रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥
(1) शिव का पार्वती के साथ संवाद जिसे ज्ञान घाट कहा गया है।यह संवाद स्थल कैलास पर्वत है।
(2) कागभुशुण्डि का गरूड़ जी के साथ संवाद जिसे उपासना घाट कहा गया है। यह संवाद स्थल नीलगिरि पर्वत है। (सुसील= सीधा ,सरल) (उपासना= भक्ति)
(3) याज्ञवल्क्य जी का भारद्वाज जी के साथ संवाद को मानस में कर्म घाट कहा गया है। यह संवाद स्थल प्रयाग है। याज्ञवल्क्य जी ब्रह्मा के अवतार हैं।
(4) हनुमानजी और शिवजी की आज्ञा से श्रीअवधपुरी में रामचरितमानस का शुभारम्भ किया गया।
तुलसीदास का स्वयं के मन को दीनता के भाव से सुनाया- पर बाबा तुलसी की राम कथा का स्थल सर्वत्र है। (तीर्थराज= प्रयाग) (जंगम= चलता फिरता)
यह शरणागति घाट मार्ग है (सूत्र) आज के समय में राम को प्राप्त करने का इससे सरल उपाय कुछ है भी नहीं, क्योंकि जब तुलसी बाबा जैसे संत स्वयं अपने को अयोग्य बता रहे है तो हम और आप किस गिनती में है?
मानस के चारों संवाद में चार कल्प की रामकथा है। संवाद दो पक्ष में होता है जिज्ञासु प्रश्न करते है (विज्ञ= जानकार,बुद्धिमान, समझदार) समाधान करते है।चारों जिज्ञासु का उद्देश्य केवल और केवल एक ही है राम को जानना (राम कवन मैं पूछव तोही) है। और जिस प्रकार सरोवर के जल को चारों घाटों के माध्यम से प्राप्त कर सकते है। जिस तरह जल (कम या अधिक मात्रा) में सभी जीव को जरूरी है। (सूत्र) ऐसे ही सर्व शक्ति मान परमात्मा जिसका नाम कुछ भी हो सकता है सभी को जरूरी है। हाँ परमात्मा के अस्तित्व को मानने में समय जरूर लग सकता है। (विज्ञ= जानकार,बुद्धिमान, समझदार) (जिज्ञासु= जानने की इच्छा रखने वाला)
गोस्वामी जी अपने मन को कथा सुनाते है आधार संत समाज याज्ञवल्क्य भारद्वाज संवाद का लेते है और जब याज्ञवल्क्य जी कथा सुनाते है तो शिव पार्वती संवाद का आधार लेते है और जब शिव जी माता पार्वती को कथा सुनाते है तो कागभुशुण्डि गरूड़ संवाद को आधार लेते है।
मानस में गोस्वामी जी ने चार कल्प की कथा को एक साथ पिरोया है। कहने का अर्थ जो जैसा पाना चाहे पा सकता है सरोवर का जल तो सभी को सुलभ होता है। उसी प्रकार मानस रूपी सरोवर में राम रूपी शीतल पावन जल को पाने का अर्थात राम को जानने समझने के लिए चार संवाद है। जिसे चार घाट कहा गया है।
ये चार घाट की का अपना अपना अलग अलग रास्ता है ये सभी रास्ते हमें राम को पाने का मार्ग बताते है। ज्ञान प्राप्ति के माध्यम से, कर्मरत रहकर, उपासना द्वारा या फिर दीन भाव से याचक बनकर। रामजी को आप जैसे पाना चाहे पा सकते है राम तो सर्व व्यापी है।
रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥ सादर सुनु॥ राम चरित आदर पूर्वक सुनना चाहिए… Read More
बंदों अवधपुरी आति पावनि। सरजू सारि कलिकलुष नसावनि॥ सरयू का साधारण अर्थ स से सीता… Read More
अवध प्रभाव जान तब प्राणी। जब उर बसें राम धनु पाणी।। किस कारण अयोध्या को… Read More
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥ जितनी वन्दना मानस में बाबा तुलसी… Read More
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥ अवतार के हेतु, प्रतापभानु साधारण… Read More
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥ अवतार के हेतु, फल की आशा को… Read More