मानस चिंतन,सत्संग,बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

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मानस चिंतन,सत्संग,बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

सत्संग का अर्थ ‘संतों का संग’ ऐसा इसलिए संत अथाह ज्ञान का भंडार होते हैं और हमेशा मनुष्य को परमात्मा के रास्ते पर ले जाने का प्रयास करते हैं।वो अपने ज्ञान का उपभोग हमेशा मनुष्य की भलाई के लिए करते हैं और उनका संग अगर मिल जाए तो हम सत्य और मिथ्या में अंतर कर सकते हैजैसे मूर्तिकार पत्थर को तराश कर मूर्ति का रुप देता है। उसी प्रकार जीवन मे जो अशांति, परेशानी, विकार, आदि रहते हैं उनको सत्संग हटा देता है  और मनुष्य का एक निर्मल चरित्र बना देता है। (सूत्र) जब दो संत मिलते है तो राम चर्चा होती है और जब दो संसारी मिलते है तो काम चर्चा शुरू होती है 

जाने बिनु न होई परतीति । बिनु परतीति होई नहीं प्रीती

भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण तब तक नहीं  होगा। जब तक विवेक नहीं होगा प्रभुता जाने बिना उन पर विश्वास नहीं जमता, विश्वास के बिना प्रीति नहीं होती (सूत्र) हमारे जीवन में इन तीन बातों का होना अनिवार्य है सत्संग, भगवद् भजन और परोपकार, इनमें भी सत्संग की बड़ी भारी महिमा है। सत्संग का अर्थ है, सत्य का संग। परमात्मा की प्राप्ति और प्रभु के प्रति प्रेम उत्पन्न करने तथा बढ़ाने के लिए सत्पुरूषों के वचनों को श्रद्धा एवं प्रेम से सुनना  ही सत्संग है। (सूत्र) यदि श्रद्धा एवं प्रेम नहीं है तो सुना हुआ भी ना सुनने के बराबर ही है  जीव का स्वभाव  सत्संग से  परिवर्तित होता ही है। सत्संग उसे नया जन्म देता है। जैसे, कचरे में चल रही चींटी यदि गुलाब के फूल तक पहुँच जाय तो वह देवताओं के मुकुट तक भी पहुँच जाती है।ऐसे ही महापुरूषों के संग से नीच व्यक्ति भी उत्तम गति को पा लेता है। भागवत के ग्यारहवें स्कंध मे भगवान उद्धव से कहते हैं कि संसार के प्रति सभी आसक्तियां सत्संग नष्ट कर देता है। भगवान कहते हैं की हे उद्धव,मै यज्ञ,वेद तीर्थ,तपस्या ,त्याग से वश मे नही होता।लेकिन सत्संग से मै जल्दी ही भक्तों के वश मे हो जाता हूं। पर सत्संग का  मिलना तो  प्रभु कृपा पर आधरित है 

बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।

 सत्संग के बिना विवेक नहीं होता विवेक का अर्थ अच्छे बुरे की पहचान और श्रीरामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता भी  नहीं, सत्संग आनंद और कल्याण की जड़ है सत्संग की सिद्धि ही फल है और सब साधन तो फूल हैं। संत जन कहते है सनातन धर्म में जो ‘सत्संग’ का अर्थ देखने को मिलता है वो है ‘संतों का संग’ ऐसा इसलिए क्यूँकि संत अथाह ज्ञान का भंडार होते हैं और हमेशा मनुष्य को परमात्मा के रास्ते पर ले जाने का प्रयास करते हैं। वो अपने ज्ञान का उपभोग हमेशा मनुष्य की भलाई के लिए करते हैं और उनका संग अगर मिल जाए तो ही हमें ऐसा विवेक मिल सकता है, की हम सत्य और मिथ्या में अंतर कर सके। संतों का संग भी आसानी से नहीं मिलता। जैसे कहा जाता है की भगवान की मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी नहि हिल सकता वैसे ही परमात्मा की मर्ज़ी के बिना सत्संग नहीं मिलता। आनंद और कल्याण का एकमात्र रास्ता केवल सत्संग है जिसकी सिद्धि केवल भगवान की कृपा से ही हो  सकती है

