कर्म कमण्डल कर गहे,तुलसी जहँ लग जाय।सरिता, सागर, कूप जल
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।
मुहम्मद इक़बाल
अपने व्यक्तित्व (ख़ुदी) को इतना ऊँचा और पवित्र बना लो कि भगवान भी तुम्हारी इच्छा जानने के लिए पूछें—तुम क्या चाहते हो?
कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर।
पाछे-पाछे हरि फिरैं, कहत कबीर कबीर॥
कबीर- जब मनुष्य का मन गंगा के जल की तरह निर्मल (शुद्ध) हो जाता है,
तो स्थिति ऐसी हो जाती है कि भगवान स्वयं उसके पीछे-पीछे चलते हैं, और उसका नाम लेते हैं।
भक्ति, विनम्रता और सत्य—ये पात्रता के लक्षण हैं। वर्षा सब पर समान होती है
पर फसल उसी खेत में उगती है जहाँ बीज बोया गया है।
भगवान = सूर्य के समान है।
कृपा = प्रकाश की तरह है प्रकाश सब पर समान पड़ता है।
पात्रता = आँख की तरह है।
सूर्य का प्रकाश सब पर समान पड़ता है।
लेकिन—जिसकी आँख खुली है, वही देख पाता है। पर आँख बंद हो तो प्रकाश व्यर्थ है।
शबरी के पास न ज्ञान था, न वैभव फिर भी प्रभु रामजी स्वयं शबरी की झोपड़ी में क्यों गए?
क्योंकि वहाँ था—निर्मल प्रेम, प्रतीक्षा और समर्पण।
यहाँ पात्रता = सच्चा प्रेम
विभीषण जब सब कुछ छोड़कर रामजी की शरण में आए,
तो प्रभु ने एक क्षण भी देर नहीं की।
यहाँ पात्रता = शरणागति (समर्पण)
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