मम दरसन फल परम अनूपा।
भगवान राम का स्वभाव सहज और सरल है। ऐसा स्वभाव जिस भक्त का होता है उस भक्त को भगवान तुरंत अपना बना अर्थात अपनी शरण में ले लेते हैं। जिसको रामजी अपना बना लेते हैं अगर वह रामजी और रामजी के कार्य को भूल भी जाए तब भी अपनाए हुए भक्त का रामजी त्याग नहीं करते हैं। भगवान ने स्वयं कहा (सहज=प्राकृत,स्वाभाविक,जो वास्तव-रूप है)
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पावहि निज सहज सरूपा।।
(सूत्र) सहज स्वरूप जीव का क्या है? माया रहित सरूप ही जीव का सहज सरूप है।
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥
पर माया में लिप्त होने से जीव का सहज सरूप नहीं रहता।
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
मायाबस स्वरुप बिसरायो। तेहि भ्रमतें दारुन दुख पायो ॥
माया के कारण जीव अपने स्वरूप को भूल गया और उसी भ्रम से अनेक दुःखों को प्राप्त हुआ।और जब यह माया हटती है, तब जीव अपने सहज स्वरूप को प्राप्त करता है। सहज स्वरूप तक पहुँचने के साधन—
पहला ज्ञानमार्ग से देखने पर असत् का त्याग होकर सत् की प्राप्ति होती है; जीव समझ लेता है कि वह शरीर, मन और संसार नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्यस्वरूप है।दूसरा भक्तिमार्ग से देखने पर जीव का अपने स्वामी भगवान् में प्रेम स्थिर हो जाता है और संसार की आसक्ति छूट जाती है।
दोनों ही अवस्थाओं में माया और असत् का बन्धन समाप्त होकर जीव अपने नित्य, शुद्ध और आनन्दमय स्वरूप में स्थित हो जाता है।
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पावहि निज सहज सरूपा।।
सहज सरूप के प्राप्ति के समान और किसी पदार्थ की प्राप्ति नहीं है! अतः इसको अनूपा कहा! सहज स्वरूप की प्राप्ति ही (कैवल्य=मुक्ति) पद है। यह मेरे दर्शन का फल है। मेरे साक्षात्कार के बिना मुक्ति नही होती। मेरा दर्शन (साक्षात्कार) परम अनूप है। जो मेरा स्वरूप ही बना देता है। (कैवल्य= मोक्ष, मुक्ति)(अनूप= उपमारहित, अतिसुंदर,निराला)
प्रभुदर्शन किस प्रकार होता है और जीव का सहज स्वरूप कैसा है? वेद रीति यह कहती है कि करोड़ों कल्पों तक ज़प, तप, होम, योग, यज्ञ और ब्रह्म ज्ञान में रत रहे तब अन्तरबाहर शुद्ध होकर भक्ति प्राप्त होती हे, तब दर्शन होते हेँ। यह साधन साध्य (क्रियासाध्य रीति) है। पर प्रभु के दर्शन केवल और केवल कृपा साध्य रीति से होता है! क्योकि प्रभु ने स्वयं कहा है! (अघ=अपवित्र, पापी,पाप)
सन्मुख होय जीव मोय जबहीं। कोटि जन्म अघ नासों तबहीं॥
करुणासिंधुजी के अनुसार व्यासजी, वाल्मीकि, अगस्त्य, शुकदेव, सनकादि, नारद, हनुमान तथा शिवजी का एक-एक स्वरूप परधाम में राम जी के समीप नित्य सेवा में रहता है,यही सहज सरूप है जो परधाम में सदा भगवान के पास रहता है। और एक-एक स्वरूप इस प्रकृति मण्डल में आचार्य रूप से प्रकट होकर जीवों का मार्गदर्शन करता है। प्रकृति मण्डल में जो स्वरूप दिखाई देता है, वह लोकशिक्षा, उपदेश और लीला के लिए प्रकट होता है
अर्थात जीव का परम और सहज स्वरूप संसारगत उपाधियों से परे, भगवान के चरणों में नित्य सेवा और प्रेम में स्थित रहना है। वही उसकी वास्तविक पहचान और परम सिद्धि है। जीव का सहज स्वरूप ही सच्चिदानंद है।
संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥
जीव माया के कारण भूला रहता है। जिन्हें प्रभु की कृपा प्राप्त है हो जाती है, वे जब चाहें अपने असली स्वरूप को सँभाल कर समाधि में लीन हो सकते हैं। क्योंकि पूर्ण भगवत कृपा प्राप्त जीव को फिर माया नहीं व्याप सकती।
अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई।।
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।
जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि।।
संसार में जीव जो भिन्न-भिन्न योनियाँ दिखाई देते हैं, अर्थात् संसार में जो भी भेद दिखाई देता है, उन सबका आधार शुभाशुभ कर्म और गुणों का संयोग है।
परंतु जब समस्त शुभ और अशुभ कर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो जाते हैं, तब जीव अपने उस “सहज स्वरूप” को प्राप्त होता है जो वाणी और मन की पहुँच से परे है— “शुद्ध, चेतन, अमल, अविनाशी और सहज सुखराशि।” वही जीव का वास्तविक स्वरूप है।
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥
उस अवस्था को वही जान सकता है जिसे उसकी प्राप्ति हुई हो परन्तु प्राप्त होकर भी उसका पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस अनुभूति को शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सकता है। शास्त्र केवल संकेत कर सकते है।सहज स्वरूप कब होगा जब जीव यह समझे कि “मैं यह देह नहीं हूँ; मैं चेतन, निर्मल, सहज आनन्दराशि, अविनाशी, निर्मम, निरामय और एकरस आत्मस्वरूप हूँ।
स्त्री, पुत्र, मित्र, शत्रु आदि जितने भी सम्बन्ध दिखाई देते हैं, वे सब शरीर के सम्बन्ध हैं, आत्मा के नहीं। ये सब माया और नश्वर हैं। माया जड़ है, जबकि जीव चेतन है। जीव ईश्वर का अंश है भगवान स्वामी, अंशी, भोक्ता और शेषी है, तथा
जीव उनका अंश, सेवक और भोग्य है।
जब जीव इस सत्य को मान लेता है, तब उसकी दृष्टि संसार से हटकर भगवान की ओर स्थिर होने लगती है। अर्थात सहज स्वरूप की प्राप्ति केवल ज्ञान नहीं, बल्कि ऐसी आत्मस्थिति है जिसमें जीव देहाभिमान, ममता और संसारगत मिथ्या सम्बन्धों से ऊपर उठकर अपने को भगवान का नित्य दास और प्रेमस्वरूप अंश अनुभव करता है।


