मानस चिंतन दीनता नम्रता छोटा

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मानस चिंतन दीनता नम्रता छोटामेरा 

मुझमें कुछ नहीं,जो कुछ है सो तोर ।
तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मोर ॥

कबीर कह रहे हैं कि अगर आपको अपना बड़प्पन रखना है तो सदैव छोटे बनकर रहो।छोटा बनने का अर्थ है विनम्र बनकर रहो।विनम्रता रखने में ही आपका बड़प्पन है।विनम्रता से आपका सभी लोगों में मान बढेगा। लघुता से ही प्रभुता मिलती है। प्रभुता से प्रभु दूर अर्थता अहंकार की भावना रखने से आपके और परमात्मा के मध्य की दूरी बढ़ जाएगी।अहँकार के कारण ही मनुष्य से परमात्मा दूर हो जाते हैं। कुछ करने और जानने का अहंकार आपको परमात्मा को पाने से वंचित कर देता है। चींटी छोटी है,विनम्र है इसलिए उसे शक्कर मिलती है। हाथी को अपने विशालकाय और बलशाली होने का अहंकार होता है। इसी बल के अहंकार के कारण वह सूंड से धूल उठाकर अपने सिर पर डालता रहता है।कहने का अर्थ है कि जीवन में कभी भी किसी भी विशेषता का अभिमान नहीं करना चाहिए। विनम्रता आपको शिखर तक ले जा सकती है और अहंकार पतन के अंधकार तक। चयन आपको करना है। परमात्मा के द्वार तक दंडवत लेट कर ही पहुंचा जा सकता है,अहंकार से अकड़कर चलने पर तो उसका दर तक दिखलाई नहीं पड़ेगा।

लघुता ते प्रभुता मिले, प्रभुता ते प्रभु दूरी।
चींटी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूरी।।

तुलसीदास जी ने कहा हे श्री रघुबीर! मेरे समान कोई दीन नही है और आपके समान कोई दीनो का हित करनेवाला नही है। ऐसा विचार कर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म मरण के भयानक दुख का हरण कर लीजिये। (बिसम=विकट,भीषण, प्रचंड भयंकर विकट) (भव भीर=जन्म मरण)

मों सम दीन न दीन न हित, तुम समान रघुवीर।
अस विचारि रघुवंश मनि, हरहु बिसम भव भीर।

तीनि लोक तिहुँ काल जस चातक ही कें माथ ।
तुलसी   जासु   न   दीनता   सुनी   दूसरे   नाथ ।।s

तुलसीदास जी ने कहा मुझको अपना दास जानकर कृपा की खान आप सब लोग मिलकर छल छोड़कर कृपा कीजिए। मुझे अपने बुद्धि-बल का भरोसा नहीं है, इसीलिए मैं सबसे विनती करता हूँ॥ (छोह=कृपा)(कृपाकर=कृपा+आकर=कृपा की खानि) दूसरा (कृपा+कर=कृपा करनेवाले)(किंकर= दास,सेवक)

जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाहीं॥

सब जगत को सियाराम मय मानकर वंदना की और अपने में किंकर,भाव रखा यह गोस्वामी जी का अनन्य भाव है यथा

सो अनन्य जाकें असि, मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर, रूप स्वामि भगवंत।।

आगे अपने को संतो का बालक कहा,

छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई।।

तुलसीदास जी ने कहा। मैं न तो कवि हूँ, न वाक्य रचना में ही कुशल हूँ,मैं तो सब कलाओं तथा सब विद्याओं से रहित हूँ, इनमें से काव्य सम्बन्धी एक भी बात का ज्ञान मुझमें नहीं है यह मैं कोरे कागज पर लिखकर(शपथपूर्वक)सत्य-सत्य कहता हूँ। वेजनाथ के अनुसार कि अपने मुँह अपनी बड़ाई करना दूषण है।अपनी बड़ाई करने वाला लघुत्व को प्राप्त होता है। अतः यहाँ यह चतुरता गोसाई जी ने की कि काव्य के सर्वाग प्रथम गिना आए, फिर अंत में कह दिया कि हममें एक भी काव्यगुण नहीं हैं। जैसे पूजन कर अंतमें अपराध निवारण हेतु प्रार्थना  की जाती है, वैसे ही यहाँ जानिये।

कवि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू।सकल कला सब बिद्या हीनू।।
कवित विवेक एक नहिं मोरे।सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे।।

गोस्वामी जी सब गुणों से पूर्ण होते हुए भी ऐसा “कवि न होउँ” कह रहे है इन्होने तो विनम्रता की हद ही पार कर दी यह कार्पण्य यानि दीनता अथवा चित् का गर्वहीन भाव को कार्पण्य शस्णागति कहते है! जैसे हनुमानजी भक्ति के पूर्ण ज्ञाता हैं,फिर भी शपथ करके कहा है, ऐसा कहकर अपने हृदय की निष्कपटता दर्शित करता है,यथा

ता पर मैं रघुबीर दोहाई।जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।।

आप यह यथार्थ भी कह रहे हैं!

जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥

राम प्रताप क्या है!

जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे।।
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।
बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा॥

श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन॥

समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा।।

तुलसीदास जी ने कहा -मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है, चाह तो अमृत पाने की है, पर जगत में जुड़ती छाछ भी नहीं। जैसे बालक जब तोतले वचन बोलता है, तो उसके माता-पिता उन्हें प्रसन्न मन से सुनते हैं (मुदित=प्रसन्न)

मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी॥
जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता॥

तुलसीदास जी ने कहा:-कीर्ति, कविता, और सम्पत्ति ,वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो। श्री रामचन्द्रजी की कीर्ति तो बड़ी सुंदर (सबका अनन्त कल्याण करने वाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असामंजस्य है (अर्थात इन दोनों का मेल नहीं मिलता) इसी की मुझे चिन्ता है। (भनिति=कविता,कहावत,लोकोक्ति) (अँदेसा=शक,संदेह,संशय,खटका, अविश्वास) (भदेसा=भद्दा,कुरूप,बुरा)

कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥
राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥

तुलसीदास जी ने कहा-पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, असुर समेत जितने श्री रामजी के चरणों के उपासक हैं, मैं उन सबके चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो श्री रामजी के निष्काम सेवक हैं।(जे बिनु काम=निष्काम)

रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥
बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥

तुलसीदास जी ने कहा-जो श्री रामजी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो (धींगाधींगी= बदमाशी,उपद्रव) करने वाले, धर्मध्वजी (धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले दम्भी) और कपट के धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है। (भगत कहाइ-ऐसे लोगों को स्वयं को भक्त कहलाने की बड़ी इच्छा होती है) और  जो वास्तव में भक्त हैं जैसे भरत जी, हनुमानजी आदि , ये कभी अपने को भक्त कहते ही नहीं हैं और न उन्हें किसी से कहलाने की इच्छा रहती है। हनुमानजी जामवंत जी तो बंदर भालू के वेष में हैं लेकिन उनके अंदर साधुता का वास है।

बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरम ध्वज धंधक धोरी॥

(बंचक=ठग)(कंचन=धन,संपत्ति) (कोह=क्रोध,गुस्सा)(किंकर=गुलाम, दास,सेवक, नौकर) (रेख=गिनती)(धिग=घिकू=धिक्कार)(धरम ध्वज=धर्म का आडंम्बर खड़ा करके स्वार्थ साधन करने वाला पाखंडी) (धंधक=काम-धंथे का आडंम्बर,जंजाल) “तिन्ह महँ प्रथम रेख”अर्थात्‌ जबसे कलियुग शुरू हुआ तब से आज तक जिनका जन्म हुआ “जग’ कहने का भाव यह है कि जगत्‌ भर में जितने अधम हैं,उन सबों में प्रथम मेरी गिनती  है।पुनः,भाव कि’सत्ययुग में देत्य खल,त्रेता में राक्षस खल और द्वापर में दुर्याधन आदि जो खल थे,उनको नहीं कहते। जो कलियुग में जन्मे  उनमें से अपने को अधिक कहा। क्योंकि कलि के खल तीनों से अधिक हैं।

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परशुराम जी अत्यंत क्रोध में भरकर वे कठोर वचन बोले – रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? जड़ कहने का भाव यह की शिव धनुष की पूजा और रक्षा करना चाहिए थी सो ना करके उसे तुड़वाया यह तेरी जड़ता है मूर्खता है अति क्रोध मनुष्य को स्वयं ही निर्बल बना देता है यह संकेत भी परशुराम जी की हार के लिए कितना सुन्दर है। हे नाथ! शिव के धनुष को तोड़नेवाला आपका कोई एक दास ही होगा। राम जी ने सीधे सीधे क्यों ना कह दिया की हमने तोडा है परोक्ष रूप से क्यों कहा? सीधे कह देने से मुनि लड़ने लगते  और राम जी के युद्ध करने से ब्रह्म हत्या लगती वचन चतुराई से ही उनको जीतना उचित समझा इसी से अपने आप (रामजी) को प्रकट करके नहीं कहा दूसरा  प्रकट कहने में की हमने तोडा है अभिमान सूचित होता है अपने को दास कहा और दास कहकर भी प्रकट नहीं हुए कहते है की कोई तुम्हारा दास होगा इन वचनो में कितनी निरभिमानिता भरी हुई है राम जी अपनी प्रसंसा स्वयं कभी नहीं करते  नाथ कहने का भाव की आप जिसके स्वामी है और जो आपका दास है उसने तोडा है नाथ शम्भु एक भाव यह भी है की जिन शम्भू का यह धनुष है उनके हम नाथ है अतः आप व्यर्थ ही रोष करते है!

