तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।

भगवान रामजी का विभीषणजी के माध्यम हम सभी को दिव्य संदेश- मनुष्य की ममता नौ जगह रहती है, माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार में, जहाँ जहाँ हमारा मन डूबता है वहाँ वहाँ हम डूब जाते हैं।

जननी जनक बंधु सुत दारा।तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥

सभी से  ममता हटाकर  प्रभु को ही प्रेम  करना  यही डोरी बटना है।  क्योंकि ये सब के सब  राम भक्ति के बाधक हैं, इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है। अर्थात सारे सांसारिक संबंधों का केंद्र मुझे बना लेता है।

सब कै ममता ताग बटोरी।मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥

क्योंकि ये सब के सब रामभक्ति के बाधक हैं।बाबा तुलसी ने सुग्रीवजी और लक्ष्मण जी के माध्यम से इस भाव का दर्शन कराया, पर सुग्रीव में यह भाव राम जी की परीछा लेने पर आया

सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई॥
ए सब राम भगति के बाधक। कहहिं संत तव पद अवराधक॥

गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।।

जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई॥
मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥ 

संसार से सम्बन्ध जोड़ने पर ममता बन्धन दोष कहलाता है, और भगवान से सम्बन्ध जोड़ने पर वही ममता गुण कहलाता है  प्रेम और भक्ति बन जाता है।  जैसे नदी का जल यदि इधर-उधर फैल जाये तो कीचड़ बन जाता है, पर  वही जल नदी रूप में गंगा में मिल कर पवित्र हो जाता है।

भक्त का मन जब संसार के विषयों से हट जायेगा तब वह सभी में अपने प्रभु का दर्शन पाता है 

सब कै ममता ताग बटोरी।मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥

सांसारिक ममत्व का त्याग एक ही बार में नहीं होता
रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥
जैसे ज्ञानी पुरुष नदियों और सरोवरों के जल के सूखने के समान धीरे-धीरे ममता का त्याग करते हैं, वैसे ही संसार की आसक्ति धीरे-धीरे घटती है। भगवान में जरा सी भी ममता लग जाने से प्रपंच की ममता कुछ कम होने लगती है। इस प्रकार जीव जब एक-एक विषय से ममत्व रूपी तागों को बटोरकर भगवान के चरणों में बाँधने लगता है, तब धीरे-धीरे उसका मन संसार से हटकर प्रभुमय जाता है और वह धीरे धीरे निर्मम होने लगता है,और तब यह भाव आता है।

सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत् केहि सन करहिं बिरोध॥

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥

समदरसी इच्छा कछु नाहीं।हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥

मनुष्य की इच्छा की परीक्षा इस कसौटी पर होती है कि उसके मन में हर्ष, शोक और भय का प्रवेश होता है या नहीं। यदि इनमें से कोई भी विकार उत्पन्न हो, तो समझना चाहिये कि हृदय में कहीं-न-कहीं इच्छा या ममता अभी बाकि है।
हर्ष पदार्थ की प्राप्ति का सूचक है और शोक पदार्थ की हानि का सूचक है। इसी प्रकार भय भी किसी प्रिय वस्तु के नष्ट होने की आशंका से उत्पन्न होता है। अतः जब तक ममता रहती है, तब तक हर्ष, शोक और भय बना रहता है, और जब ममता छूट जाती है, तब मनुष्य समदर्शी हो जाता है। (सूत्र) जहाँ ममता है वहाँ हर्ष-शोक-भय है, और जहाँ निर्ममता है वहाँ समता और शान्ति है।

अस सज्जन मम उर बस कैसें।लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥ 

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।धरउँ देह नहिं आन निहोरें

रामजी ने कहा हे विभीषण ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन बसा करता है। मुझको तो केवल तुम सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। मैं और किसी के निहोरे से (कृतज्ञतावश) देह धारण नहीं करता। ऐसे सन्त मुझे इतने प्रिय हैं कि मैं उनका दुख देख नहीं सकता,अतः उनकी रक्षा के लिए अवतार लेता हूँ।

और भगवान बोले ऐसे सज्जन से हनुमान जी भी हठपूर्वक मित्रता करते हैं।

एहि सन हठि करिहउँ पहिचानि।साधु ते होइ न कारज हानी।।

हनुमानजी कहते हैं सज्जन कौन है, जो बोलते, उठते, सोते, जागते हरि नाम लेता है, भगवान का सुमिरन करता है वह सज्जन हैं, सागर की तरह दूसरे को बढते हुए देख उमड़ता हो वो सज्जन हैं, जो सबकी ममता प्रभु से जोड दे, प्रभु के चरणों में छोड़ दे “सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणंब्रज” वह सज्जन है।

करहुं सदा तिनकर रखवारी।जिमि बालक राखै महतारी।।

भगवान श्री रामजी ने नारद जी को कहा है- मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ, जैसे माता बालक की रक्षा करती है। बच्चे को  माँ  एक मिनिट भी दूर नहीं रखती उसी तरह भगवान भी जीव से दूर नहीं रहता है।

एक मात्र परमात्मा ही हैं जो हर विपत्ति व काल से भी रक्षा करने में समर्थ हैं। संसार में ऐसा कोई जन्मा ही नहीं जो किसी को सुखी कर सके या उसकी सदैव रक्षा कर सके। यदि रक्षा का बन्धन ही बांधना है तो एकमात्र परमात्मा से ही बांधे, जिसका तरीका स्वयं भगवान राम ने बताया और यदि एक बार बंधन परमात्मा से बंध गया, डोर लग गयी तो वही रक्षा करते है। 

इसलिए बंधन वही रखें जो की (काल=मृत्यु) से भी रक्षा कर सके अतः हमको चिंता ना करके केवलऔर केवल चिंतन करना है चिंतन भी संसार का नहीं केवल और केवल प्रभु का इसलिए भगवान पर हमेशा आश्रित रहिये इसी लिए कहा गया निर्बल के बल  राम। (प्रपत्ति=पूर्ण समर्पण,शरणागति)

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