प्रेम,बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा॥
चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा।।
काम देव ने विचार किया कि अभी तक तो वीरों में मेरी गिनती रही, वीरों में ही प्रशंसा होती रही पर संत समाज में मेरी प्रशंसा कभी नहीं करते है पर अब वे भी मेरी परोपकारियों में प्रशंसा होगी। आज तक मेरी गिनती (षडरिपु= मानव के छह विकार अर्थात काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह एवं मत्सर) में रही,अब तक संत मेरी निंदा करते रहे, पर अब परोपकार के लिये शरीर छोड़ने से संत समाज में मेरी प्रशंसा सदा होगी।
पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही॥
और रामजी ने भी तो अपने सब भाई,और हनुमानजी से कहा धर्म अधर्म क्या है? पर हित सरिस-यह सत धर्म और पर पीड़ा यह असत का धर्म (लक्षण) है सब पुराणों और वेदों का यह निर्णय (फैसला) मैने तुमसे कहा है।
यह सरकार को मर्यादा पालकता है कि अपने वचन के प्रमाण में वेद पुराण और पण्डितो का मत उद्धृत करते है। व्यासजी के अठारहों पुराणों का सार ये दो वचन ही हैं-पहला परोपकार ही पुण्य है और दूसरा परपीड़ा ही पाप है।
संत और असंत के बीच अंतर इसी से किया जा सकता है-जो परहित करे-वह सज्जन, और जो पर पीड़ा दे- वह खल (दुष्ट)। यह नीति हमें जीवन जीने की प्रेरणा देती है। संत (सज्जन) व्यक्ति की पहचान यह है कि वह दूसरों का भला करता है, उनके लिए उपकारी होता है। उसके जीवन का उद्देश्य सेवा, दया और करुणा होता है।
असंत (दुष्ट) व्यक्ति की पहचान यह है कि वह दूसरों को पीड़ा पहुँचाने में आनंद अनुभव करता है, और उसका स्वभाव दूसरों को हानि पहुँचाना होता है।
क्या पर पीडा का फल अन्य योनि वालों को भी मिलता है? अन्य योनि वाले अज्ञानी होने के कारण भव भीर ही पाते है। पर नर शरीर ज्ञान का निधान है, वह यदि पर पीड़ा करता है तो उसे महा भव भीर सहनी पड़ती है। उसे बार-बार जन्ममरण के कष्ट एव चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण करते हुए महादुख भोगने पडते है।
यथाःरामजी जटायु से भी कहा
जटायुजी ने कहा भला! में ऐसा अवसर चूक सकता हूँ ।
जब नाम की इतनी महिमा है तब आप तो स्वयं साक्षात मेरे सामने है। “मुख आवा।”अर्थात मरते समय मुख से नाम निकलना अत्यंत दुर्लभ होता है। (अपतु= नीच,अकुशल) यथाः जैसे बालि
राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥ अर्थात इस देह से ईस्वर की प्राप्ति हो गई अब में किस कमी की पूर्ति के लिए देह को रखू? इससे जनाया कि जटायु के हृदय में देह का लोभ, देहासक्ति किंचित मात्र भी नहीं थी। और न ही कोई अन्य कामना है यह “तुम पूरनकाम” इस मुख वचन से भी सिद्ध है। (खाँगें= कमी, घटी,कसर, टोटा)
भक्त के दुख पर करुणा से आँसू आ गये।
तुम्हारी सदगति मेरे नाम-रूप आदि से नहीं, किंतु तुम्हारे कर्म से हुईं। उस कर्म को आगे कहते है।
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। अर्थात परोपकार से चारो फल प्राप्त होते है “गति पाई” यह मोक्ष है और “जग कछु दुर्लभ “अर्थ, धर्म, काम, की प्राप्ति इस संसार में जनाई !जब तक एहिक, वा परलौकिक स्वहित की कामना हृदय में रहेगी तब तक परहित हो ही नहीं सकता।(सूत्र) महाराज आज के समय में स्वार्थ तो सबके मन में वसता है। पर जिस महापुरुष के मन में परहित बसे उसके अन्त समय में मेरा आना दुर्लभ नही है। सबका हित करना भी भगवतोपासना ही है। हे सखा गण! अब सब लोग घर जाओ, वहाँ दृढ़ नियम से मुझे भजते रहना। मुझे सदा सर्वव्यापक और सबका हित करने वाला जानकर अत्यंत प्रेम करना।
यथाःजैसे
इस दृष्टि से “जग दुर्लभ कछु नाही “का भाव यही होगा,कि जो भी शुभ गति, वो चाहे वह उसको सुलभ है, इस जग में जन्म लेने पर जो गति चाहे उसे सहज ही प्राप्त कर लेते है।
देखिये मुक्ति तो भगवान ने अपनी ओर से दी यथाः “तन तजि तात जाहु मम धामा पर जटायुजी को भगति मांगने पर ही मिली यथाः “भगति माँगि वर “इस करण से मुक्ति से भगति का दर्जा अधिक बताया।
प्रभु ने सब सुखों के देने की बात कही, यह तो सत्य है, पर अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही।
जव सुख स्वरूप रघुवंश मणि का भजन ही न हुआ तो अन्य सुख किस काम का?
