मानस चिंतन,माया,मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥

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मानस चिंतन,माया,मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥

माया जड़ है जैसे कुल्हाड़ी स्वयं कुछ नहीं कर सकती जब कोई  कुल्हाड़ी को उठा कर पेड़ पर प्रहार करता है तब पेड़ को काटा जाता है ठीक वैसे ही माया भगवान से शक्ति पाकर काम करती है पर  माया को  जो शक्ति प्राप्त होती है वह  जीव के कर्म अनुसार मिलती है  संसार के समस्त कर्म माया के अधीन है  माया में सबसे पहला स्थान मोह का है दूसरा स्थान लोभ लालच का है। और तीसरा स्थान नियत का है चौथा स्थान क्रोध का है और पांचवा स्थान अहंकार का है जैसे दूसरे की जमीन अगर नियत खराब हो गई तो हम माया के प्रभाव से साम दाम दंड भेद लगा कर उस जमीन के लिए झूठ बोलने के लिए तैयार हो जाते है यदि सफल हो गए तो लोभ बड़ जायेगा और ऐसे काम को अवसर मिलने पर पुनः करते है अतः अहंकार आ जायेगा और  यदि विफल हुए तो क्रोध आ जायेगा और उस क्रोध के कारण  पाप पुण्य का डर भी नहीं रहेगा इसके बाद हम पतन के रास्ते पर चलने लगते है। 

भगवान के द्वारा संसार का निर्माण किया गया हैअतः सारा जगत ब्रम्हाण्ड भगवान का है इसमें आपका कुछ भी नहीं है पर जीव अज्ञान के कारण इस ब्रम्हाण्ड से कुछ भाग निकाल कर स्वयं का (संसार =जगत) बना लेता है उसके द्वारा बनाये गए जगत में मेरा पुत्र ,मेरी पत्नी ,मेरे बच्चे ,मेरा घर ,मेरे मित्र ,मेरा धन यही माया जीव को प्रभु से दूर ले जाती है । 


मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥  

जीव का अनेक जन्मों से माया का  सम्बन्ध है। उसका स्वरूप जानने में उसकी रुचि रहती है  जन्म-मरण-आदि का भी कारण माया ही है में ओर मेरा आ जाने पर ही दूसरों के प्रति भेद बुद्धि होना अनिवार्य  है। अतः मैं और  मोर के बाद तू ओर तेरा भाव स्वतः ही आ जाता है।मैं, मेरा, तू, तेरा की भ्रान्तिपूर्ण धारणा ही माया है, जो सभी जीवों को भरमाए रखती है। यही में और मोर! ही सभी  अनर्थो की  जड़ है। (सूत्र) माया में हम तभी तक फसे है जब तक माया को अपनी समझ बैठे है माया तो (माया पति= भगवान) की है जब माया आपकी है ही नहीं तो माया जिसकी है उसी को सौप दो आप माया से मुक्त हो जाओगे। पर साहिब यह इतना भी आसान नहीं है।  (निशा=रात, रात्रि)

में और  मोर को ही मोह निशा कहा है।स्वयं लछ्मण जी ने निषाद राज से भी कहा

 मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा॥

कालनेमि राक्षस ने भी रावण से यही कहा 

मैं तें मोर मूढ़ता त्यागू। महामोह-निसि सोवत जागू। 
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥

माया का कार्य क्षेत्र क्या है? आपका मन जहाँ तक जाता है जो कुछ आप सोचते है,  वह माया है। तब प्रश्न होता हैं कि भगवान में भी तो मन लगता है। तब तो वह भी तो माया हुई  इसी से कहते हैं. कि माया दो प्रकार की है। विद्या माया यह माया जीव में दिव्य गुण उत्पन्न करती है, भगवान में  मन लगने  पर वह निरंतर भजन करता है। और निरंतर भगवान का संयोग चाहता है, तब  भगवान प्रेम  पूर्वक  वह पूर्ण बुद्धि  देते है  जिससे वह प्रभु को प्राप्त हो जाता है।  (गो=इन्द्रियां ,बुद्धि)  (गोचर=विचरना,रमना )

वेद शास्त्र कहते है कि संसार भगवान और माया दोनों के मिलन से बना है कबीर दास जी  द्वारा सुन्दर व्याख्या- 

एक राम दशरथ का बेटा, 
एक राम घट घट में लेटा। 
एक राम है जगत पसारा, 
एक राम है जगत से न्यारा। 

रामजी ने स्वयं कहा 

मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा।।

मंदोदरी ने रावण से रामजी की महिमा में कहा  भगवान का  हँसना भी माया  है

अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला।।

और प्रत्येक जीव भी तो ईश्वर का अंश है में मेरा तू तेरा के कारण इस माया में लिप्त है 

ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।।
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।।
आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।।
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।।

हे जीव! जब से तुम  भगवान से अलग हुआ तभी से तुमने  शरीर को अपना घर मान लिया। 

भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।

मैं अरु मोर तोर तैं माया। से कोई बचा भी नहीं

माया बस स्वरूप बिसरायो तेहि भ्रम ते दारुण दुःख पायो।।
चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया।।
प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी।।

भरत जी माया में  फसे नहीं इसका कारण  भरत जी का अपना कुछ है ही नहीं जो कुछ भी है वह सब राम जी का है चित्रकूट जाते समय और प्रयाग राज से यही कहा

बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥ 
संपति सब रघुपति कै आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही॥
तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई॥

प्रयाग राज से यही कहा(निरबान=मुक्ति) (आन= मर्यादा,शपथ,सौगंध) (रति=प्रेम, आसक्ति, प्रीति, अनुराग)

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।।

क्योकि भरत जी के जीवन का आधार तो राम जी के चरणों में है। (अनुदिन=प्रतिदिन)

सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।