ भी कह रहे हैं।
राम प्रताप क्या है।
तुलसीदास जी ने कहा -मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है, चाह तो अमृत पाने की है, पर जगत में जुड़ती छाछ भी नहीं। जैसे बालक जब तोतले वचन बोलता है, तो उसके माता-पिता उन्हें प्रसन्न मन से सुनते है। (मुदित= प्रसन्न)
तुलसीदास जी ने कहा:-कीर्ति, कविता, और सम्पत्ति ,वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो। श्री रामजी की कीर्ति तो बड़ी सुंदर (सबका अनन्त कल्याण करने वाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असामंजस्य है (अर्थात इन दोनों का मेल नहीं मिलता) इसी की मुझे चिन्ता है। (भनिति= कविता, कहावत,लोकोक्ति) (अँदेसा= शक,संदेह, संशय,खटका, अविश्वास) (भदेसा= भद्दा, कुरूप,बुरा)
तुलसीदास जी ने कहा-पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, असुर समेत जितने श्री रामजी के चरणों के उपासक हैं, मैं उन सबके चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो श्री रामजी के निष्काम सेवक हैं। (जे बिनु काम=निष्काम)
तुलसीदास जी ने कहा-जो श्री रामजी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो (धींगाधींगी= बदमाशी,उपद्रव) करने वाले, धर्मध्वजी (धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले दम्भी) और कपट के धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है। (भगत कहाइ-ऐसे लोगों को स्वयं को भक्त कहलाने की बड़ी इच्छा होती है) और जो वास्तव में भक्त हैं जैसे भरत जी, हनुमानजी आदि , ये कभी अपने को भक्त कहते ही नहीं हैं और न उन्हें किसी से कहलाने की इच्छा रहती है। हनुमानजी जामवंत जी तो बंदर भालू के वेष में हैं लेकिन उनके अंदर साधुता का वास है।
(बंचक= ठग) (कंचन= धन,संपत्ति) (कोह= क्रोध, गुस्सा) (किंकर= गुलाम, दास,सेवक, नौकर) (रेख= गिनती) (धिग= घिकू= धिक्कार) (धरम ध्वज=धर्म का आडंम्बर खड़ा करके स्वार्थ साधन करने वाला पाखंडी) (धंधक= काम-धंथे का आडंम्बर,जंजाल) “तिन्ह महँ प्रथम रेख”अर्थात् जबसे कलियुग शुरू हुआ तब से आज तक जिनका जन्म हुआ “जग’ कहने का भाव यह है कि जगत् भर में जितने अधम हैं,उन सबों में प्रथम मेरी गिनती है। पुनः,भाव कि सत्ययुग में देत्य खल, त्रेता में राक्षस खल और द्वापर में दुर्याधन आदि जो खल थे,उनको नहीं कहते। जो कलियुग में जन्मे उनमें से अपने को अधिक कहा। क्योंकि कलि के खल तीनों से अधिक हैं।
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