संशय भ्रम शंका,जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥
असुर कहते है ये भगवान नहीं हो सकते और बुद्ध जन कहते है की प्रभु स्वतंत्र होकर भी कैसी लीला करते है।
शिवजी हे पार्वती राम की लीलाओं का प्रभाव पात्रता के अनुसार अलग-अलग होता है। जो अच्छे और सात्विक प्रवृत्ति के लोग (देवता स्वरूप) हैं, उनके लिए यह कल्याणकारी और आनंददायक है, लेकिन जो दुष्ट या आसुरी प्रवृत्ति (दनुज स्वरूप) के लोग हैं, उनके अहंकार और अज्ञान को यह लीला भ्रमित कर देती है। (सूत्र) रामकथा तो एक ही एक ही है भगवान के गुण,एक ही है पर श्रोता की वृत्ति के अनुसार फल भिन्न-भिन्न होता है।
रामजी में वास्तविक मोह नहीं है जो मोह दिखाई देता है, वह या तो लीला है अथवा मोहग्रस्त जीवों की दृष्टि का आरोप है।
इस प्रसंग में मोह-भ्रम दूर करने के लिये छह उदाहरण दिये गये हैं—
(1) सूर्य और अन्धकार,
इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥
(2) नट और उसके वेश,
भगवान लीला और अवतार में नट के समान अनेक वेश धारण करके नृत्य और अभिनय करते है। जिस समय वह जैसा वेश धारण करते है, उस समय वैसा ही आचरण और अभिनय भी करते है, परंतु उस अभिनय के अनुसार वह वास्तव में वैसे नहीं हो जाते। इसी कारण यहाँ प्रभु की उपमा नट से दी गयी है।
भगवान भी मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम आदि अनेक अवतार धारण करते हैं—
जिस समय जैसा अवतार धारण करते हैं, उसी के अनुरूप व्यवहार और लीला भी करते हैं।
रामावतार में तो एक ही समय दो भिन्न वेशों के परस्पर-विरोधी भावों का अद्भुत अभिनय राम-परशुराम संवाद में देखने को मिलता है।
इसी प्रकार युद्ध-लीला में शत्रु के हाथ बँध जाना, अथवा विरह आदि में विकलता प्रकट करना भी उनकी लीला मात्र है। वस्तुतः उस समय भी उनका विकलता से कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं होता, क्योंकि वे तो सहज आनन्द के निधान, स्वस्वरूपानन्दघन परमात्मा है।
(3) नेत्रदोष से चन्द्रमा का पीत दिखाई देना,
नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई॥
(4) दिशिभ्रम से सूर्य के उदय स्थान में भ्रम,
जब जेहि दिसि भ्रम होई खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा॥
(5) नौका में बैठे हुए मनुष्य का दूसरों को चलता हुआ देखना,
नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा।।
(6)जब बालक खेल खेल में घूमता है घूमते हुए बालकों को जगत भी घूमता प्रतीत होता है।
इन दृष्टान्तों द्वारा दो मुख्य बातें सिद्ध की गयी हैं।
पहली यह कि प्रभु में वास्तव में मोह का कारण ही नहीं है—“इहाँ मोह कर कारन नाहीं।” जैसे सूर्य के सम्मुख अन्धकार टिक नहीं सकता, वैसे ही जो स्वयं मोह-नाशक हैं, उनमें मोह का प्रवेश असंभव है। फिर भी यदि श्रीरामजी स्त्री-विरह-विलाप आदि करते दिखाई देते हैं, तो वह उनके नरलीला-वेष का स्वाभाविक आचरण है। जैसे नट अनेक वेश धारण करके अभिनय करता है, वैसे ही भगवान् नरवेष धारण करके मनुष्यों के समान व्यवहार करते हैं; पर उससे वे वास्तव में प्राकृत मनुष्य नहीं हो जाते।
दूसरी बात यह है कि जो लोग प्रभु में मोह देखते हैं, वह वास्तव में उनकी अपनी मोहग्रस्त बुद्धि का आरोप है। नेत्रदोष से चन्द्रमा पीत दिखाई देता है, दिशि भ्रम से दिशा बदलती हुई प्रतीत होती है, अथवा नौका में बैठा मनुष्य स्वयं को स्थिर और दूसरों को चलता हुआ देखता है, उसी प्रकार आसुरी अथवा मोहग्रस्त बुद्धि वाले लोग अपने अज्ञान का आरोप प्रभु पर कर देते हैं। वस्तुतः मोह प्रभु में नहीं, देखने वाले की दृष्टि में होता है।
विषयासक्ति,
बुद्धिमान्यता, (अपने ज्ञान का अभिमान)
कुतर्क,
विपरीत दुराग्रह, (दुराग्रह= हठधर्मिता, जिद, अनुचित हठ)
इन चारो के कारण ही भ्रम होता है
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