जनक जी को जड़ मूड कहना उनके राज्य को उलट देने की धमकी देना अनुचित है! आपका अपराधी में हूँ!

अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥

सहसबाहु सम? कहने का भाव कि सहसबाहु हमारे पिता का द्रोही था। उसने हमारे पिता को मारा था! और धनुष तोड़ने वाला हमारे गुरु का द्रोही हे। पितृ द्रोही और गुरु द्रोही दोनों तुल्य होने से सहसबाहु के समान वैरी कहा आशय यह है कि जैसे हमने उसकी भुजाये काटी और उसका वध किया बैसे ही इसकी भुजायें काटेंगे जिनसे धनुष तोड़ा हैऔर  फिर उसका बध भी करेंगे! यह लक्ष्मण की बुद्धिमानी है कि सब पर दोष बचा कर बात कर रहे हैं। यदि कहते कि श्रीरामजी ने राजा जनक की प्रतिज्ञा  की पूर्ति के लिये धनुष तोड़ा तो जनकजी का दोष ठहरता (ओर ये उन पर टूट पड़ते),यदि कहते कि विश्वामित्रजी की आज्ञा से तोड़ा तो उनका दोष ठहरता|और यदि कहते कि श्रीरामजी ने अपनी वीरता से तोड़ा तो उनका दोष माना जायगा और  ये उनसे भिड़ पड़ेंगे! राम जी ने स्वयं कहा हे भगवान मैंने शिवचाप-को अच्छी तरह छुआ भी नहीं था कि वह अपने ही से टूट गया,में क्या करूँ?

सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ।
लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।।
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।

नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी।।
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।।
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।।

सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना।।
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा।।
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा।।
जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी।।

छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी।।

रामचंद्र जी बोले – हे नाथ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी? कहिए न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक! कहाँ मेरा राम मात्र छोटा सा नाम और कहाँ आपका परशु सहित बड़ा नाम॥ हमहि तुम्हहि= कहने का भाव की हम सेवक है और आप नाथ है! सेवक और स्वामी की बराबरी नहीं होती तब हमारी और आपकी बराबरी कैसे हो सकती है “सरबरी कसी” का भाव है की आप ब्राम्हिन है में छत्री हूँ इसी आधार पर कहा कहाँ चरण कहाँ माथा। कहकर दोनों में बड़ा अंतर दिखाया।(सरिबरि=बराबरी,समता)

हमहि तुम्हहि  सरिबरि कसि नाथा।।कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा।।
राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा।।

रामजी ने परशुराम जी से कहा- हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र (शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता – ये) नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हैं। हे विप्र! हमारे अपराधों को क्षमा कीजिए। भगवान राम की मर्यादा है कि भगवान परशुराम के प्रति किस प्रकार के सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करते हुए कहते हैं कि ‘हे देव! हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हैं, क्योंकि आप विप्र हैं। हमारे अपराधों को क्षमा कीजिए।(सूत्र) यह केवल और केवल भगवान राम ही कह सकते हैं।

देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें।।
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे।।
राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।।
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना।।

बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई।।
सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के।।

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 (चलते समय) भारद्वाज वाल्मीकि जी के शिष्य हैं ।यद्यपि राम रास्ता पूछते है। पर किसी स्थान का नाम नही लेते,जहाँ जाना है। भाव यह कि मुनिजी रास्ता भी बतलायें और गन्तव्य स्थान का भी निश्चय कर दें| ऐश्वर्या छुपाते देखकर मुनि जी मन ही मन हंसे कि ये हमसे रास्ता पूछते है।

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।।

कृपानिधाना कहने का भाव दण्डकारन वन में और भी ऋषियों के लिए सुख देना चाहते है! इस वन में तो अत्रि मुनि की ही प्रधानता है इसलिए अन्य वन में जाने की मुनि अत्रि से आज्ञा ली भगवान अपने आचरण द्वारा यह उपदेश दिया कि जब हम छत्रिय वेश धारण कर मुनियो,विप्रो का सम्मान करते है! तो यही कर्तव्य अन्य जीवो को भी करना चाहिए!

मुझ पर निरंतर कृपा करते रहिएगा और अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़िएगा।

तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।।
संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।।

धर्म धुरंधर रामजी के वचन सुनकर ज्ञानी अत्रि मुनि प्रेमपूर्वक बोले-

चक्रवती महाराज के परम प्रतापी राजकुमार एक मुनि के सामने इस प्रकार कृपा की याचना करते है (अगस्त्यजी)जी ने कहा आप सेवकों को सदा ही बड़ाई दिया करते हैं,इसी से हे रघुनाथजी! आपने मुझसे पूछा है॥यथाः

संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई॥s
धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।।

सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥वाल्मीकि जी
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥वाल्मीकि जी
जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।।

