सलाह,बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥
पर रामजी सर्वज्ञ,सर्वसमर्थ होकर भी जामवंत से सलाह लेते है और
राम जी के सेवक हनुमान जी भी यही करते है।
रावण के मंत्री जो यह कह रहे थे।
पहले दिन के युद्ध में अंगद जी हनुमान जी और अन्य बन्दर भालुओं ने मिलकर लंका की आधी सेना को मार डाला हनुमान जी और अंगद जी ने के सिर काटकर रावण के सामने फेंके तब रावण अपने मत्रियो से कहता है।
बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥
मालयवंत ने तीन तरह से समझाया | प्रथम तो अपशकुन सुनाकर, फिर श्री राम जी की ईश्वरता का प्रतिपादन करके और तीसरे, राम विमुखता का फल कहकर।
प्रथम उपदेश ( विभीषणके समर्थन ) में अपशकुन नहीं कहे गये थे, मालयवंत ने समझाया- असगुन उसी समय प्रारम्भ हुए जिस समय सीता यहाँ आयी। इसका अर्थ यहीं कि लंका में सीता के साथ साथ अपशकुन आये, अतः सीता को लौटा देने पर असगुन भी स्वतः चले जायेगे। मलयवंत कहते हैं कि तुम लोगो को कुछ होश नहीं है। में बेठे बेठे देखा करता हूँ। कि लंका सदा (निरापद= बिना संकट के) रहा है। परन्तु जब से तुम सीता का हरण करके ले जाये हो तब से ऐसे असगुन लंका मे हो रहे हैं कि में उनका वर्णन नहीं कर सकता ।
पहिले अधर्म से प्रकृति में विकार आता है। पीछे अनिष्ट होता है। वही प्रकृति का विकार ही असगुन है। अतःअसगुन से अशुभ फल होना निश्चय है। असगुन भविष्य घटना का द्योतक है। अतः असगुन कभी खाली नहीं जाता।
राम जगत भर के आत्मा और प्राणों के स्वामी हैं। उनसे विमुख रहने वाला शांति कैसे पा सकता है? पहिले भी जो उनसे बिमुख हुए उनको भी सुख नही मिला है।
आगे मंदोदरी ने भी रावण के मरने पर कहा–
हे नाथ कृपानिधि ,कृपासिंधु ,दयानिधि ,दयानिधान ,दयासागर ये सब रामजी के ही नाम है राम कोई विशेष समूह या कोई विशेष जाति ,या वर्ग के नहीं है और तुम्हारे तो गुरु जी शंकर जी ने भी हम सभी को सुन्दर (सूत्र ) दिया है। (जंबुक= गीदड़,सियार)
अतः
अतः वैर छोड़कर बेदेही को रामजी को दे दो और दयासागर परम सनेही रामजी
का भजन करो। देहीः का भाव कि सीता तुम्हारे हाथ न लगेगी तुम चाहे जितना उपाय करो सीताजी प्राण ही छोड़ देंगी। क्योकि सीता जी देह सम्बन्धी विषय भोग विलास से पूर्ण उदासीन हैं। अतः तेरे वश में नहीं होंगी।भजहु कृपानिधि परम सनेही॥ क्योकि राम जी का स्वभाव तो
तुमने तो एक ही जन्म पाप किया है और रामजी की प्रतिज्ञा तो जन्म कोटिअर्थात करोडो जन्म की है।
रामजी परम सनेही है तुम्हारा हित ही करेंगे।
हे रावण यही तो विभीषण ने तुमसे कहा है।
हे रावण यदि तुम ये कहो की राम जी के भजने का परिणाम क्या होगा ? तो
रावण को माल्यवंत के वचन बाण के समान लगे। रावण बोला- अरे अभागे! मुँह काला करके यहाँ से निकल जा, माल्यवंत ने अपने मन में ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्री रामजी अब मारना ही चाहते हैं।
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