सलाह,की तजि मान अनुज इव ,प्रभु पद पंकज भृंग।

की तजि मान अनुज इव ,प्रभु पद पंकज भृंग।

जीवन में मनुष्य के पास यही दो मार्ग हैं दो ही गति हैं। बीच का कोई मार्ग नहीं है बीच के लिए कबीरदास जी ने सुंदर ही कहा है

कबीरा राम नाम कड़वा लागै, मीठे लागें दाम।
दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम।।
पहला रास्ता- भ्रमर बनो (भक्ति, ज्ञान, रस) भ्रमर बनकर अमृत लो।
भ्रमर उस साधक का प्रतीक है जो ईश्वर, भक्ति और सत्य के मकरंद का आस्वादन करता है। वह सुगंध और रस की ओर आकर्षित होता है, जिससे उसका जीवन मधुर और सार्थक बनता है।
दूसरा रास्ता- पतंग बनो (मोह, विनाश)पतंग बनकर अग्नि में जलो पतंग उस व्यक्ति का प्रतीक है जो बाहरी चमक मोह, अहंकार और विषय-विकार की ओर आकर्षित होता है। वह दीपक की लौ को सुख समझकर उसकी ओर दौड़ता है, पर अंततः जो मोह और अहंकार की अग्नि में स्वयं को जला देता है।
रावण भी ऐसे ही एक मोड़ पर खड़ा था एक ओर भक्ति का मार्ग था दूसरी ओर अभिमान की अग्नि पर उसने अभिमान को चुना वही उसका अंत बन गया

रामचरित के प्रसंग में रावण इसी पतंग की भाँति था। उसके सामने भक्ति और समर्पण का मार्ग भी था जैसा विभीषण ने अपनाया पर उसने अहंकार का मार्ग चुना,और वही उसका विनाश का कारन बन गया।
(सूत्र) संसार रूपी उपवन में दो प्रकार के जीव होते है
एक भ्रमर- जो पुष्पों पर बैठकर मकरंद लेता है,और सुगंध में जीवन बिताता है दूसरा पतंग- जो दीपक की लौ पर मोहित होकर उसी में अपने प्राण अर्पित कर देता है
इसलिए निर्णय आपका है भ्रमर बनोगे या पतंग?
लक्ष्मण ने पत्रिका के माध्यम से रावण को सलाह दी।अरे मूर्ख! बातें बनाकर अपनी आत्मा को घोखा देना शठता की पराकाष्ठा है। इस दोष से तेरे कुल  का सर्वनाश होगा। लक्ष्मण हनुमान से सुन चुके है, कि रावण ऐसी ही बातें किया करता  है। अतः लिखकर चेतावनी देते है कि यह समय बातें बनाकर मन के रिझाने का नही है। तुम सबसे विरोध करके  बच गये पर अब राम का विरोध कर बेठे अतः अब तुम नही बच सकते। केवल तुम्हारा ही नही सम्पूर्ण कुल का नाश अवश्य होगा। पुलस्ति ऋषि का उत्तम कुल है। इसलिये कुल के नाश होने पर भी खेद होता है! हे रावण यदि तुमको ब्रह्मा, रुद्र अर्थात शंकर का भरोसा हो तो उनको  भी छोड़ दो
उन दोनों की कौन कहे तीनो देव मिलकर भी तेरी रक्षा नहीं कर सकते, बातों से मन का रिझाना कि मैंने तो शिव-ब्रह्मा से ऐसे-ऐसे वरदान पाये है,और हमारे अमुख अमुख वीर है।सभी दिकपाल मेरे अधीन है,मेने केलास तक को उठा लिया,त्रिदेव मुझ से डरते हैतब नर-वानर किस गणना में है? ये सब के सब राम के सम्मुख बेकार ही है

(ऊबरे= रक्षा करना) (खीस= नष्ट, बरबाद,नाश) (घालना= करडालना)

की तजि मान अनुज इव ,प्रभु पद पंकज भृंग।

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ,जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि, सरन बिष्नु अज ईस॥

रावण सुन 

संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥
जौं खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही॥

हे रावण क्या तुम जयंत की व्यथा को नहीं जानते राम से विमुख होने पर उसका क्या हाल हुआ(बेतरनी=वैतरणी) यह एक प्रसिद्ध पौराणिक नदी है. जो यम के द्वार पर है। कहते है कि यह नदी बहुत तेज़ बहती है, इसका जल बहुत ही गर्म  और बदबूदार  है, और उसमें हडिडयां, लहू तथा बालआदि भरे हुए हैं। यह भी माना जाता है कि प्राणी के  मरने पर पहले यह नदी पार करनी पड़ती है, जिसमें उसे बहुत कष्ट होता है।यहाँ राम से विमुख होने का परिणाम बताया(ओही=उसे,उसको,उस व्यक्ति को) (समन= शमन=यम)(हरिजान= हरिकी सवारी, गरुड़) (बिवुध = देवता, देव) (विवुधनदी= सुरसरि, गंगा)

काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही ॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।।

मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी।।
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।

पर राम कृपा पात्र की  व्यवस्था इससे  उलटी  हैऔर यदि तुम रामजी की शरण में आ जओगे तो राम जी ने स्वयं ही कहा है

करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥

और रावण राम जी की शरणागत का फल, 

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥

जा पर कृपा राम की होई।ता पर कृपा करहिं सब कोई।॥

और रावण राम जी की शरणागत का फल परम फल, 

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।

लक्ष्मण ने कहा हे रावण, या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की भाँति प्रभु के चरण कमलों का भ्रमर बन जा। अथवा रे दुष्ट!  राम के बाण रूपी अग्नि में कुल सहित पतिंगा हो जा (दोनों में से जो अच्छा लगे सो कर) अब तुम्हें दो गति है। भृंग बनो या पतिंगा बनो।यदि अभिमान नही छोड सकते तो कुल के सहित पतंग बनोगे।

(सूत्र) आसक्त तो दोनों होते हैं भृंग भी और पतंग भी,पर परिणाम दो का अलग अलग होता है भृंग’ आनंद से रस लेते हैं और पतंग काल के मुख में पड़ते हैं।सो तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करो। (सूत्र) जीव की दो ही गति होती है! (इव= अव्यय, समान, सदृश) (भृंग= भौंरा) (यूथप= बंदरों का समूह) (सरानल =बाणरूपी अग्नि) (पतिंगा= तितली जैसा एक कीट)

की तजि मान अनुज इव ,प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल, खल कुल सहित पतंग॥

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Mahender Upadhyay

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