धर्म धुरंधर प्रभु के वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेम पूर्वक बोले ब्रह्मा,शिव, सनकादिक सभी परमार्थवादी जिसकी कृपा की चाह करते है हे राम वही आप(जिसको निष्काम भक्त प्रिय है और जो)निष्काम भक्तो के प्यारे एवं दीनबंधु है जिन्होंने ऐसे कोमल वचन कहे!(परमारथ बादी=जो ब्रह्म से साक्षात करने में प्रबल है,ब्रह्म तत्व को जानने वाले,ज्ञानी) यथाः

राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा॥s
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।।

आपकी चतुराई जानी। क्या? यह कि आप सबसे वड़े हैं इसी से ऐसी विनम्र वाणीबोले । अर्थात्‌ अपनी नम्रता से ही आपने अपनी श्रेष्ठा जना दी यह चतुराई है।अथवा,श्री,लक्ष्मी की चतुराई जानी कि क्यों सब देवताओं को छोड़कर आपको ही जयमाल पहनाई थी ।ऐसा करके उन्होंने जना दिया कि सब में आप ही बड़े हैं।श्रीजीने यह शील देखकर ही आपका भजन किया।त्रैलोक्य की प्रभुता  शीलवान का ही भजन करती है।

अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।।
जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।।
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।।

केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। भाव यह की कैसे कहू कि बन को जाओ,क्योकि आप तो सर्वत्र हो आप तो अन्तर्यामी हो पुनः नाथ के जाने से सेवक अनाथ हो जायेगा ,यह कैसे कहू कि मुझ को अनाथ करके जाइये पुनःआप स्वामी है,सेवक स्वामी को जाने को कैसे कह सकता है?आप नाथ है नाथ के बिना सेवक अनाथ होकर कैसे रहना चाहेगा? ऐसा कह कर धीर मुनि प्रभु को देखने लगे उनके नेत्रों से जल  बह रहा है, शरीर पुलकित है नेत्र मुख कमल में लगे हुए है अत्रि जैसा संत मन में विचार कर रहा है!कि मैने ऐसे कौन से जप तप किये कि मन,ज्ञान,गुण और इन्द्रियों से परे प्रभु के दर्शन पाये॥

अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।

श्री रामजी ने मुनि से कहा-अगस्त्यजी: हे प्रभो! अब आप मुझे वही मंत्र (सलाह) दीजिए, जिस प्रकार मैं मुनियों के द्रोही राक्षसों को मारूँ। प्रभु की वाणी सुनकर अगस्त्यजी मुस्कुराए और बोले- हे नाथ! आपने क्या समझकर मुझसे यह प्रश्न किया?जगत का दाता अगस्त जी से मांग रहा है।

अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही॥
मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी॥

सुतीक्ष्ण जैसा संत बोल रहा मेरे हृदय में दृढ़ विश्वास नहीं होता,क्योंकि मेरे मन में भक्ति,वैराग्य या ज्ञान कुछ भी नहीं है॥

मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं॥
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥

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हनुमान  जी अपनी अत्यंत दीनता और मन ,कर्म,वचन से सरनागति दिखा रहे है  एक का अर्थ “प्रधान “वा “शिरोमणि “है अर्थात में मंद ,मोहबस ,और कुटिलो का शिरोमणि हूँ।

एकु मैं मंद मोहबस, कुटिल हृदय अग्यान।
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ, दीनबंधु भगवान।।

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें॥
ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥
सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥

हे नाथ|यदपि मुझ में बहुत अवगुण है,तथापि (यह) सेबक प्रभु को भोरे न पड़े अर्थात अवगुणी  होने पर भी  मुझ सेवक को आप ना भूलावे !इस पर  भी हे रघुबीर !आपकी शपथ करके कहता हूँ कि मैं कुछ भी भजन का उपाय नहीं जानता॥’जानो नहिं कछु  भजन  उपाई’ कहने का भाव कि माया मोहित जीव का तरना दो तरहसे है।एक तो आपके छोह से,दूसरे भजन से। सो में भजन का उपाय नहीं जानता,आपकी कृपा से ही निस्तार होगा। माया से तरना केवल और केवल कृपा साध्य है,क्रिया साध्य नहीं।

भजन उपाई॥=भजनका उपाय अर्थात साधन। ‘कछु’ का भाव कि भजन थोड़ा भी हो तो भी माया कुछ नहीं कर सकती,यथाः

भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥
तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई॥
सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।। राम जी
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।। राम जी

