केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी।
संत कहते है संसार सागर को पार करने का सबसे सरल उपाय यदि कोई है तो वह भक्तों का यशोगान है इसके अलावा दूसरा सरल उपाय नहीं है भक्तो के गुणों को गाइये, निस्संदेह भगवत्प्राप्ति हो जायेगी। नहीं तो जन्म -जन्मान्तरों में किये गए अनेक पुण्य भुने हुए बीज की तरह बेकार हो जायेंगे (भुने हुए बीज पुनः अंकुरित नहीं होते)। उनसे कल्याण न होगा, फिर हमको कई जन्मों तक पछताना पड़ेगा। जो भक्तो के चरित्रों को गाता है, श्रवण करता है तथा उनका अनुमोदन करता है, वह भगवान को पुत्र के सामान प्रिय है, उसे भगवान अपनी गोद में बिठा लेते है। सबरी केवल और केवल भाव से राम जी का इंतजार प्रतिदिन सुबह शाम हर समय कर रही थी इसके कारण आश्रम के चारो ओर पत्तो पत्तो एवं पक्षियों से राम राम की आवाज आ रही थी। शबरी जी पूर्व जन्म में बड़ी रूपवती रानी थी महल में सदा पर्दे में रहती थी शबरी का साधु संतो में बड़ा भाव था, लेकिन एक तो रूपवती, दूसरे रानी, तीसरे मर्यादा, चौथे उच्च कुल में जन्म इन हेतुओ से बाहर निकल कर संतो के दर्शन नहीं कर पाती थी यह बात शबरी को बहुत खलती थी तीर्थ राज प्रयाग का कुम्भ पर्व आया, सोची वहां चल कर खूब जी भर कर संतो के दर्शन करुँगी, परन्तु संयोग ऐसा बना की वहां भी वही पर्दा यहाँ तक कि श्री त्रिवेणी स्नान करते समय भी पर्दे में स्नान करना पड़ा. तब शबरी को बहुत दुख हुआ और अपने रूप, रानीपने तथा लौकिक बंधनो को बहुत धिक्कारते हुए श्री त्रिवेणी जी से वर माँगा कि अगला जन्म मेरा नीच कुल में हो, कुरूपा होऊ, भागवत चरणों में मेरा प्रेम हो, वही रानी दूसरे जन्म में शबरी हुई।
केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥
जैसे गाय के थन देखने में चार है परंतु चारों के अंदर एक ही सामान दूध भरा रहता है, वैसे ही भक्त, भक्ति, भगवान, गुरु ये चारों अलग अलग दिखाई देने पर भी सर्वदा सर्वथा अभिन्न है। चारों में से किसी एक से प्रेम हो जाने पर तीनो के तीन स्वतः ही प्राप्त हो जाते है। इनके श्रीचरणों की वन्दना करने से समस्त विघ्नों का पूर्णरूप से नाश हो जाता है। भक्त चरित्रों के समान दूसरी और कोई वस्तु सुन्दर नहीं है। इसी लिए कहा गया है।
भक्त भक्ति भगवंत गुरु चतुर नाम बपु एक।
इनके पद बंदन किएँ नासत विध्न अनेक॥
(सूत्र) इसी कारण भगवान ने स्वयं कहा कि मेरे अवतार लेने का मुख्य कारण केवल और केवल मेरे भक्त ही है।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥
रामजी शबरी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने राम को घर में आए देखा, तब मुनि मतंगजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया। (सूत्र) जरा शबरी की सरलता पर विचार अवश्य करें कि शबरी अभी भी गृह समझ रही है आश्रम का ध्यान ही नहीं है।
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥
कमल सदृश नेत्र और विशाल भुजाओं वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किए हुए सुंदर, साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरीजी लिपट पड़ीं।
यह सबरी की दशा है कि प्रेम में मग्न हो गईं, मुख से वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही है। (सरसिज= कमल)
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं॥
शबरीने कहा- मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जाति की और अत्यंत मूढ़ बुद्धि हूँ।
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥
अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी मैं मंदबुद्धि हूँ।
शबरी की पूजा में केवल और केवल भक्ति ही है तीन तरह से पूजा करती है पद ,आसन,और नैवेद्य, रघुनाथजी ने कहा तुमको स्तुति करने की आवश्यता भी नहीं है। (अघारी= पाप के शत्रु ,पाप के नाशक) (पापनाशन= वह जो पाप का नाश करेअर्थात रामजी) क्योकि
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥
