ga('create', 'UA-XXXXX-Y', 'auto'); ga('send', 'pageview'); संशय भ्रम शंका,जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥ - Manaschintan
संशय भ्रम शंका,जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥

संशय भ्रम शंका,जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥

जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही

काकभुशुण्डि का संशय! हे पक्षीराज! मुझे यहाँ निवास करते सत्ताईस कल्प बीत गए॥
इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा।।
वो जगह कौन सी है शंकर जी ने कहा
उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला।।
राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।।
काकभुशुण्डि जी ने कहा हे पक्षीराज!
करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना।।
मैं यहाँ सदा श्री रघुनाथजी के गुणों का गान किया करता हूँ और चतुर पक्षी उसे आदरपूर्वक सुनते हैं। श्री राम अवतार प्रत्येक कप्ल में एक बार ही होता है उसे देखने के लिए भुसण्डि जी बराबर आया करते है!और लगभग पांच वर्ष तक अयोध्या में रहते है जैसे लोग रामलीला देखने आया करते है!उन पांच वर्षो तक नीलगिरि पर्वत पर कथा जो अविरल चलती है नहीं होती अतः मेने राम जी के 27 अवतार देखे है!

कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं॥
जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा।।
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ।।
क्योकि
इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥
हे पक्षीराज गरुड़जी!हे प्रभो! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ॥श्री रामजी की कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिए। भुसुंडि जी कहते है की राम जी की कृपा और अपनी जड़ता अर्थात मोह का वर्णन करता हूँ!सरकार जड़ता पर क्रोध नहीं करते बल्कि कृपा करते है!
जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥
राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥
हे पक्षीराज गरुड़जी!साधारण बच्चों जैसी लीला देखकर मुझे मोह (शंका) हुआ कि चैतन्य और आनंद की राशि (परब्रह्म) प्रभु यह कौन (महत्त्व का) चरित्र (लीला) कर रहे हैं॥ ऐसा ही संदेह गरुण जी को हुआ था जबकि दोनों ही भगवान के यथार्त रूप को जानने वाले है कि राम चिदानंद संदोह है!यहाँ तो विकार की सम्भावना ही नहीं है! यह तो इनका चरित्र है पर क्या चरित इनके योग्य है?तभी माया व्याप गई! (इव= अव्यय, समान, सदृश,जैसा,मानिंद) (चिदानंद= चिदात्मा,आनन्द और चैतन्य स्वरूप, ब्रह्म) (संदोह= दूध दोहना, समूह,झुंड)
एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।
सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर॥
श्री रामजी मुझ से बहुत प्रकार के खेल करते हैं, जिन चरित्रों का वर्णन करते मुझे लज्जा आती है! (ब्रीडा= संकोच,लज्जा) (इव=समान, सदृश,जैसी)
मोहि सन करहिं बिबिधि बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा॥
पर साधारण बच्चों जैसी लीला देखकर मुझे मोह (शंका) हुआ!
प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह।
कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह॥
हे पक्षीराज! मन में इतनी (शंका) लाते ही श्री रघुनाथजी के द्वारा प्रेरित माया मुझ पर छा गई, परंतु वह माया न तो मुझे दुःख देने वाली हुई और न दूसरे जीवों की भाँति संसार में डालने वाली हुई
एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया॥
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥
सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं॥
भ्रम तें चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा॥
हे पक्षीश्रेष्ठ! श्री रामजी ने मुझे जब भ्रम से चकित देखा, तब वे हँसे। वह विशेष चरित्र सुनिए, उस खेल का मर्म किसी ने नहीं जाना, न छोटे भाइयों ने और न माता-पिता ने।
तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ॥
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सीता के मन में सन्देह (सीता ने कहा-) हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान(नन्हें-नन्हें से)होंगे,राक्षस तो बड़े बलवान,योद्धा हैं॥    (जातुधान= राक्षस,असुर)(भट= योद्धा)
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
मेरे हृदय में बड़ा भारी संदेह होता है (कि तुम जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे!)।यह सुनकर हनुमान्‌जी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का (अत्यंत विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत बलवान्‌ और वीर था॥ (भूधराकार= पर्वताकार)
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती, परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है। (अत्यंत निर्बल भी महान्‌ बलवान्‌ को मार सकता है)॥
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।
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