यह प्रपन्न-शरणागति का लक्षण हे। इसमें दो भेद हैं।एक पुरुषार्थ -युक्त, दूसरा पुरुषार्थ- हीन अतः दोनों के उदाहरण देते हैं। सेवकमें कुछ पुरुषार्थ है, हम छोटे वालक के समान पुरुषार्थ हीन हैं। केवल आप ही के भरोसे है । यही शरणागति श्री राम जी ने नारद जी से कही हे! हमारे शरीर और मन के स्वस्थ पर ‘आस्था ‘ का प्रभाव पड़ता है इसका विश्लेषण चिकित्सको ने किया है ऐसा अनेक अध्यनो में सामने आया है! अस्पतालों में प्राण लेवा रोगो से झूलते हुए मरीजों पर प्रयोग किया गया भगवान में विस्वास करने वाले और उनकी सत्ता को नकारने वालों के एक से उपचार हुए! अंत में देखा गया की नास्तिको के स्वस्थ में दवाइयों से मामूली सुधर हुआ पर आस्तिक रोगी ना केवल रोग मुक्त हुए बल्कि उनकी प्रतिरोधक छमता भी बढ़ गई! हनुमानजी भक्तों में आदर्श हैं, इनमें भक्ति के सब अंग है ,पर फिर भी  भगवान कीअपेक्षा  में उन्हें कुछ न गिनते हुए वे कार्पए्य – शरणागति  की  रीति से स्तुति कर रहे हैं,जो भक्ति का परम आवश्यक अंग है।

शाखामृग का भाव यह कि मे तो शाखा पर रहने वाला पशु हूँ। एक डाल पर से दूसरे पर उछल जाऊ और डाल न चूके। बस इतनी ही मेरी बहादुरी है। यह सामर्थ अन्य किसी पशु मे नहीं है।अत यह मेरी जाति की प्रभुताई है।समुद्र लांघना (ग्राहदि=मगर,घड़ियाल)से भी (अशक्य=जो न हो सके, असाध्य)है। हाटक सोना का जलाना स्वर्णकार से भी अशक्य है। निशिचरों को मारना देवताओं से भी अशक्य है और अशोक वन उजाडना इन्द्र से भी अशक्य है। इन सब कामो को मैंने किया तो क्या इनमे मेरी प्रभुता थी? यह सब सरकार की प्रभुता ने किया।यह कह कर हनुमानजी ने बुद्धि में इन्द्रादिक को भो जीत लिया। ‘न कछू मोरि प्रभुताई! ।-अर्थात मेरा पुरुषार्थ किसी कार्य में भी किंचित्‌ नहीं है;सब में आपके प्रताप ने ही काम किया ।श्री हनुमानजी की इतनी निरभिमानता भी श्री प्रभु की प्रसन्नता का कारण है। (हाटक=सोना,स्वर्ण) (बिपिन=वन)

साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

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हनुमान विभीषण संवाद और दीन भाव-

विभीषण हनुमान से बोल रहे है”तामस तनु”का भाव है कि हम पापी है!

यही बात रावण ने भी कही: तामस देह दोनों भाई दुखी थे। पर दोनो भाइयों को भजन पर आस्था थी। तामसी को उल्लू की उपमा दी गई है, उल्लू सूर्य दर्शन से विमुख होते हैं वैसे ही तामसी जीव ज्ञानसे विमुखहैं| 

तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥ रावण

सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥s
होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।s

हे हनुमान इसी से में ज्ञान हीन भी हूँ”कछु साधन नाहीं।”साधनो से ही भगवान मिलते है यथाः

तव पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥s
सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।s

हे हनुमान मुझ से तो वह भी नहीं बनता अतः में कर्म हीन हूँ क्योकि साधन करना कर्म है प्रीति न पद सरोज मन माहीं।। का भाव उपासना से रहित हूँ जब कुछ साधन ही नहीं तब प्रीति कहाँ से हो अतः ‘तामस तन”कहकर तब साधन रहित होना-कहा और अंत में प्रीत का न होना। यथाः

राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।s
पदराजीव बरनि नहिं जाहीं।मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥s

हे हनुमान पद सरोज’ का भाव कि प्रभु के चरण कमलवत्‌ हैं,उनमें मन को भ्रमर होकर.लुब्ध रहना चाहिये सो हमारा मन मधुप होकर उसमें नहीं लुभाता,मुझ में तो यह भी नहीं है

(हनुमान्‌जी ने कहा-) हे विभीषणजी! सुनिए आपका तो केवल तामस तन है पर कुल तो उत्तम है यथाः

उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती।।

उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥

और मै-भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? (जाति का) चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ, सब प्रकार से गया बीता हूँ प्रातःकाल जो हम लोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
बिषय बस्य सुरनर मुनि स्वामी।मैं पावँर पसु कपि अति कामी।s

हे सखा! सुनिए, मैं ऐसा अधम हूँ, पर श्री रामचंद्रजी ने तो मुझ पर भी कृपा ही की है। भगवान्‌ के गुणों का स्मरण करके हनुमान्‌जी के दोनों नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया॥

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।

और सुनो विभीषण= श्रीरामजी कुलकी अपेक्षा नहीं रखते, वे तो केवल भक्ति का नाता मानते है! यथाः

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥रामजी
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥

भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।

सदा प्रीती का निर्बाह करना कठिन है पर प्रभु सदा एक रस निबाहते है प्रभु को सेवक से कोई अपेच्छा नहीं है पर वे तो सेवक पर बिना कारण ममता और प्रीत करते है

कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।।s
को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा।s

विभीषण स्वयं हनुमान जी से बोल रहा है बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।अर्थात्‌ चाहे ब्रमाण्ड भर खोज डालें तो भी नहीं मिलते और  जब कृपा होती है तब घर बैठे संत मिल जाते हैं,ग्रन्थकार यहाँ उपदेश देते हैं कि जब इस तरह साधन करे जेसे विभीषणजी ने किया तब श्रीराम जी कृपा करें और  तब सन्त मिलें! श्री रामचंद्रजी समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ हैं। श्री हरि चंदन के वृक्ष हैं तो संत पवन हैं।

अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।।s

राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥s
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।

जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। का भाव रघुवीर शब्द में पांच प्रकार की वीरता के भाव रहते है

1 त्यागवीर 2 दयावीर 3 विद्या वीर 4 -धर्मवीर 5 पराक्रम वीर –

1 त्यागवीर

पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर।

राजिवलोचन राम चले तजि बाप को राज बटाऊ की नाईं ।

2दयावीर – विश्व का मित्र वही विश्वामित्र है। गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के दुख को विश्वामित्र नही सह पाए और प्रभु से विनय करते हुए कहा कि यदि कोई भिक्षा मांगता है उसे भिक्षा मिलता है, प्रभु यह भीख मांग रही है इन्हें चरण रज प्रदान करें।

गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥

तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला॥

3 विद्या वीर –

श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन॥s

नीति रावण और बाली को सिखाई प्रीति- यथा-“जानत प्रीति रीति रघुराई” परमार्थ पुरजन को उपदेश, स्वार्थ अर्थात लोक व्यवहार में निपुण, इसी से राम सबको प्राणो से अधिक प्रिय लगते है! नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थ को रामजी के समान यथार्थ(तत्त्व से)कोई नहीं जानता।

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥

जल में पत्थरो का तैरना भी एक विद्या है

4 -धर्मवीर –

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥s

मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा॥s

5 पराक्रम वीर – परशुरामजी के आगमन पर राम सब लोगों को भयभीत देखकर और सीता को डरी हुई जानकर बोले -उनके हृदय में न कुछ हर्ष था न विषाद-॥

सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।

गुप्तचरों ने रावण से बोल-रामजी एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सोख सकते हैं, परंतु नीति निपुण रामजी ने (नीति की रक्षा के लिए) आपके भाई से उपाय पूछा॥

सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥

ये पांचो वीरता राम जी में ही है

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नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। इति अपनी अधमता दिखाने के लिए अपने को रावण का भाई कहकर अपना परिचय दे रहे है पिता का नाम लेकर प्रणाम करने की रीती है पर विभीषण अपने पिता का नाम नहीं लेते क्योकि वे ऋषि है इससे कुलीनता पाई जाती है पिता की जगह बड़े भाई का नाम लिया क्योकि बड़ा भाई पिता तुल्य होता है यहाँ मयंककार आदि ने  शंका की है!कि इन्होंने निशिचर वंश क्यों कहा,इनके पिता तो ऋषि हैं?इसके दो कारण पहला अपनी अधमता दिखाने के लिए ऐसा कहा अपनी अधमता दिखाना यह दीनता हैदूसरा माता निशचरी है,माता के ही यहाँ पले भी और वंश की सत्यता संस्कार पर ही होती है! विजया नंद त्रिपाठीजी लिखते हैं- मातृ कुल पितृ कुल भेद से दो कुल या वंश होते हैं। रावणादि का पितृ कुल ऋषिकुल था,और मातृ कुल देत्य कुल था।अपने स्वजनो की करणी विचार करके ऋषि कुल से परिचय देने में उन्हें लज्जा लगी|यह कार्पण्य भक्ति के लक्षणों में हे,अतः निशिचर वंश कहना स्वार्थ प्राप्त था। दूसरा भाव चार बातो से पुरुष की परीक्षा होती है कुल,संग,स्वाभाव,और शरीर से विभीषण जी ने अपने मुख से अपनी अधमता चारो प्रकार से कह रहा है क्रम से सुनिए निसचर बंश में जनम,यह कुल से अधम “दशानन का भ्राता “यह संग अधम का “सहज पाप प्रिय “यह स्वाभाव से अधम और “तामस देह”यह शरीर से अधम बताया है दशानन आपका विरोधी है में उसका भाई हूँ अतः शरण योग्य नहीं हूँ,आप सुरत्राता है में निसिचर सुर विरोधी हूँ तात्पर्य यह की जो आपके सनेही है में उन्ही का विरोधी हूँ और जो आपके विरोधी है उनका में सनेही हूँ आप धर्म प्रिय है मुझको पाप प्रिय है सब प्रकार से आपकी शरण के अयोग्य हूँ किसी प्रकार भी योग्य नहीं हूँ (सुरत्राता=विष्णु,कृष्ण)(उलूकहि=उल्लू)(तम=अँधेरा, अंधकार,तमाल वृक्ष,पाप,अपराध)

