ga('create', 'UA-XXXXX-Y', 'auto'); ga('send', 'pageview'); सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥ - manaschintan

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

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सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

सौरज धीरज तेहि रथ चाका

तुलसीदास ने रामजी के माध्यम से हम सभी को यह सन्देश दिया कि  हमारे जीवन में जितने भी सद्गुण  हैं, उन सभी गुणों को धर्मरथ का कोई न कोई अंग बताया है। या ऐसा कहे सद्गुणों से ही विजय होती  है, इस कारण से सभी संतों ,ग्रंथो  ने  छल कपट मोह अहंकार वासना का त्याग करने पर विशेष जोर दिया है  जहां तक साधनों की बात करें तो श्री रामजी ने  भीतर  के साधनों पर ज्यादा जोर दिया  हैं। और यदि  बाहरी साधनों की चर्चा  करें तो रावण की तुलना में श्रीराम कहीं नहीं ठहरते। राम जी  भीतर से दृढ़ होने के बाद  वानर मिले तो उन्होंने उन्हीं की सेना बना ली। भीतर के साधन यदि ठीक हैं तो बाहर के साधन अपने आप मिल ही  जाते हैं। यदि भीतर शौर्य है, धैर्य है तो सहायता करने वाले तो मिल ही जाएंगे। रावण का एक सबसे बड़ा दोष है  कि उसमें अहंकार बहुत है, इसलिए वह सत्य-असत्य और विवेक-अविवेक में फर्क नहीं कर पाता था। इस योग्यता के लिए व्यक्ति का उदार होना अति आवश्यक है। जब तक हम दूसरे का पक्ष देखेंगे नहीं तब तक हम  कैसे फैसला कर सकते है कि दूसरा गलत है वह  सही भी हो सकता है। यह उदारता अहंकार होने पर पैदा नहीं हो पाती। रावण भौतिक शक्ति व संपदा का प्रतीक है और संदेश यही है कि भौतिक शक्ति हमेशा आध्यात्मिक शक्ति से पराजित होती है।

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।।

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।
ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना।।

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।।
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना।।
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा।।

(सौरज=शौर्य =शूरता ,पराक्रम) (धीरज= धैर्य ) ( चाका= पहिया )(शील= चरित्र की दृढ़ता=सदवृत्ति)
(समता= शत्रु मित्र मान अपमान को एक समान मानना महाभारत के अनुसार राग द्वेष काम क्रोध को मिटा कर अपने प्रिय मित्र या शत्रु में समान भाव रखना )  (ईस=ईश =शंकर)  (सुजाना=चतुर ) (बिरति= वैराग्य) (संतोष= किसी भी मायिक पदार्थ की इच्छा ना होना) (परसु=फरसा) (बर बिग्यान= श्रेष्ठ विज्ञान,ज्ञान युक्त भक्ति)  (कोदंडा=धनुष ) (अमल=निर्मल )  (सिलीमुख= बाण, तीर)  (अभेद= अभेद्य =जिसका छेदन न हो सके) 

1 सामान्य रथ में दो पहये होते है अधात्मिक रथ के अनुसार इनको सौरज धीरज दो पहये है। 
2 सामान्य रथ में ध्वजा पताका  होते है अधात्मिक रथ के अनुसार सत्य और शील है।
3 सामान्य रथ में चार घोड़े होते है अधात्मिक रथ के अनुसार बल विवेक दम परहित घोड़े है।
4 सामान्य रथ में चार घोड़े तीन रस्सियों से नियंत्रित होते  है अधात्मिक रथ के अनुसार क्षमा  कृपा समता  है।
5 सामान्य रथ में सुजान सारथी है अधात्मिक रथ के अनुसार शंकर जी का भजन सारथी है।
6 सामान्य रथ में ढाल है अधात्मिक रथ के अनुसार वैराग्य ढाल है।
7 सामान्य रथ में तलवार है अधात्मिक रथ के अनुसार संतोष तलवार है।
8 सामान्य रथ में फरसा है अधात्मिक रथ के अनुसार दान फरसा है।
9 सामान्य रथ में शक्ति है अधात्मिक रथ के अनुसार बुद्धि शक्ति है।
10 सामान्य रथ में (कोदण्ड=धनुष) है अधात्मिक रथ के अनुसार वर विज्ञान कोदण्ड है।
11 सामान्य रथ में तरकश है अधात्मिक रथ के अनुसार निर्मल अचल मन तरकश है।
12 सामान्य रथ में बाण है अधात्मिक रथ के अनुसार शम यम नियम बाण है।
13 सामान्य रथ में कवच है अधात्मिक रथ के अनुसार विप्र एवं गुरु पूजा कवच है।
रामजी में ये सारी विशेषता है इस कारण ही राम जी ने कहा – जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥ साथ ही विभीषण के माध्यम से  हम सभी को संसार सागर पार करने का मार्ग बताया इस कारण ही अखिल ब्रमाण्ड के नायक कहलाये
श्रीमद भागवत गीता और विभीषण  गीता में एक समानता है दोनों का अवतरण  रण भूमि में हुआ श्रीमद भागवत गीता का उपदेश भगवान कृष्ण द्वारा  अर्जुन को कुरुक्षेत्र की रण भूमि में दिया  जबकि बिभीषण गीता का उपदेश भगवान राम जी द्वारा विभीषण को  श्री लंका की रण भूमि में दिया

 

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