सलाह,रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
उस रात आपको नींद नहीं आई यह बात मुझसे छिपी नहीं है उसके दुसरे दिनआपने सीता का हरण किया
हे प्रियतम! श्री हरि से विरोध छोड़ दीजिए। रावण को प्रभु से वैर करने को रोकती है इसका कारण यह नहीं कि सीता जी के आने से उसे इर्षा है,वह तो जानती हे कि प्रभु ब्रह्म हैं और सीताजी परम शक्ति हैं। वह नीति शास्त्र के वचन कहती है। रावण अनीति करता हे। बड़ों से वैर करना अनीति है।
इसमें नीति यह है कि जो अपने से बली हो उससे “साम” (साम का अर्थ है शान्ति और समझदारी के साथ व्यवहार) कर लेना चाहिए! (रहसि= एकांत)
हे नाथ तुम (बचन =बच +न) बच न सकोगे।
(बचन पागी=बच+न+पागी) तुम्हारी पगड़ी भी नहीं बचेगी।
पांव पकड़कर समझना स्त्री का धर्म है, तारा ने भी बाली को इसी तरह समझाया है मंदोदरी और तारा ये दोनों ही पंच कन्या है।
अतः हे प्रियतम! श्री हरि से विरोध छोड़ दीजिए।हरि तो सबके दुखों का हरण करते है मेरे कहने को अत्यंत ही हितकर जानकर हृदय में धारण कीजिए। क्योकि नीति बिना राज्य स्थिर नहीं रहता।
रावण अनीति पर है, अनीति के कारण राज्य नष्ट हो जायगा और वह मारा जायगा-यह सोचकर मन्दोदरी ने नीति के वचन कहे।
इसलिए तुमने चोरी से सीता का हरण किया।
हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान ने जो करनी की, उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता। हे नाथ जिसके दूत का बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगर में आने पर हम सभी लोगों की बड़ी बुरी दशा होगी।
निज सचिव के जाने से तुम्हारा ही जाना मना जायगा।रावण को स्वयं जाने को नहीं कहती, क्योंकि वह अभिमानी प्रकृति का है, शत्रु के सामने झुकना तो मानों वह जानता ही नही। (बसीठ=दूत) (जरठ= बूढ़ा) (बर=वर=उत्तम, श्रेष्ठ)
माल्यवंत के अलावा अन्य मंत्री दुष्ट एवं अयोग्य है,माल्यवंत अत्यंत बूढ़ा राक्षस था। माल्यवंत रावण का नाना और श्रेष्ठ मंत्री था। और अन्य मंत्री तो आपके मुँह पर ये ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कह रहे हैं। ऐसे व्यक्ति ही खतरनाक होते है।
हे नाथ यही तो तुम्हारे भाई विभीषण ने भी कहा जो मनुष्य अपना कल्याण, सुंदर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, वह परस्त्री के ललाट को चौथ के चंद्रमा की तरह त्याग दे। (अर्थात् जैसे लोग चौथ के चंद्रमा को नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्री का मुख ही न देखे)
शंभु और अज का नाम लिया, क्योंकि रावण ब्रह्मा का पर पोता है। और शिवजी का सेवक हे।पर राम का द्रोही है,अतःहित नहीं हो सकता,क्योंकि ब्रह्मा और शिव राम के सेवक है। हे पतिदेव मेने सुना है।
यह तो अंगद ने भी कहा है-अरे दुष्ट! यदि तू श्री रामजी का वैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे।
बाल्मीक रामायण में रावण ने ही कहा है। चाहे मेरे शरीर के दो टुकड़े हो जाये,पर नम्र नही होऊँगा, यह मुझ में स्वाभाविक दोष है, में करूँ तो क्या करू स्वभाव का उल्लंघन तो में कर ही नहीं सकता।
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