मानस चिंतन,सलाह,कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥

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मानस चिंतन,सलाह,कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥

शुक द्वारा रावण को सलाह-शुक को रावण ने विभीषण के पीछे भेजा था। वानरों ने शुक को पहिचान लिया और नाक कान काटने लगे तब रामजी दोहाई देने पर श्री लक्ष्मण जी ने छुड़ा दिया और श्री लक्ष्मण जी ने रावण के लिए पत्रिका दी। तब शुक ने जाकर वह पत्रिका रावण को दी तथा रावण से विनती की कि सीता जगत जननी  को रामजी दे दो तथा आप रामजी शरणगत हो जाओ, यह सुनकर रावण ने शुक को लात मारी, तब वह भाग कर प्रभु की शरण आया। इतना कहते ही वह श्री राम-कृपा से मुनि हो गया।(अध्यात्म रा०)।शुक पूर्व जन्म में वेदज्ञ ब्रह्म निष्ठ ब्राह्मण था।यह वानप्रस्थ विधि से अपने धर्म कर्म में स्थित होकर वन में रहता था। देवताओं की वृद्धि ओर राक्षसों के नाश के लिए इसने वन में बसकर वहुत यज्ञ, तप किए, अतःराक्षस इससे वैर रखते थे। वज्रदन्त नामक राक्षस इसके पीछे पड़ा था। विप्र देव का (अपकार=अहित,अनिष्ट)  करने पर उतारू होकर वह अवसर की घात में रहने लगा। एक दिन अगस्त्यजी  शुक  के आश्रम में आए। मुनि ने उनको भोजन के लिए निमंत्रित किया, अगस्त्य जी स्नान करने गए। उसी समय वह राक्षस अगस्त का रूप रखकर शुक जी  के पास आया और  इनसे कहा कि बकरे का मांस भोजन में  करेंगे वही  बनाना। शुक-मुनि ने मांस बनाया और अन्य बहुत प्रकार के भोजन भी बनवाये। जब अगस्त्य जी आ गए और भोजन करने बेठे तब वज्रदन्त राक्षस ने मुनि की पत्नी को मोहित कर दिया और स्वयं स्त्री बन कर मनुष्य का मांस भोजन में मिलाकर अगस्त्य के आगे परोस कर गायब हो गया। मुनि ने अपने आगे अभच्छ मनुष्य का मॉस देख शाप दे दिया कि तू राक्षस हो जा और मनुष्य का मांस खा। मुनि ने निवेदन किया कि आप तो  ऐसा ऐसा ही  कह गए थे, अतः इसमें मेरा, क्या अपराध? तब अगस्त्य जी ने ध्यान करके सब हाल जान लिया तब शापानुग्रह किया कि तुम जाकर रावण के सहायक होगे। रावण  तुमको गुप्त दूत बनाकर राम के पास भेजेगा, राम दर्शन करने पर तुम शाप मुक्त हो जाओगे और लौट  कर तुम रावण को जाकर तत्व ज्ञान का उपदेश करोगे तव तुम मुक्त होकर परम पद प्राप्त करोगे। मुनि अगस्त्य के ऐसा कहने पर वह राक्षस होकर रावण के पास रहने लगा। अब श्री राम दर्शन कर वह पुनःपूर्ववत ब्रह्मण शरीर हो वानप्रस्थ के साथ रहने लगा । शुक (दूत) ने कहा- हे नाथ! आप  अभिमानी स्वभाव को छोड़कर (इस पत्र में लिखी) सभी  बातों को सत्य समझिए।


कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥

इसी से समझने का और अभिमान को छोड़ने को कहा। ‘समुझहु’ से जनाया कि वाणी गंभीर है, समझने के योग्य है, अभिप्राय युक्त है, समझने से ही समझ पड़ेगी, पर  तुमको तो अभिमान के कारण समझ नहीं पड़ती, अतः जब अभिमान को छोड़ोगे  तभी  समझ पड़ेगी। बाली का अंत तो आपको पता ही है !

अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी॥
मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना॥

आप नाराज ना हो तो एक बात कहता हूँ हे नाथ यही बात लक्ष्मण ने भी कही-

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥

क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिए। हे नाथ! श्री रामजी से वैर त्याग दीजिए।

सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥

यद्यपि श्री रघुवीर समस्त लोकों के स्वामी हैं, पर उनका स्वभाव अत्यंत ही कोमल है।

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥

हे नाथ राम जी ने स्वयं भी अपना स्वभाव कहा है।

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

मिलते ही प्रभु तुम पर कृपा करेंगे और तुम्हारे एक अपराध को भी हृदय में स्थान नहीं देंगे।

मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥

क्योकि रामजी का तो यही (बाना=प्रण) है और रामजी ने स्वयं कहा भी है।

कोटि विप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजौ नहिं ताहू ॥

क्योंकि (लक्ष्मी=अर्थ) के मद ने किसको टेढ़ा और प्रभुता ने किसको बहरा नहीं कर दिया? ऐसा संसार में कौन है? जिसे मृगनयनी (सुन्दर युवती,स्त्री) के नेत्र बाण न लगे हो। अतः वे  भगवान ही है। (सर=बाण) (श्री=लक्ष्मी)

श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि॥

भाव यह कि शत्रु के कहने से नहीं मेरी बात मानकर जानकी जी रघुनाथजी को दे दीजिये। ऐसी ही बात हनुमानजी ने और विभीषण जी ने भी कही, पर जिस बात में राय नहीं पूछी जाती उसमें राय देने से रावण क्रोधित  हो  जाता हैं। रावण अपनी निजी बातो में  किसी से सलाह नहीं चाहता। जिस पर सीता का देना तो वह कान से सुनना ही नहीं  चाहता, इसी  बात पर तो  रावण ने विभीषण को भी लात मारी थी। लात मारने का अर्थ ही यही है कि लंका से निकल जाओ, वध नहीं करता त्याग करता है।

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥

जनक सुता रघुनाथदि दीजे।-यह संदेश तो लछमण जी का था पर शुक ने इसने अपनी ओर से कहा, क्योकि जानता है कि जो कोई भी इससे श्री सीताजी के देने की बात कहता है, उसी पर वह बिगड़ता  है। श्री लछमण जी की ओर से कहूँगा, तो यह उन्हें गाली देगा, जो मुझे नहीं  सुनना चाहिये।  इसलिये अपनी ओर से कहा, अपनी ओर से कहने में मुझे  जो चाहे कहे ।- क्योकि शुक का स्वभाव साधु का ही तो है। (गोघात=गोहत्या)

हरिहर निंदा सुनहिं जो काना । होइ पाप गोघात समाना कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥

इसने भी विभीषण जी का ही रास्ता पकड़ा।(सूत्र) जिसको भी राम प्रेम होता है वह (मोह=रावण) की सभा से लात मारकर ही निकाला  जाता है। यह भी सत्य है कि जब तक मोह को लात नहीं पड़ती तब तक रावण का साथ छूटता भी नहीं अब शुक क्रोधसिन्धु अर्थात रावण को छोड़कर कृपा सिन्धु (रामजी) की शरण मे चला।

शुक भी (विभीषण की भाँति) चरणों में सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर श्री रघुनाथजी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनाई और श्री रामजी की कृपा से अपनी गति (मुनि का स्वरूप) पाई।

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥

 हे भवानी! वह ज्ञानी शुक मुनि था, अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस हो गया था। बार-बार श्री रामजी के चरणों की वंदना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया।

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।

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