रघुनाथ जी ने कहा– हे भामिनि! तुम मेरी बात सुनो। मैं एकमात्र भक्ति का नाता मानता हूँ। जो मेरी भक्ति करता है वह मेरा है और मैं उसका हूं। भक्त और भक्ति के बराबर किसी भी रिश्ते को नहीं मानता।
अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही।।
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना।।
हे भामिनि! जाति पाँति, कुल , बडाई, द्रव्य, बल, कुटुम्ब, गुण, चतुराई सब कुछ हो, पर यदि भक्ति न हो तो वह मनुष्य बिना जल के बादलों के समान शोभाहीन और व्यर्थ है। रामजी कहते हैं –पुरुष-स्त्री का भेद या जाति, नाम और आश्रम आदि मेरे भजन मे कारण नहीं है, केवल भक्ति ही एक कारण है। जो मेरी भक्ति से विमुख हैं तो फिर वह यज्ञ, दान, तप और वेदाध्ययन कितना ही कर ले मुझे पा ही नहीं सकता।
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।
मो सम कौन कुटिल खल कामी।
तुम सौं कहा छिपी करुनामय, सब के अंतरजामी।।
तुलसी बाबा ने तो साफ साफ कहा- मेरे समान टेढ़ा , दुष्ट और कामी इस संसार में कौन होगा। हे दयालु भगवान, आपसे कौन सी बात छिपी हुई है, आप तो सबके हृदय की बातें जाननेवाले हैं।
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को ।।
(परम) सुंदर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाथों पर प्रेम करते हैं, ऐसे एक रामजी ही है। इनके समान निष्काम अर्थात निः स्वार्थ हित करने वाला (सुहृद्= मित्र,सखा) और मोक्ष देने वाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपा से मंदबुद्धि तुलसीदास ने भी परम शांति प्राप्त कर ली, उन रामजी के समान प्रभु कहीं भी नही है।
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।।
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है। अगर भक्ति नहीं है तो ये सभी दस गुण या उपलब्धि व्यर्थ है संतों का मत- जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- ये सभी गुण भक्ति के बाधक भी है सुग्रीव जी ने रामजी से कहा भी–
सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई॥
ए सब राम भगति के बाधक। कहहिं संत तव पद अवराधक॥
भक्ति को जल कहा गया है वशिष्ठ जी ने रामजी से कहा-
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई।।
राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
हे शबरी! मैं आपसे यह नवधा भक्ति कहता हूँ, जिसको आप ध्यानपूर्वक सुनें और मन में विचार करें।(सूत्र) सावधान कहने का भाव चंचल मन है जो सब दुखों का कारण भी मन ही है अतः सुनने में मन का स्थिर होना जरूरी है अनादर से सुनना ना सुनने के बराबर है।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
जिस भक्ति के बिना सभी गुण व्यर्थ है अब रामजी कहते है पहली भक्ति है कि हमेशा संतों का, अर्थात सदाचारी लोगों का साथ रहे। ना जाने किस महात्मा के द्वारा परम तत्व (रामजी) की प्राप्ति हो जाये दूसरी भक्ति है कि प्रभु कथा, अर्थात ऐसी कथाएं जो हमें जीवन के आदर्शों की प्रेरणा देती हैं, उनमें रति अर्थात प्रेम रखें। बाल्मीक जी ने तो राम जी को रहने का स्थान भी बताया।
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥
तीसरी भक्ति है अमान अर्थात मान या अहंकार कपट और छल को त्याग कर अपने गुरु जी की सेवा दास बनकर एवं उसका गुणगान करें। चौथी भक्ति यह है कि गुरु जी से सुनकर कपट छोड़कर मेरे गुणों का गान करें। भगवान ने कहा- ना ही में वैकुण्ठ में रहता हूँ और ना ही में योगियों के हृदय में रहता हूँ मेरे भक्त जहाँ गुण गान करते है में तो वही वास करता हूँ।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
पांचवी भक्ति, जो कि वेदों में प्रकाशित की गयी है, प्रभु के मंत्र का जाप अर्थात जो भी आपका आदर्श है उसके विचारों का बार बार मनन, जिससे आपकी एकाग्रता आपके आदर्श से भटके नहीं। बिना विश्वास के देवताओं से साक्षात्कार नहीं होता।
