सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥

सहज सरल सुनि रघुबर बानी।

भारद्वाज मुनि के आश्रम से चलते समय रामजी ने मुनि से कहा- हे नाथ! बताइए हम किस मार्ग से जाएँ। भारद्वाज वाल्मीकि जी के शिष्य हैं ।यद्यपि राम रास्ता पूछते है। पर रामजी किसी स्थान का नाम नही लेते,जहाँ जाना है।भाव यह कि मुनिजी रास्ता भी बतलायें और गन्तव्य स्थान का भी निश्चय कर दें। आप भक्तों के अधीन होने के कारण भक्तों के बताए हुए मार्ग पर चलते हैं। रामजी सर्वसमर्थ परमात्मा होकर भी मुनि जी से स्वामी-सेवक भाव रखते हैं। इसी कारण वे भारद्वाज को आदरपूर्वक “नाथ” कहकर सम्बोधित करते हैं।

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।

ऐश्वर्या छुपाते देखकर मुनि जी मन ही मन हंसे कि ये हमसे रास्ता पूछते है।जिस प्रभु ने वामनावतार में केवल तीन पगों में समस्त जगत को नाप लिया, जिसके चरणों में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समा गया, फिर उसके लिये कौन-सा कार्य दुर्गम हो सकता है?

सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥

मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।।

मुनि हँसे कि आप तो परब्रह्म, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ होकर भी ऐश्वर्य छिपाकर हमसे साधारण मनुष्यों की तरह पूछ रहे हैं। इसी प्रकार रामजी ने वाल्मीकिजी, शरभंगजी, अगस्त्यजी, शबरीजी आदि भकतों से ऐश्वर्य छिपाना चाहा, तब वे हँसे हैं और रामजी से कह भी दिया है। हे रामजी सब के मार्ग दर्शक तो आप हैं, तो फिर आपका मार्ग दर्शक कौन बनेगा ? फिर भी इस समय आप लोकव्यवहार का पालन कर रहे हैं, अतः मेरे शिष्य आपको मार्ग दिखाने के लिये जायेगे।

कृपानिधाना कहने का भाव दण्डकारन वन में और भी ऋषियों के लिए सुख देना चाहते है! इस वन में तो अत्रि मुनि की ही प्रधानता है इसलिए अन्य वन में जाने की मुनि अत्रि से आज्ञा ली (सूत्र) भगवान अपने आचरण द्वारा हम सभी को यह उपदेश दिया कि जब हम छत्रिय वेश धारण कर मुनियो, विप्रो का सम्मान करते है! तो यही कर्तव्य अन्य जीवो को भी करना चाहिए!

तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।।

हे मुनि मुझ पर निरंतर कृपा करते रहिएगा और अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़िएगा। (संतत= सदा,निरंतर)

संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।।

धर्म धुरंधर रामजी के वचन सुनकर ज्ञानी अत्रि मुनि प्रेमपूर्वक बोले- चक्रवती महाराज के परम प्रतापी राजकुमार एक मुनि के सामने इस प्रकार कृपा की याचना करते है (अगस्त्यजी) ने कहा हे राम यह आपका स्वाभाव है कि सब कुछ मालूम होते हुए भी हमेशा आप सेवकों को सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसलिए हे रघुनाथजी! आपने मुझ से पूछा है। यथाः

संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई॥
धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।।

जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।।

धर्म धुरंधर प्रभु के वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेम पूर्वक बोले ब्रह्मा, शिव, सनकादिक सभी परमार्थवादी जिसकी कृपा की चाह करते है हे राम वही आप जिनको निष्काम भक्त प्रिय है और जो निष्काम भक्तो के प्यारे एवं दीनबंधु है। जिन्होंने ऐसे कोमल वचन कहे! (परमारथ बादी= जो ब्रह्म से साक्षात करने में प्रबल है,  ब्रह्म तत्व को जानने वाले, ज्ञानी) (अबिगत= जो जाना न जाए) (अलख= जो दिखाई न पड़े, जो नजर न आए,अगोचर) (अनादि= जिसका आदि या आरंभ न हो) (अनूपा= अतिसुंदर, निराला)

राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा॥
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।।

आपकी चतुराई जानी। चतुराई क्या? यह कि आप सबसे वड़े हैं इसी से ऐसी विनम्र वाणी बोले। अर्थात्‌ अपनी नम्रता से ही आप सर्व श्रेष्ठा है यही चतुराई है। अन्य भाव श्री, लक्ष्मी की चतुराई जानी कि क्यों सब देवताओं को छोड़कर लक्ष्मी जी ने आपको ही जयमाल पहनाई थी। ऐसा करके उन्होंने  बता दिया कि सब में आप ही बड़े हैं।श्री जी ने यह (शील=स्वभाव) देखकर ही आपका भजन किया। (सूत्र) त्रैलोक्य की प्रभुता भी  शीलवान का ही भजन करती है।

अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।।
जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।।
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।।

केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। भाव यह की कैसे कहू कि वन को जाओ, क्योकि आप तो सर्वत्र होआप तो अन्तर्यामी हो पुनः नाथ के जाने से सेवक अनाथ हो जायेगा, यह कैसे कहू कि मुझ को अनाथ करके जाइये अन्य भाव, आप स्वामी है अतः सेवक स्वामी को जाने को कैसे कह सकता है? आप नाथ है नाथ के बिना सेवक अनाथ होकर कैसे रहना चाहेगा?

ऐसा कह कर धीर मुनि प्रभु को देखने लगे उनके नेत्रों से जल बह रहा है, शरीर पुलकित है नेत्र मुख कमल में लगे हुए है अत्रि जैसा संत मन में विचार कर रहा है! कि मैने ऐसे कौन से जप तप किये कि मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियों से परे प्रभु के दर्शन पाये।

अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।

श्री रामजी ने अगस्त्यजी मुनि से कहा- हे प्रभो! अब आप मुझे वही मंत्र (सलाह) दीजिए, जिस प्रकार मैं मुनियों के द्रोही राक्षसों को मारूँ। प्रभु की वाणी सुनकर अगस्त्यजी मुस्कुराए और बोले-हे नाथ! आपने क्या समझकर मुझसे यह प्रश्न किया? जगत का दाता अगस्त जी से मांग रहा है।

अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही॥
मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी॥

वनवास के समय प्रभु श्रीराम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आ पहुंचे हैं। एक लम्बा समय वनवास में  काटना है तो एक निरापद जगह की तलाश में हैं। हे मुनि वर वह जगह बताइये जहां मैं सीता और लक्ष्मण के साथ कुछ समय व्यतीत कर सकू। सकल ब्रह्माण्ड का स्वामी, सर्वव्यापी द्वारा इस तरह का मासूम प्रश्न वाल्मीकि को मानो निःशब्द कर देता है वाल्मीकि सुन कर मुस्करा पड़ते हैं।

अब वे क्या उत्तर दें?  कौन सी जगह उन्हें बता दी जाये जहां राम न रहते हों  राम तो कण कण में व्याप्त हैं, इस ब्रह्माण्ड में कोई जगहअछूती नहीं जहाँ राम ना हो। अतः राम के इतने सरल वचन सुनकर वाल्मीकि साधु साधु कह पड़ते है। (निरापद= आपत्तिरहित, निर्विघ्न, बिना संकट के)

तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई॥

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ॥

सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥

कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥

सुतीक्ष्ण जैसा संत बोल रहे मेरे हृदय में दृढ़ विश्वास नहीं होता, क्योंकि मेरे मन में भक्ति, वैराग्य या ज्ञान कुछ भी नहीं है। 

मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं॥
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥

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Mahender Upadhyay

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