साखामग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥

साखामग कै बड़ि मनुसाई

हनुमान जी की दीनता- हनुमान को ही अष्ट सिद्धि और नव निधियों का दाता कहा गया है और किसी देव के पास यह वरदान नहीं है माता (जानकी= सीता) ने हनुमानजी को यह आशीर्वाद दिया।

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।

साखामग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥

होहु तात बल सील निधाना। सीता जी ने छह आशीर्वाद हनुमान जी को दिए बलवान, शीलवान, अजर, अमर, गुण निधान, रघुनायक जी तुम पर प्रेम करे। महाभारत में कहा गया कि मन, करम, वचन, से किसी से भी द्रोह न करें, सब पर दया करें, यही शील का स्वरुप है धर्म, सत्य, सदाचार, बल, और लक्ष्मी हमेशा शील के आधार पर ही रहती है यदि शील नहीं है तो बल होना ना होना बराबर होता है।

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।

ऐसे भक्त हनुमान जी में लघुता और दीनता का भाव लंका नगर के बहुसंख्यक रखवालों को देखकर हनुमान ने मन में विचार किया कि अत्यंत छोटा रूप धरूँ और रात के समय नगर में प्रवेश करूँ। कीन्ह बिचार।हनुमान जी राक्षसो से डरते नहीं है वे तो स्वामी कार्य को सावधानी पूर्वक करना चाहते है। लघु रूप से दिन में भी काम नहीं चलेगा अतः रात्रि में प्रवेश उचित रहेगा। (पइसार= पैठ, प्रवेश)

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार॥

मच्छर के समान (छोटा-सा) रूप धारण कर नर रूप से लीला करनेवाले भगवान नरसिंह भगवान का स्मरण करके लंका को चले।

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥

हनुमान जी ने कहा- हे विभीषणजी! भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? (जाति का) चंचल वानर हूँ चंचलता बड़ा दोष है चंचल चित्त के कारण साधन का अधिकार नहीं रहता, वानर (पशु) कौन सी उपासना करेगा अतः सभी तरह से विधि हीन हूँ अतः कुल, जाति, स्वभाव, से सब प्रकार से हीन हूँ और तो और मेरी जाति को दोष लगा हुआ है किसी का नाम भर ले लो तो भोजन नहीं मिलता। (कुलीन= जिसका जन्म उच्च या उत्तम कुल में हुआ हो, पवित्र)

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

हनुमान जी ने राम जी से कहा बंदर का बस, यही सबसे बड़ा पुरुषार्थ (बहादुरी) है, कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है और डाल न चूके ऐसा समर्थ किसी अन्य पशु में नहीं है। अतः यह गुण तो मेरी जाति का है, इसमें मेरी कोई प्रभुता नहीं है। (हाटक= सोना, स्वर्ण)

साखामग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥

नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।

मैंने जो समुद्र लाँघकर सोने का नगर जलाया और राक्षसगण को मारकर अशोक वन को उजाड़ डाला, रावण के बाग की तरफ जब देवता भी नहीं देख सकते थे तब बानर किस गिनती में है? यह सब तो हे रघुनाथजी! आप ही का प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है।

सो सब तव प्रताप रघुराई । नाथ न कछु मोरि प्रभुताई

प्रभु आपकी मुद्रिका ने समुद्र पार कराया, और प्रभु सीता माँ की चूड़ामणि से इस पार आया, सीता जी की विरह अग्नि और आपके क्रोध के कारण लंका जली इसमें मैंने तो कुछ भी नहीं किया।

हनुमान जी क्या कह रहे है? मैं मंद मोहबस अज्ञानी  कुटिलों का शिरोमणि हूँ एक का अर्थ प्रधान या शिरोमणि है। 

एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।

मेरे भूलने का कारण में जीव हूँ अल्पज्ञ हूँ और माया के वश में हूँ इसलिए भूला फिरता हूँ और मेरी भूल तो  इतनी बड़ गई की स्वामी को ही भूल गया पर प्रभु आप तो ईश्वर है सर्वज्ञ और माया के स्वामी है आपने तो जानबूझ कर मुझे भूला दिया क्योंकि आपको तो पूर्ण ब्रह्म होने के कारण विस्मृति नहीं होती है। (अल्पज्ञ= थोड़ा ज्ञान रखनेवाला, नासमझ)

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें॥

हनुमान जी राम जी से बोले- हे प्रभु मुझ में अवगुणों की गिनती नहीं है फिर भी सेवक को प्रभु भूलते नहीं है जीव तो माया के वश में है उसका समर्थ नहीं की माया के पचड़े से निकल सके, माया का निस्तार तो आपके छोह अर्थात प्रेम से ही होगा। (निस्तार= छुटकारा, उद्धार) (छोह= प्रेम,कृपा)

नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥
अतिसय प्रबल देव तब माया। छूटइ राम करहु जौं दाया।।

माया से पार होने के दो उपाय है एक तो प्रभु आपके छोह से दूसरा आपके भजन से पर मैं तो भजन भी नहीं जानता अतः आपकी कृपा से ही माया से छुटकारा मिल सकता है। (सूत्र) माया से तरना कृपासाध्य है क्रिया साध्य नहीं।  

ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥

हनुमानजी ने राम जी से कहा- सेवक स्वामी के और पुत्र माता के भरोसे निश्चिन्त रहता है। प्रभु को सेवक का पालन-पोषण करना ही पड़ता है।

सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥

क्योकि प्रभु यह आप ही का स्वाभाव है।

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।।

शिवजी कहते हैं हे भवानी सुनो जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बंधन को काट डालते है, उनका दूत कहीं बंधन में आ सकता है? किंतु प्रभु के कार्य के लिए हनुमान जी ने स्वयं अपने को बँधा लिया। यही परम सत्य भी है और परम ज्ञान भी जो प्रभु प्रेम के बंधन से बंधा है उसे कोई बंधन नही बांध सकता यही कारण है कि ज्ञानी लोग संसार की मोह-माया का त्याग कर परमात्मा के भजन मे मग्न रहते है जिस कारण से वो पल भर मे संसार बंधन से मुक्त हो जाते है परन्तु जो मोह-माया के बंधन से बंधे है उनके लिए मुक्त होना कठिन ही नही असंभव है।

जासु नाम जपि सुनहु भवानी।भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।

हनुमानजी सीताजी की खोज करके उनकी करुण अवस्था श्री राम जी को बताते है। श्री राम की आँखें भर आती हैं, वे कृतज्ञ होकर कहते हैं  हे हनुमान! सुन, तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा (बदले में उपकार) तो क्या करूँ, हे पुत्र! सुन, मैंने मन में (खूब) विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता।

प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।

मनुस्मृति के अनुसार संसार  के हर जीव के ऊपर देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण माने गए है अर्थात देवताओं, ऋषियों और पितरों के ऋण से मुक्त होकर ही मनुष्य मोक्ष प्राप्त होता है। देव, मनुष्य और मुनि भी हनुमानजी के ऋणी हो गए, क्योंकि रावण के अत्याचार से सब दुखी थे और हनुमानजी ने सीताजी का पता लगाकर तथा लंका में जाकर उसके अभिमान को तोड़कर सबको सुख पहुँचाया। ऐसा कार्य किसी अन्य देहधारी से नहीं हुआ।

हनुमानजी ने सेवा करके स्वयं भगवान को ही अपना ऋणी बना लिया। सामान्यतः जीव भगवान का ऋणी होता है, पर यहाँ प्रेम और सेवा की महिमा ऐसी है कि स्वयं ईश्वर कहते हैं मैं तुम्हारे उपकार का बदला नहीं चुका सकता। इसलिए  देव, मनुष्य और मुनि सब हनुमानजी की महिमा का गान करते है।

सुर से स्वर्गलोक,और नर-मुनि से भूलोक (मर्त्यलोक) अर्थात स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों में हनुमान जी के समान उपकारी कोई नहीं है। पाताललोक का उल्लेख क्यों नहीं किया? पाताल में रहने वाले दैत्य और राक्षस रावण-के सगे सम्बन्धी है और भगवान के विरोधी माने गए हैं।
पहला उपकार सुग्रीव पर किया।

सुग्रीव वाली के भय से वन-वन भटकते फिरते थे, हनुमानजी ने ही रामजी और सुग्रीव का मिलन कराया, जिससे सुग्रीव को भय और दुख से मुक्ति मिली तथा राज्य भी प्राप्त हुआ। दूसरा उपकार समस्त वानर-सेना पर किया । जब सब वानर सीताजी की खोज में भटकते-भटकते प्यास से व्याकुल हो गए थे, तब हनुमानजी ने उन्हें संकट से बचाया और मार्ग दिखाया।

तीसरा और सबसे महान उपकार समुद्रतट पर किया। जब सम्पाति से समाचार मिलने पर भी समुद्र पार करने का उपाय किसी को न सूझा, तब सब वानर निराश होकर अनशन-व्रत करने लगे। उस समय हनुमानजी ने समुद्र लाँघकर लंका में प्रवेश किया, सीताजी का दर्शन किया और उनका समाचार लाकर सबके प्राण बचा लिये। (सूत्र) संसार में जब कोई व्यक्ति किसी का उपकार चुकाने में असमर्थ हो जाता है, तब उसके मन में लज्जा उत्पन्न होती है और वह सामने देखने का साहस नहीं कर पाता। इसी भाव से प्रभु कहते है।

प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।

भगवान स्वयं भक्त के प्रेम के सामने अपनी हार मान रहे हैं। यही रामभक्ति की पराकाष्ठा है जहाँ सर्वसमर्थ ईश्वर भी भक्त-सेवा के आगे अपने को ऋणी मानते हैं।
मैं तो यह भी नहीं चाहता कि मेरे मन में प्रत्युपकार का विचार उत्पन्न हो। क्योकि  प्रत्युपकार का अवसर तभी आता है जब उपकार करने वाला किसी संकट में पड़े। यदि मैं यह सोचूँ कि मैं हनुमान का उपकार चुका दूँ, तो मानो भीतर से यह कामना करनी पड़े कि हनुमान पर भी कोई विपत्ति आए, जिसमें मैं उनकी सहायता कर सकूँ। इसीलिए वे कहते हैं

सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।

अर्थात मैं ऋणी ही बना रहूँ, पर ऐसा अवसर कभी न आए कि तुम्हें किसी दुख या संकट में पड़ना पड़े। यह भाव सामान्य कृतज्ञता से बहुत ऊपर है। यहाँ भगवान का प्रेम पिता के समान हो गया है। इसी कारण कहीं प्रभु कपि कहकर संबोधित करते हैं और कहीं सुत कहकर।

कपि सम्बोधन वहाँ है जहाँ हनुमानजी के अद्भुत कार्य और पराक्रम की चर्चा है।पर सुत सम्बोधन में वात्सल्य उमड़ पड़ता है। पिता कभी यह नहीं चाहता कि पुत्र पर कोई संकट आए ताकि वह उसका उपकार चुका सके। वह तो चाहता है कि पुत्र सदा सुखी रहे, चाहे स्वयं सदा ऋणी क्यों न बना रहे। 

सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।

राम के सेवकों में हनुमान अद्वतीय हैं तभी तो शंकरजी कहते है। 

हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥

काश ! हम भी ये गुण अपने में लाना चाहें। इसमें क्या कठिनाई है?

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साखामग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
Mahender Upadhyay

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