होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥

होइहि भजनु न तामस देहा।

विभीषण में दीनता का भाव- विभीषण हनुमान से बोल रहे है तामस तनु कछु साधन नाहीं। का भाव है कि हम पापी है! यही बात रावण ने भी कही अतः तामसी देह से दोनों भाई दुखी थे। पर दोनो भाइयों को भजन पर आस्था थी। तामसी को उल्लू की उपमा दी गई है, उल्लू सूर्य दर्शन से विमुख होते हैं। वैसे ही तामसी जीव ज्ञान से विमुख रहते है। मोह का अर्थ ही है धुंध या अंधकार इसीलिए इसे मोह-निशा कहा जाता है। जैसे अंधकार में कुछ दिखाई नहीं देता, इसी प्रकार मोहित व्यक्ति को भी मोह-होने पर कुछ सूझता नहीं। (सरोज= कमल)

तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।

साधन कर्म है हे हनुमान प्रभु को पाने का साधन तो सतोगुणी व्यक्ति ही कर सकता है रजो गुणी व्यक्ति भी थोड़ा बहुत कर सकते है पर महाराज तमोगुणी व्यक्ति से तो कुछ भी नहीं होता है अतः मेरे से साधन भी नहीं होता।(सूत्र) ये भजन का मूल मन्त्र है जब तक अन्न, विचार, व्यवहार, चरित्र, सही नहीं होगा तब तक इस शरीर से साधना नहीं हो सकती, परमार्थ नहीं हो सकता है।अर्थात प्रभु की प्राप्ति नहीं हो सकती।और महराज कलयुग तो रजोगुण प्रधान है। रावण और विभीषण के विचार भी एक जैसे है। यही तो रावण ने भी कहा- 

होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥

भव सागर से पार होने के दो ही उपाय है पहला प्रीति दूसरा विरोध रावण ने विरोध का रास्ता पकड़ा और रावण उस रास्ते पर मनसा वाचा कर्मणा से द्रण भी रहा।

सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥
होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।

हे हनुमान इसी से में ज्ञान हीन भी हूँ कछु साधन नाहीं। साधनो से ही भगवान मिलते है पर विभीषण की दीनता तो देखिये जिसकी प्रशंसा भगवान ने समर्पण, शरणागति के कारण स्वयं विभीषण से कहा मैने अवतार रावण को मारने के लिए नहीं लिया, ये काम तो बैकुंठ से बैठे बैठे ही कर देता पर मुझे तुम्हारे जैसे संत कहाँ मिलते?

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
हे हनुमान-
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।

हे हनुमान मुझ से तो वह कर्म भी नहीं बनता अतः में कर्म हीन हूँ क्योंकि साधन करना कर्म है प्रीति न पद सरोज मन माहीं।। का भाव उपासना से रहित हूँ जब कुछ साधन ही नहीं तब भला प्रीति कहाँ से हो अतः ‘तामस तन” कहकर तब साधन रहित होना-कहा और अंत में प्रीत का न होना कहा। हे हनुमान-कर्म और ज्ञान यदि न भी हो पर भक्ति हो तो भी काम बन जाता है पर विभीषण की चतुराई तो देखिये कि मेरा तो प्रभु के चरणो प्रेम भी नहीं है, इसी विभीषन के लिए रामजी कहते है।

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
तव पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥
राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥
पदराजीव बरनि नहिं जाहीं।मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥
सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।

 

हे हनुमान पद सरोज’ का भाव कि प्रभु के चरण कमलवत है,उनमें मन को भ्रमर होकर.लुब्ध रहना चाहिये सो हमारा मन मधुप होकर उसमें नहीं लुभाता, मुझ में तो यह भी नहीं है। (लुब्ध= आसक्त, मोहित) 
हनुमान जी ने कहा- हे विभीषणजी! सुनिए आपका तो केवल तामस तन है पर कुल तो उत्तम है यथाः

उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती।।
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥

और मै-भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? मै (जाति का) चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ, सब प्रकार से गया बीता हूँ प्रातःकाल जो हम लोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन नहीं मिलता। (कुलीन= उच्च कुल) 

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
बिषय बस्य सुरनर मुनि स्वामी।मैं पावँर पसु कपि अति कामी।

हे सखा! सुनिए, मैं ऐसा अधम हूँ, पर श्री रामचंद्रजी ने तो मुझ पर भी कृपा ही की है। भगवान के गुणों का स्मरण करके हनुमान जी के दोनों नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया।

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।

और सुनो विभीषण श्रीरामजी कुल की अपेक्षा नहीं रखते, वे तो केवल भक्ति का नाता मानते है। यथाः

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।

सदा प्रीती का निर्बाह करना कठिन है पर प्रभु सदा एक रस निबाहते है प्रभु को सेवक से कोई आशा नहीं है। पर वे तो सेवक पर बिना कारण ममता और प्रीत करते है। (निबाह= निर्वाह, गुज़ारा)

कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।।
को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा।

विभीषण स्वयं हनुमान जी से बोल रहे है बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।अर्थात चाहे  ब्रमाण्ड भर खोज डालें तो भी संत नहीं मिलते ओर जब प्रभु की कृपा होती है। तब घर बैठे संत मिल जाते हैं, ग्रन्थकार यहाँ उपदेश देते हैं कि जब इस तरह साधन करे जेसे विभीषणजी ने किया तब श्रीराम जी कृपा करें ओर तब सन्त मिलें! विभीषण जी का दीन भाव तो देखिये। 

नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।।

श्री रामचंद्रजी समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ हैं। श्री हरि चंदन के वृक्ष हैं तो संत पवन है।

राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥
सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
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Mahender Upadhyay

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