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥
सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा।।
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥
मंत्र का मनन करने से पंचक्लेशों से (त्राण=रक्षा) हो, उसे मन्त्र कहते हैं।जब तक मन्त्र चेतन अथवा जागृत नहीं होता, तब तक उसकी शक्ति सुप्त अवस्था में रहती है।
मन्त्र केवल अक्षरों का समूह नहीं है; उसमें दिव्य शक्ति होती है, किंतु वह शक्ति जागरण की प्रतीक्षा करती है।
जिस महापुरुष ने स्वयं जप, तप और अनुष्ठान द्वारा उस मन्त्र को जागृत कर लिया हो, वह किसी योग्य शिष्य को मन्त्रदीक्षा देता है, तब कभी-कभी दीक्षा के उसी क्षण शिष्य को उसकी अनुभूति होने लगती है। और यदि तत्काल अनुभव न हो, तो गुरु द्वारा बताए गए विधि-विधान, नियम और पथ्य का पालन करते हुए साधना करने पर कुछ समय में मन्त्र चैतन्य का अनुभव होने लगता है।
यहाँ पथ्य का विशेष महत्व है।
जैसे रोगी केवल औषधि लेने से स्वस्थ नहीं होता, उसे परहेज भी रखना पड़ता है, उसी प्रकार साधक को भी आहार, व्यवहार, वाणी, विचार और दिनचर्या की शुद्धता बनाए रखनी होती है।यदि लंबे समय तक साधना करने पर भी कोई अनुभव न हो, तो शास्त्र दो संभावनाएँ बताते हैं—
(1) शिष्य अभी पूर्ण अधिकारी नहीं है।
(2) गुरु स्वयं उस मन्त्र में सिद्ध नहीं है।
और यदि उसी गुरु के अन्य शिष्यों को अनुभव प्राप्त हो रहा हो, तो साधक को अपनी पात्रता, श्रद्धा, नियमपालन तथा अंतःकरण की शुद्धता पर पुनः विचार करना चाहिए।
अंततः मन्त्र-सिद्धि केवल शब्दों की पुनरावृत्ति से नहीं होती,
वह श्रद्धा, गुरु-कृपा, शुद्ध जीवन और निरंतर साधना से प्रकट होती है।जब मन्त्र हृदय में जागृत हो जाता है, तब वह केवल उच्चारित ध्वनि नहीं रहता वह साधक के जीवन को भीतर से रूपांतरित करने वाली दिव्य शक्ति बन जाता है।
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
छठवीं भक्ति है अपने शील, अर्थात चरित्र के निर्माण के लिए सदा प्रयत्नरत रहना और जीवन के अनेकों कर्तव्यों का पालन करते हुए भी कर्मों से एक वैराग्य बनाये रखना (भगवद्गीता में भी यह मत्त्वपूर्ण जीवन सिद्धांत “कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” के रूप में दोहराया गया है)। इसके साथ साथ हमेशा स्वयं को अच्छे कामों में ही व्यस्त रखना चाहिए।
यहाँ सज्जन धर्मा का अर्थ केवल सामान्य सामाजिक सज्जनता नहीं है, बल्कि उन गुणों से है जो मनुष्य को भगवान को प्रिय हैं।
ज्ञान दया दम तीरथ मजन।जहाँ लगि धर्म कहत श्रुति सजन॥
ज्ञान, दया, इन्द्रियनिग्रह, तीर्थस्नान आदि जितने भी धर्म वेदों ने बताए हैं, वे सज्जनों के धर्म हैं।
सज्जन के दो अर्थ हैं—
1. सज्जन पुरुष — जिनका आचरण उत्तम हो, जो सत्य, दया और संयम से युक्त हों।
2. संतजन — जो केवल बाहरी सदाचार तक सीमित न रहकर भगवान में स्थित हो गए हों।
भगवान स्वयं बताते हैं कि उन्हें कैसा भक्त प्रिय है—
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष शोक भय नहिं मन माहीं॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥
जो माता-पिता, बंधु, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर और परिवार इन सबकी ममता रूपी डोरियों को समेटकर अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है जो समदर्शी है जिसकी कोई सांसारिक इच्छा नहीं जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं ऐसा सज्जन मेरे हृदय में बसते है।
(सूत्र) सदाचार मनुष्य को समाज में सम्मान दिलाता है,पर अनन्य प्रेम और ममता का भगवान के चरणों में समर्पण मनुष्य को भगवान का प्रिय बना देता है।
अर्थात सज्जनता का चरम रूप संतत्व है, और संतत्व का सार है— ममता का संसार से हटकर भगवान में स्थिर हो जाना। (निरत= काम में लगा हुआ, लीन) (दम= इन्द्रयनिग्रह= इंद्रियों और काम इच्छाओं को वश में रखना) (दमसील= मन समेत समस्त इन्द्रियों को वश में रखने वाला)