“दशानन और भ्राता”निसिचर वंस जनम”और सहज पाप प्रिय!हैं। पाप से भजन नहीं होता यथाः

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥ राम जी

उल्लू को अंधकार-सहज प्रिय है,वह अशुभ पक्षी हे! वेसे ही मुझे पाप सहज प्रिय है! ओर देह तामसी है अतएव अशुभ है।जैसे तम दुखद बैसे ही पाप ढुखद ।उलूक से संत-विरोधी जनाया, यथाः

होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।भुसुंडजी

रही एक बात वह यह है कि मैंने आपका यह सुजस सुना है की आप शरण सुखद है कैसा भी कोई पापी हो आपकी शरण जाने पर आप उसे अवश्य शरण देते है!

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥

प्रभु यह भी सुना=

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा।बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥sविभीषण
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥s रामजी

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥हनुमान जी से

प्रभु भंजन भव भीर।आदि विशेषणों का भाव है कि आप समर्थ है में सब प्रकार से असमर्थ हूँ आप भवभीर भंजन है में सभीत हूँ आप आरति हरण है में आर्त हूँ आप शरण सुखद है में शरण में हूँ आप रघुवीर है में आपके शत्रु का भाई हूँ आपके दरबार में दीन का आदर है में सब प्रकार से दीन हूँ! विभीषणने रामजी से कहा मैं अत्यंत नीच स्वभावका राक्षस हूँ।मैंने कभी शुभआचरण नहींकिया।जिनका रूप मुनियोंके भी ध्यानमें नहीं आता, उन प्रभु ने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया॥ विभीषण जी अपने को तीन तरह से अनधिकारी बताते है!अपने को निशचर कह कर भजन का अनधिकारी कहा !अपना अधम स्वभाव बता कर ज्ञान का अनधिकारी  कहा “सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ”बता कर कर्म  का  अनधिकारी कहा !

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयं मोहि लावा॥

प्रभु ने मुझे हृदय से लगाया और तो और मेरे लिए अपनी प्रतिज्ञा भी तोड़ दी!

निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥

श्रीलमगोड़ा जी-सुन्दर कांड वास्तव में अति सुंदर कथाओ का भंडार है। कारण कि सेवा धर्म की पराकाष्ठा हनुमानजी में और शरणागत धर्म का उच्चतम उदाहरण विभीषण जी में मोजूद है।

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भरत की दीनता=भरतजी जैसा संत जिसको राम जी भजते हैं बोल रहा है   क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आए? प्रभु ने कुटिल जानकर मुझे कहीं भुला तो नहीं दिया? भरत जी अपने मन में कारण ढूंढ रहे हैं कई कारणों का अनुमान होता है। “नाथ!शब्द से सूचित करते हैं कि मेरी प्रार्थना पर आपने कहा था कि मैं ठीक अवधि पर आऊंगा; पर न आने का क्या कारण हुआ|क्या लक्ष्मण जी नही अच्छे हुए?क्या लंका मे अभी युद्ध ही चल ही रहा है!अथवा स्त्री -हरण की लज्जा से नहीं आते हों ! (निस्तार=छुटकारा, उद्धार) (कलप=युग) (कीधौ=अथवा,वा,या तो,न जाने)

कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।

श्री लक्ष्मण जी ने जो अनुमान किया था;वही बात मानकर प्रभु ने भी संभवतः मुझे भुला दिया हो ।कुटिल खोटे भाई भरत कुसमय देखकर और यह जानकर कि रामजी (आप) वनवास में अकेले (असहाय) हैं!

कुटिल कुबंधु कुअवसरु ताकी। जानि राम बनबास एकाकी॥लक्ष्मणजी

पर भगवान का स्वाभाव तो जो में जनता हूँ!

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥

अवधि बीत जाने पर यदि मेरे प्राण रह गए तो जगत्‌ में मेरे समान नीच कौन होगा? मेरी प्रतिज्ञा भूलने योग्य नहीं थी। क्या सरकार ने मुझे कुटिल समझकर उस प्रतिज्ञा को दम्भ मात्र समझा ।इसलिए मुझे भुला दिया? सरकार के वनवास की अवधि और अवधवासियों के जीवन की अवधि एक ही है| अयोध्या वासियों के विषम वियोग की दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता। (चौदह साल की) अवधि की आशा से ही वे प्राणों को रख रहे हैं।

बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना॥
बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।

अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।।
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।।

भरतजी=मेरे समान पापों का घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्री रामजी का वनवास हुआ?और मैं दुष्ट, जो अनर्थों का कारण हूँ, होश-हवास में बैठा सब बातें सुन रहा हूँ।

मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू॥
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥

यह भक्ति की कार्पण्य वृति है यथाः

जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ।।s

अथवा इसी वृति में अपनी उस करनी का भी स्मरण करते है हनुमानजी को संजीवनी ले जाते समय बाण मारा था अगर हनुमान जीवित नहीं होते तो कोई भी जीवित ना होता अतः भरत जैसा संत बोल रहा है कि मेरी इस करनी को समझे तो करोडो कल्पो तक मेरा निर्बाह नहीं हो सकता जन अवगुन। का भाव वे दीनबन्ध है और में दीन हूँ ,तो अवश्य कृपा करेंगे यथाः

नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।s

अति मृदुल सुभाऊ। का भाव प्रभु तो अति कोमल स्वाभाव के है अतः मुझ पर क्रोध ना कर के दया ही करेंगे ऐसा कहकर उपर्युक्त “कपटी कुटिल मोहि “का निराकरण किया पहले भी इन्होने कहा था यथाः

देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।।s
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।।

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काकभुशुण्डि ने गरुड़ कहा ॥हे गरुड़जी!यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन (नीच) हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यंत धन्य हूँ, जो श्री रामजी ने मुझे अपना ‘निज जन’ जानकर संत समागम दिया (आपसे मेरी भेंट कराई) (समागम=सम्मेलन,सभा)

आजु धन्य मैं धन्य अति, जद्यपि सब बिधि हीन।
निज जन जानि राम मोहि, संत समागम दीन॥

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अंगद की दीनता।

अंगद ने कहा पिता के मरने पर में अशरण था तब आपने मुझे शरण में लिया अर्थात गोद लिया अब आप गोद लेकर त्यागे नहीं कोछे (गोद ) रखकर गिरावे नहीं मुझे त्यागने पर आपका  असरन सरन बाना ना रह जायेगा”मोहि जनि तजहु ” का भाव राम जी का रुख देखा की रखना नहीं चाहते ,तब ऐसा कहा”भगत हितकारी” भाव यह है की में भक्त हूँ वहां जाने से मुझे सुग्रीव से भय है अतः मेरा त्याग ना कीजिये,वहां ना भेजिए सुग्रीव से भय का कारण यह की अभी उसके पुत्र नहीं था इससे  और आपकी आज्ञा से सुग्रीव ने मुझे युवराज बनाया है जब उसके संतान होगी तब मुझे क्यों जीता छोड़ेगे ?

असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।।

मोरें तुम्ह प्रभु का भाव औरो के सब नाते पृथक पृथक होते है एक जगह निर्बाह नहीं हुआ तो दूसरी जगह चले जाते है पर मेरे तो सब आप ही है तब में अन्यत्र कहाँ जाऊ ?

मोरें तुम्ह प्रभु  गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।।
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा । प्रभु तजि भवन काज मम काहा।।

(नरनाहा=राजा) का भाव आप तो राजा है राजाओ के व्यवहार को जानते है जरा विचार कर देखे कि एक राजा का पुत्र अपने पिता के बैरी राजा के आश्रित होकर कब सुखी रह सकता है?राजाओ की तो यही रीती है यथाः

भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काउ॥s

यही विचार कर तो बाली ने मुझे आपकी गोद मे डाला है प्रभु तजि भवन काज मम काहा।।भाव यह है कि घर में मेरा क्या काम राजा श्री सुग्रीव जी है उनकी सहायता के लिए मंत्री गण एवं सेना है “प्रभु तजि “का भाव यह है कि घर बार छोड़ कर प्रभु की सेवा करनी चाहिये ,जो प्रभु की सेवा छोड़ कर घर की सेवा करता है उस पर तो विधि कि वामता (प्रतिकूलता,विरुद्धता)  होती है यथाः

परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥

श्री लक्ष्मणजी, श्री रामजी और श्री जानकीजी को छोड़कर जिसको घर अच्छा लगे, विधाता उसके विपरीत हैं॥

मैं घर की सब नीची से नीची सेवा करूँगा और आपके चरण कमलों को देख-देखकर भवसागर से तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे श्री रामजी के चरणों में गिर पड़े (और बोले-) हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिए। हे नाथ! अब यह न कहिए कि तू घर जा॥

नीचि टहल(सेवा) -कहने का भाव यह की उच्च सेवा के अधिकारी भरत आदि है

बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना।।
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।।
अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही।।

(सुग्रीव ने कहा-) हे पवनकुमार! तुम पुण्य की राशि हो (जो भगवान ने तुमको अपनी सेवा में रख लिया)। जाकर कृपाधाम श्री राम जी की सेवा करो। सब वानर ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े।

पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।।
अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता॥

अंगद ने कहा- हे हनुमान! सुनो-॥मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, प्रभु से मेरी दण्डवत कहना और श्री रघुनाथजी को बार-बार मेरी याद कराते रहना॥

कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि।
बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि॥

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