सलाह,रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
तारा ने भी बाली को इसी तरह समझाया है मंदोदरी और तारा ये दोनों ही पंच कन्या है।गहि कर चरन नारि समुझावा।।
अतः हे प्रियतम! श्री हरि से विरोध छोड़ दीजिए। मेरे कहने को अत्यंत ही हितकर जानकर हृदय में धारण कीजिए। (कंत= पति) (करष= मनमुटाव,रोष) (परिहरहू= त्यागना दो)
हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान ने जो करनी की, उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता। हे नाथ जिसके दूत का बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगर में आने पर हम सभी लोगों की बड़ी बुरी दशा होगी।
निज सचिव’ के जाने से तुम्हारा ही जाना मना जायगा।रावण को स्वयं जाने को नहीं कहती, क्योंकि वह ‘अभिमानी प्रकृति का है, शत्रु के सामने झुकना तो मानों वह जानता ही नही। (बसीठ=दूत) (जरठ=बूढ़ा) (बर=वर=उत्तम, श्रेष्ठ)
माल्यवंत अतिरिक्त मंत्री दुष्ट एवं अयोग्य है,माल्यवंत अत्यंत बूढ़ा राक्षस था। माल्यवंत रावण का नाना और श्रेष्ठ मंत्री था। और अन्य मंत्री तो आपके मुँह पर ये ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कह रहे हैं। ऐसे व्यक्ति ही खतरनाक होते है।
हे नाथ यही तो तुम्हारे भाई विभीषण ने भी कहा जो मनुष्य अपना कल्याण, सुंदर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, वह परस्त्री के ललाट को चौथ के चंद्रमा की तरह त्याग दे। (अर्थात् जैसे लोग चौथ के चंद्रमा को नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्री का मुख ही न देखे)
शंभु और अज का नाम लिया, क्योंकि रावण ब्रह्मा का पर पोता है। और शिवजी का सेवक हे।पर राम का द्रोही है,अतःहित नहीं हो सकता,क्योंकि ब्रह्मा और शिव राम के सेवक है। हे पतिदेव मेने सुना है।
यह तो अंगद ने भी कहा है-अरे दुष्ट! यदि तू श्री रामजी का वैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे।
बाल्मीक रामायण में रावण ने ही कहा है। चाहे मेरे शरीर के दो टुकड़े हो जाये,पर नम्र नही होऊँगा, यह मुझ में स्वाभाविक दोष है, में करूँ तो क्या करू स्वभाव का उल्लंघन तो में कर ही नहीं सकता।
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