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
सातवीं भक्ति है इस पूरे जगत को हरि अर्थात अपने प्रेम की सबसे ऊंची अभिव्यक्ति के रूप में देखना और सभी से उतना ही प्रेम करना (वसुधैव कुटुम्बकम!)। संत अर्थात ज्ञानी और अच्छे काम करने वाले लोगों को हरि से भी अधिक समझना चाहिए। यह महत्त्वपूर्ण है की यहाँ स्वयं भगवान अपने मुख से कह रहे हैं की ज्ञानी और सज्जन लोगों को भगवान से ऊपर मानें। यह लक्षण भक्तों में होना चाहिए।
सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत् केहि सन करहिं बिरोध॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥
आठवीं भक्ति है संतोष का लाभ लेना और सपने में भी दूसरों के दोष ना देखना,(सूत्र) आज समाज में जब स्कूल के दिनों से लेकर पूरे जीवन भर हर जगह सर्वश्रेष्ठ होने के लिए आवश्यकता से अधिक दबाव का सामना करना पड़ता है, यह (उक्ति= वाक्य,विचार) हम सभी के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह शरीर प्रारब्ध के अधीन है, इसलिए भोजन, वस्त्र और जीवन-निर्वाह की अत्यधिक चिंता करना व्यर्थ है। जितना प्रारब्ध में निर्धारित है, वह समय पर प्राप्त हो ही जाएगा। साधक का कर्तव्य संग्रह की चिंता नहीं, बल्कि भगवान के स्मरण है।इसलिए जो कुछ सहज रूप से प्राप्त हो जाए, उसी में संतोष करना चाहिए। असंतोष मन को अशांत करता है, जबकि संतोष साधना का आधार बनता है।इसी प्रकार दूसरों के दोष देखने की आदत भी साधक के लिए बहुत बड़ी बाधा है। जब हम किसी के दोषों पर दृष्टि रखते हैं, तो वास्तव में हमारा अपना अंतःकरण मलिन होता है। दोष देखने से सामने वाले का कुछ नहीं बिगड़ता, पर हमारी शुद्धता अवश्य नष्ट होती है। प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रेरणा, संस्कार और प्रारब्ध के अधीन होकर कार्य करता है। जब मनुष्य स्वयं अनेक बंधनों में बँधा हुआ है, तब उसके दोषों को पकड़कर बैठना उचित नहीं। इसलिए साधक को दूसरों में दोष नहीं, गुण देखने का अभ्यास करना चाहिए।जो व्यक्ति गुणग्राही बन जाता है, उसका मन धीरे-धीरे निर्मल होने लगता है। और जब अंतःकरण से दोष-दृष्टि समाप्त हो जाती है, तब मनुष्य भीतर और बाहर से एक हो जाता है—उसके जीवन में दंभ, कपट और द्वैत नहीं रहता।यही साधना की सरल दिशा है—प्रारब्ध में संतोष, व्यवहार में गुण-दृष्टि, और अंतःकरण में निर्मलता। ऐसा व्यक्ति संसार में रहते हुए भी भीतर से स्वतंत्र हो जाता है। (द्वैत =ईश्वर और जीव का अलग-अलग अस्तित्व मानना)
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नवीं भक्ति है सरलता और सहज अवस्था में आती है। इस अवस्था में सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना।सरलता ही संतो का लक्षण है।
सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥
सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए।।
प्रिय तो मुझे सभी है पर भक्त मुझे विशेष प्रिय होता है
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥
इन नवों भक्ति में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो। इनमें से किसी एक प्रकार की भक्तिवाला मुझे प्रिय होता है।
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।
फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वह आज तेरे लिये सुलभ हो गयी है। उसी के फलस्वरूप तुम्हें मेरे दर्शन हुए, जिससे तुम सहज स्वरूप को प्राप्त करोगी। इस प्रकार भक्ति का वर्णन करने के बाद भगवान शबरी को अपना परम पद प्रदान करते हैं।
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।।
शबरी ने सब कथा सुनकर भगवान के मुख के दर्शन कर, उनके चरणकमलों को हृदय में धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्याग कर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरिपद में लीन हो गई, जहाँ से लौटना नहीं होता।


