जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥ पार्वती विवाह, भृंगी के अवाहन पर सभी भूत, प्रेत, पिशाच,… Read More
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥ विवाह शिव जी का हो रहा है कैलाश पर कोई… Read More
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥ पार्वती विवाह- हे पर्वतराज! ब्रह्मा जी ने जो ललाट पर लिख दिया… Read More
श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधार। तुलसीदास जी ने कहा-गुरु जी के चरण कमल के रज से… Read More
मोहि सम यह अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।। गुरु संत की महिमा- नारायण दास नाभा जी कहते है भगवान, भगवान का भक्त, भक्ति, और गुरु-कहने को… Read More
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।। मनुष्य शरीर का मिलना सबसे दुर्लभ है। स्वर्ग के देवी-देवता… Read More
प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥ माया का प्रभाव - गरुण जी कोई साधारण नहीं है… Read More
यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।। माया का परिवार-संतो द्वारा सुन्दर व्याख्या माया अकेली नहीं है इसके परिवार… Read More
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥ माया जड़ है जैसे कुल्हाड़ी स्वयं कुछ नहीं कर… Read More
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।। लक्ष्मणजी के वचनों में ही क्या, उनके हृदय में, उनके आचरण… Read More