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- रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥
- बंदों अवधपुरी आति पावनि। सरजू सारि कलिकलुष नसावनि॥
- अवध प्रभाव जान तब प्राणी। जब उर बसें राम धनु पाणी।।
- बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
- जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥
- बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥
- स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥
- सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥
- नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा।।
- एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे॥
- राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥
- जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥
- सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥
- तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥
- तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥
- श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधार।
- मोहि सम यह अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।
- नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।।
- प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥
- यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।।
- माया,मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥
- माया,एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।।
- माया मरी न मन मरा, मर मर गये शरीर।
- अहंकार,नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥
- मानस चिंतन,भरी उनकी आँखों में है कितनी करुणा।
- प्रेम,बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
- मानस चिंतन,जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहि प्रीती ।
- कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता।।
- श्रवन सुजसु सुनि आयउँ, प्रभु भंजन भव भीर।
- गहि सरनागति राम की, भवसागर की नाव।रहिमन जगत उधार को,
- जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
- परहित,वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।
- सरल,गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्हसन आयसु मागा॥
- सरल,जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करऊँ दुराऊ॥
- सरल,रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥
- सरल,अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥
- सरल,तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।
- सरल,नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा॥
- सरल,हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥
- सरल,तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन॥
- सरल,दुनिया में जो देव पुजे है सभी पुजे है प्रभाव से।
- सलाह,भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥
- सलाह,दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना।।
- सलाह,कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
- सलाह,बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥
- सलाह,उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिंरचि पूजेहु बहु भाँती॥
- सलाह,सब के बचन श्रवन सुनि, कह प्रहस्त कर जोरि।
- सलाह,की तजि मान अनुज इव ,प्रभु पद पंकज भृंग।
- सलाह,जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
- कर्म कमण्डल कर गहे,तुलसी जहँ लग जाय।सरिता, सागर, कूप जल
- सलाह,रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥
- सलाह,सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥
- सबरी प्रसंग, केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥
- मन्दोदरी,चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा॥
- सलाह,रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
- बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
- रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी॥
- राम जी के जीवन में (कई बेहतरीन योग फिर भी इतना संघर्ष)जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
- सलाह,मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा॥
- जामवंत, कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
- कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।
- नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥
- जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥
- सलाह,बार बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही॥
- जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ। एकछत्र रिपुहीन महि।
- राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥
- असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।।
- कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।
- मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
- गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति
- होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥
- ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥
- सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥
- नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
- मेरा मुझमें कुछ नहीं,जो कुछ है सो तोर। तेरा तुझकौं सौंपता,
- उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।
- कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥
- संसय,बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा॥
- मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं॥
- संसय,एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ।।
- पार्वती विवाह,देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा।।
- सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
- रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।।
- तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ॥
- नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥
- जब तें रामु ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाए ॥
- संसय,देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा॥
- पार्वती विवाह,जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब सें सिव मन भयउ बिरागा।।
- रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥
- प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना॥
- ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।।
- प्रार्थना में दीन भाव जरूर बनाए रखें। दीन दयाल बिरिदु संभारी।
- मानस चिंतन,जय जय राम कथा|जय श्री राम कथा।
- पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही॥
- मानस चिंतन,सहज सरल सामान्य साधारण,मम दरसन फल परम अनूपा।
- सलाह सम्मति विचार विमर्श परामर्श,नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥
- हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥
- दीनता,नम्रता छोटा,मेरा मुझ में कुछ नहीं,जो कुछ है सो तोर ।
- विश्वास भरोसा,बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
- संशय भ्रम शंका,जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥
- राम कथा कलिकामद गाई । सुजन संजीवन मूर सुहाई ।।
- पार्वती विवाह,सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥
- प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
- तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥
- साखामग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जान निहारा॥
- चंद्रोदय,कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई॥
- जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥
- परहित बस जिन्ह के मन माहीं ।तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥
- बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।
- गुरु महिमा,गुर बिनु भव निध तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥
- मनुष्य शरीर,देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई।।
- प्रार्थना,सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥
- नाम की महिमा,रामनाम की औषधि खरी नियत से खाय। अंगरोग व्यापे नहीं
- मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।।