संत का उदय संतत कहा गया,क्योंकि इनसे विश्व को सुख है,जैसे चन्द्रमा और सूर्य का उदय सदा हुआ करता है और उनसे संसार का हित होता है; सूर्य और चन्द्र इन दोनों उपमाओं से रात-दिन निरंतर सुख देना कहा गया है। सूर्य दिन में सुख देता है और चन्द्रमा रात में,सुख देता है परन्तु संत दिन-रात दोनों में सुख देते हैं। सूर्य के प्रकाश से तम का नाश होता है, संत के ज्ञान प्रकाश से संसय मोह दूर होते हैं। सूर्य और चंद्रमा से सभी को सुख नहीं होता पर संतों को सर्व सुखद जनाया है! सन्तो से दिन रात जगत का हित हुआ करता है। संतो का उदय भी नित्य है। दुष्ट के उदय के समय भी इनका उदय तो रहता ही है। क्योकि इनके बिना संसार चल नही सकता। (इंदु= चंद्रमा) (तमारी= सूर्य, भास्कर) (संतत= सदा, निरंतर,बराबर,लगातार)
शिवजी कहते! जो क्षमाशील एवं परोपकारी होते हैं, वे मुझे वैसे ही प्रिय है।
जैसे खरारि श्री रामजी। (खरारि= श्री रामचंद्रजी) (जथा =जैसे)
पशु यदि परपीड़ा करे तो कह सकते की उनको ज्ञान नहीं है पर मनुष्य शरीर तो बड़े भाग्य से मिलता है कभी ईश्वर करुणा करके नर शरीर देता है यह शरीर ही साधन धाम मोक्ष का द्वार है। यथाः
जितनी भी मानसिक व्याधि है उनका तो मूल मोह ही है स्वारथ के लिए परमार्थ बिगाड़ लेते है।
भर्तृहरि जी जीने भी कहा है वे ही लोग सत्पुरुष हैं जो अपना स्वार्थ त्यागकर निःस्वार्थ भाव से दूसरों के कार्य का सम्पादन करते हैं। जो अपना स्वार्थ देखते हुए, भी दुसरों के कार्य में उद्यम करते हैं वे सामान्य मनुष्य हैं। और जो अपने स्वार्थ के लिये दूसरों को हानि पहुँचाते हैं, कष्ट देते हैं, दूसरों का काम बिगाड़ते हैं, वे मनुष्य रूप में राक्षस ही हैं। परन्तु हमारी समझ में नहीं आता कि वे कौन हैं, उनको किस नाम से पुकारा जाय कि जो बिना प्रयोजन ही दूसरों के हित की हानि करते है।
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बंदों अवधपुरी आति पावनि। सरजू सारि कलिकलुष नसावनि॥ सरयू का साधारण अर्थ स से सीता… Read More
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बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥ जितनी वन्दना मानस में बाबा तुलसी… Read More
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बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥ अवतार के हेतु, फल की आशा को… Read More