रामचरितमानस चिंतन विश्वास भरोसा

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रामचरितमानस चिंतन विश्वास भरोसा

काकभुशुण्डि ने कहा हे पक्षीराज गरुड़! निज-सुख (आत्मानंद) के बिना क्या मन स्थिर (शांत) हो सकता है? वायु का स्थिर करना (दुष्कर = जिसे करना कठिन हो= कष्टसाध्य) है , वैसे से ही मन का स्थिर होना भी कठिन है! वायु-तत्त्व के बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वास के बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? उत्तर कभी नहीं! इसी प्रकार श्री हरि के भजन बिना जन्म-मृत्यु के भय का नाश नहीं होता (थीरा=स्थिर) (परस=स्पर्श)

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥

गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।

काकभुशुण्डि ने कहा हे गरुड़! जो प्राणी उसे प्रेम के साथ खोजता है, वह सब सुखों की खान इस भक्ति रूपी मणि को पा जाता है। राम का दास अधिक क्यों है? क्योकि राम जी को दास प्रिय है पर कौन से? जिनको किसी की कोई भी आशा नहीं है!

भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी।।
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।।

तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा।जेहिगति मोरि न दूसरि आसा।।

काकभुशुण्डि ने कहा हे गरुड़! पंडितजनों की सेवा बिना क्या शील (सदाचार) प्राप्त हो सकता है? हे गोसाईं! जैसे बिना तेज (अग्नि-तत्त्व) के रूप नहीं मिलता॥ क्या विश्वास के बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? इसी प्रकार श्री हरि के भजन बिना जन्म-मृत्यु के भय का नाश नहीं होता 

(बुध=बुद्धिमान एवं विद्वान् व्यक्ति)

सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाँई॥
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा।।

काकभुशुण्डि ने कहा हे गरुड़! चैन, सुख।भक्ति के लिए विश्वास आवश्यक है। बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती और बिना भक्ति के राम द्रवित नहीं होते तथा राम कि कृपा के बिना जीव को विश्राम (मोक्ष) नहीं मिलता। इस प्रसंग में श्री राम-कृपा की ही प्रधानता“दिखाते”है  (विश्राम=चैन, सुख)

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥

विस्वास कौन है? तुलसी बाबा ने कहा

भवानीशंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वासरूपिणौ।

राम जी ने कन्फर्म किया

औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥

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तुलसीदासजी ने कहा-यद्यपि मेरी इस रचना में कविता का एक भी रस नहीं है, तथापि इसमें श्री रामजी का प्रताप प्रकट है। मेरे मन में यही एक भरोसा है। भले संग से भला, किसने बड़प्पन नहीं पाया?

जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥
सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा॥

तुलसीदास जी ने कहा-अपने धर्म में जो अटल विश्वास है, वह अक्षयवट है और शुभ कर्म ही उस तीर्थराज का समाज (परिकर) है। वह (संत समाज रूपी प्रयागराज) सब देशों में, सब समय सभी को सहज ही में प्राप्त हो सकता है और आदरपूर्वक सेवन करने से क्लेशों को नष्ट करने वाला है॥ प्रयाग में जाने के लिए अर्थ की आवश्यक्ता पड़ती है मगर संत समाज रुपी प्रयागराज में आदर पूर्वक सेवन करने से सब कलेशो को नष्ट करने वाला है मुफ्त में प्राप्त होता है वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है एवं तत्काल फल देने वाला है, उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है॥ अतः संत समाज रुपी प्रयागराज  की महिमा वास्तविक प्रयागराज से अधिक है (बटु=वटवृक्ष) (सद्य=तत्काल,शीघ्र) (अकथ=जिसका वर्णन न किया जा सके) (अलौकिक=लोक से परे,जिसकी समानता की कोई वस्तु इस लोक में नहीं)(अकथ=जो कहा ना जा सके) (देइ=देता है) (संत समाज प्रयाग)सभी को,सब दिन,और सभी ठौर प्राप्त होता है।

बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥

अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।

निज धर्म =अपना साधु धर्म,वेद संवत धर्म ,अपने गुरु का अपने को उपदेश किया हुआ धर्म यथाः जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने (वर्णाश्रम के) धर्म, श्रुतियों से उत्पन्न (वेदविहित) बहुत से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम (इंद्रियनिग्रह), तीर्थस्नान आदि जहाँ तक वेद और संतजनों ने धर्म कहे हैं (उनके करने का)-॥
वशिष्ठ जी

जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥s

वशिष्ठ जी हे प्रभो!अनेक तंत्र,वेद और पुराणों के पढ़ने और सुनने का सर्वोत्तम फल एक ही है और सब साधनों का भी यही एक सुंदर फल है कि आपके चरणकमलों में सदा-सर्वदा प्रेम हो 

आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥
तव पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥

ईश्वर को पाने के लिए सच्ची श्रद्धा, अनन्य भक्ति, पूर्ण विश्वास एवं गहरी आस्था चाहिए, तभी उनके दर्शन हो सकते हैं। तुलसीदास जी ने कहा है, 1जिसकी जैसी दृष्टि होती है, उसे वैसी ही मूरत नज़र आती है.2मात्र ग्रहणता की बात है कि आप क्या ग्रहण करते हैं, गुण या अवगुण?3दुनिया में ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जो पूरी तरह सर्वगुण संपन्न हो या पूरी तरह गुणहीन हो. एक न एक गुण या अवगुण सभी में होते हैं.4और जिनकी गुणग्रहण की प्रकृति है, वे हज़ार अवगुण होने पर भी गुण देख लेते हैं!5जिनकी निंदा-आलोचना करने की आदत हो गई है, दोष ढूंढने की आदत पड़ गई है, वे हज़ारों गुण होने पर भी दोष ढूंढ लेते हैं! सत्य सनेह के फल दाता भगवान है तन मन वचन तीनो से स्नेह होना है सच्चा स्नेह कहलाता है भावना के कारण ही मनुष्य पत्थरों मे प्रभु का दर्शन करता है और मन को आनंदित करता है किंतु विपरीत सोच के कारण लोग केवल पत्थर ही समझते हैं! सीता जी श्री राजा राम जी शरण के अनुसार जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। प्रेम के विस्वास का मूल मंत्र है 

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू।।
जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥

श्री रामचंद्जी शबरी से बोले-॥ मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है।सबसे पहले ये ध्यान रखें कि मंत्र आस्था से जुड़ा है और यदि आपका मन इन मंत्रों को स्वीकार करता है तभी इसका जाप करें। मंत्र जप करते समय शांत चित्त रहने का प्रयास करें। ईश्वर और स्वयं पर विश्वास आवश्यक है।
मंत्र शब्द का निर्माण मन से हुआ है। मन के द्वारा और मन के लिए। मन के द्वारा यानी मनन करके और मन के लिए यानी ‘मननेन त्रायते इति मन्त्रः’ जो मनन करने पर त्राण यानी लक्ष्य पूर्ति कर दे, उसे मन्त्र कहते हैं।हे सती! रामजी के चरणों में विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाता है 

मंत्रजाप मम दृढ़ विश्वासा।पंचम भजन सो वेद प्रकासा।।
उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।

पार्वती सप्तऋषि से कहा:-अतः मैं नारदजी के वचनों को नहीं छोड़ूँगी, चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। जिसको गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्न में भी सुगम नहीं होती 

नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरउँ॥
गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।

श्री रामजी का प्रजा को उपदेश मेरा दास कहलाकर यदि कोई मनुष्यों की आशा करता है, तो तुम्हीं कहो, उसका क्या विश्वास है?(अर्थात उसकी मुझ पर आस्था बहुत ही निर्बल है।)बहुत बात बढ़ाकर क्या हूँ?हे भाइयों! मैं तो इसी आचरण के वश में हूँ 

मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।।
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई॥

न किसी से वैर करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे। उसके लिए सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं। जो कोई भी आरंभ (फल की इच्छा से कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घर में ममता नहीं है) जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो (भक्ति करने में) निपुण और विज्ञानवान्‌ है (अनारंभ=आरंभ का अभाव,फल की इच्छा से कर्म नहीं करता) (अनिकेत =बेघर) (अमानी=निरभिमान,मानहीन) (अनघ=पुण्य,पापहीन) (बिग्यानी =अध्यात्म संबंधी अनुभव, आत्मा का अनुभव,जैसे—आत्मा ज्ञान)

अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी॥
बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥

सीता जी ने राम जी एवं सुमन्त्र से कहा॥ ऐसे पिता का घर भी, जो सब प्रकार के सुखों का भंडार है, पति के बिना मेरे मन को भूलकर भी नहीं भाता॥ये कोई भी श्री रघुनाथजी के चरण कमलों की रज के बिना मुझे स्वप्न में भी सुखदायक नहीं लगते (सुखनिधान=शांति का खजाना) (पदम=कमल)

सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥
बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥

रामजी ने नारदजी से कहा- हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्ष के साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं  (सहरोसा=हर्ष)

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥

बालि ने तारा से कहा- हे भीरु! (डरपोक) प्रिये! सुनो, श्री रघुनाथजी समदर्शी हैं। जो कदाचित् वे मुझे मारेंगे ही तो मैं सनाथ हो जाऊँगा (परमपद पा जाऊँगा)  (भीरु=डरा हुआ,कायर, डरपोक) (समदरसी=वह जो सभी को समान दृष्टि से देखता हो,न्यायप्रिय)

कह बाली सुनु भीरु प्रिय, समदरसी रघुनाथ।
जौं कदाचि मोहि मारहिं, तौ पुनि होउँ सनाथ॥

तुलसीदास जी ने कहा जैसे चातक की नजर एक ही जगह पर होती है, ऐसे ही हे प्रभु!हमारी दृष्टि तुम पर रख दो। भगवान पर भरोसा करोगे तो क्या शरीर बीमार नहीं होगा, बूढा नहीं होगा, मरेगा नहीं ? अरे भाई ! जब शरीर पर, परिस्थितियों पर भरोसा करोगे तो जल्दी बूढ़ा होगा, जल्दी अशांत होगा, अकाल भी मर सकता है। भगवान पर भरोसा करोगे तब भी बूढ़ा होगा, मरेगा लेकिन भरोसा जिसका है देर-सवेर उससे मिलकर मुक्त हो जाओगे और भरोसा नश्वर पर है तो बार-बार नाश होते जाओगे। ईश्वर की आशा है तो उसे पाओगे व और कोई आशा है तो वहाँ भटकोगे। पतंगे का आस-विश्वास-भरोसा दीपज्योति के मजे पर है तो उसे क्या मिलता है? परिणाम क्या आता है? जल मरता है।(चातक=पपीहा पक्षी)

एक भरोसा एक बल,एक आस विश्वास ।
एक राम घनश्याम हित,चातक तुलसी दास।

शिवजी ने पार्वतीजी से कहा किंतु जो मनुष्य विश्वास मानकर यह कथा निरंतर सुनते हैं, वे बिना ही परिश्रम उस मुनि दुर्लभ हरि भक्ति को प्राप्त कर लेते हैं 

मुनि दुर्लभ हरि भगति नर,पावहिं बिनहिं प्रयास।
जे यह कथा निरंतर,सुनहिं मानि बिस्वास॥

उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।s

तुलसीदास जी ने कहा जिनके पास श्रद्धारूपी राह-खर्च नहीं है संतोंका साथ नहीं है,उनके लिये यह मानस अत्यन्त अगम है।अर्थात् श्रद्धा सत्संग और भगवत्प्रेमके बिना कोई इसको पा नहीं सकता। (अगम=दुर्गम)

जे श्रद्धा संबल रहित,नहि संतन्ह कर साथ।
तिन्ह कहुँ मानस अगम अति, जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥

बाल्मीक के जाप से,निकला यह परिणाम ।
श्रद्धा होनी चाहिए,मरा कहो या राम ॥

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए।
अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होए॥

तुलसीदास जी विपत्ति के समय आपको ये सात गुण बचायेंगे:आपका ज्ञान या शिक्षा, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने की आदत और ईश्वर में विश्वास

तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक ॥

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