प्रेम,बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।
यही तो सती ने भी मन ही मन रामजी से कहा हे प्रभो! यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं और वेदों ने आपका यह यश गाया है कि आप दुख को हरने वाले है। (आरती=दुख)
बाबा तुलसी ने कहा- हे प्रभु पतितों को पवित्र करने का तो आपका प्रण (बाना) है, ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण कहते है।
बाबा तुलसी अपने आप को सभी पुरुषार्थ से हीन मानते है मुझ सा कोई दीन नहीं है और प्रभु आपका तो विरद ही दीनों का हित करना है आपको दीन अत्यंत प्रिय है। अतः मेरा और आपके जैसा कोई जोड़ इस संसार में नहीं है मेरा उद्धार तो केवल और केवल आप ही कर सकते हो रघुवंशमणि कहने का भाव रघुकुल के सभी राजा वीर, दानी, शरणागत की रक्षा करते आये है और आप तो उस कुल के शिरोमणि हो हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुख का हरण कर लीजिए। हरहु बिषम भव भीर।बिषम- यह भव संकट किसी और से समाप्त नहीं होगा, अतः भय भीत होकर शरण में आया हूँ क्योंकि आपका तो स्वाभाव है। कि (भीर= कष्ट, दुख, कायर, डरपोक)
लक्ष्मणजी ने रामजी से कहा-
भरत जी ने गुरु वसिष्ठ का उपदेश नहीं माना अतः गुरु जी मुझे भले ही द्रोही कहे पर हे तीर्थ राज प्रयाग आपकी कृपा से सीताराम जी के चरणों मेरा प्रेम प्रतिदिन बढ़ता रहें।
ऐसा भाव तो किसी साधु का ही हो सकता है।
हनुमान जी तो अपना पुरुषार्थ तो मानते ही नहीं। (साखामग= बन्दर) (मनुसाई= पुरुषार्थ)
अपने गुरुदेव के समक्ष यह भाव होना चाहिए कि न मेरे अंदर भक्ति है, न शक्ति है, मेरे में तो तमाम अवगुण भरे पड़े है अर्थात मै सभी साधनो से विहीन हूँ फिर भी आपने (गुरुदेव) मुझे दीन हीन जानकर मुझ पर कृपा की जो मुझे आपकी शरण मिली। अब मुझे विश्वास है कि आप हर तरह से मेरा कल्याण करेंगे।
दशरथ विश्वामित्र से कहा- राजा प्रेममग्न हो गए और पुत्रों सहित आगे खड़े हो गए। (बोले-)हे नाथ! यह सारी सम्पदा आपकी है। मैं तो स्त्री-पुत्रों सहित आपका सेवक हूँ।-हे मुनि! लड़कों पर सदा स्नेह करते रहिएगा और मुझे भी दर्शन देते रहिएगा।
निषादराज जी एक बहुत बड़े सत्य का निवेदन श्री भरतजी से करते हैं। वे कहते हैं कि वे कुबुद्धि और कुजाति के हैं पर जब से उन्हें प्रभु श्री रामजी ने अपनाया है उनका सम्मान हर जगह होने लगा है। (सूत्र) यह सिद्धांत है कि प्रभु के अपनाते ही जीव सबके मध्य गौरव पा जाता है और उसकी बढ़ाई सब तरफ होने लगती है।
जामवंत ने कहा- हे रघुनाथजी! प्रभु की कृपा से सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो गया। सुग्रीव राम जी से बोले हे प्रभो अब तो इस प्रकार कृपा कीजिए कि सब छोड़कर दिन-रात मैं आपका भजन ही करूँ। (दिन राती= जागते सोते दोनों अवस्था में क्योकि दिन जागने के लिए है और रात्रि विश्राम के लिए है= अर्थात निरंतर)
मनु-शतरूपा- दोनों हाथ जोड़कर और धीरज धरकर राजा ने कोमल वाणी कही- हे नाथ! आपके चरणकमलों को देखकर अब हमारी सारी मनोकामनाएं पूरी हो गई।
केवट ने कहा- हे प्रभु आपके दर्शन एवं आपकी कृपा (अनुग्रह) से वासना नहीं रही अतः कुछ नहीं चाहिए।
पर इस संसार सागर में श्री रघुनाथजी के समान शील और स्नेह को निबाहने वाला कौन है?
हम तो सेवक हों और सीतापति श्री रामजी हमारे स्वामी हो और यह नाता अर्थात सम्बन्ध अन्त तक निभ जाए, तब कही
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