सतसंगत मुद मंगल मुलासोई फल सिधि सब साधन फूल 

अर्थात सत्संग सब मंगलों का मूल है। जैसे फूल से फल ओर फल से बीज और बीज से वृक्ष होता है।उसी प्रकार सत्संग से विवेक जागृत होता है और विवेक जागृत होने के बाद भगवान से प्रेम होता है और प्रेम से प्रभु प्राप्ति होती है ‘जिन्ह प्रेम किया तिन्ही प्रभु पाया’-

स्वयं शंकर जी ने देवताओं से यही कहा। 

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥

भजन में भी यहीं कहा जाता है। 

मोहन प्रेम बिना नहीं मिलता,चाहे कर लो लाख उपाय।

मिले न यमुना सरस्वती में,मिले न गंग नहाए।

प्रेम सरोवर में जब डूबे,प्रभु की झलक लखाए।।

मोहन प्रेम बिना नहीं मिलता,चाहे कर लो लाख उपाय।

मिले न पंडित को ,ज्ञानी को,मिले न ध्यान लगाए।
ढ़ाई अक्षर प्रेम पढ़े तो,नटवर नयन समाए।।

मोहन प्रेम बिना नहीं मिलता,चाहे कर लो लाख उपाय।

मिले न मंदिर में ,मूरत में,मिले न अलख जगाए।
प्रेम-बिन्दु जब दृग से टपके,तुरंत प्रकट हो जाए।।

मोहन प्रेम बिना नहीं मिलता,चाहे कर लो लाख उपाय।। 

 सत्संग से मनुष्य के करोडों-करोडों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं  सत्संग से मनुष्य का मन, बुद्धि शुद्ध होती है– सत्संग से ही भक्ति मजबूत होती है।संतो के संग से मिलने वाला आनंद तो बैकुण्ठ मे भी दुर्लभ है

कबीर जी कहते है कीजब मृत्यु का समय नजदीक आया और राम के दूतों का बुलावा आया तो कबीर दास जी रो पड़े क्यूंकि जो आनंद संत और सज्जनों की संगति में है उतना आनंद तो स्वर्ग में भी नहीं होगा।

राम बुलावा भेजिया , दिया कबीरा रोय 
जो सुख साधू संग में , सो बैकुंठ न होय 

एक घडी आधी घडी आधी मे पुनि आध ।
तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध

साधु का सत्संग करोडों अपराधों को दूर कर सकता है। सत्संग जीवन का कल्पवृक्ष है। जीवन को आनंदमय बनाने के लिए, विषाद को दूर करने के लिए एवं जीवन को उन्नत करने के लिए एवं  सुमति, सत्संग से ही मिलती है। कोई इसका अर्थ ऐसा नहीं ले कि हमारे भीतर कुमति नहीं है बाबा तुलसी ने सुन्दर कहा 

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू

राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा

संतों का समाज आनंद और कल्याणमय है, जो जगत में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहाँ (उस संत समाज रूपी प्रयागराज में) राम भक्ति रूपी गंगाजी की धारा है और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वतीजी हैं

मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।

संत जन कहते है  कीर्ति, गति, ऐश्वर्य और कल्याण आदि जब कभी, जिस किसी ने पाया है वह सब सत्संग ही का प्रभाव जानो। कीर्ति, गति, ऐश्वर्य और कल्याण मिलने का लोक में और वेद में कोई दूसरा उपाय ही नहीं है।

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।।

दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है 

राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।।

 श्री रामकथा के अधिकारी वे ही हैं जिनको सत्संगति अत्यंत प्रिय है

तबहि होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा।।

 रघुनाथजी ने ऐसी लीला की  मेघनाद के हाथों अपने को नागपाश में  बँधा लिया,  गरुड़जी मन में  संदेह हो गया की ये भगवान है या नहीं  नारद को अत्यंत दया आई। (उन्होंने कहा-) हे गरुड़!  आप ब्रह्माजी के पास जाये  ब्रह्माजी  बोले- श्री रामजी की महिमा को महादेवजी जानते हैं आप महादेवजी के पास जाये गरुण जी सोचने लगे की मेरे प्रश्न का उत्तर न तो नारद जी के पास है न ही ब्रम्हा जी के पास  अतः अभिमान के कारण महादेवजी के पास गये महादेवजी  बोले  हे गरुड़! तुम मुझे रास्ते में मिले हो। राह चलते मैं तुम्हे किस प्रकार समझाऊँ?   सुंदर नील पर्वत पर  काकभुशुण्डिजी रहते है वहां जाये वो आपको उत्तर देंगे 

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥

सत्संग के बिना हरि की कथा सुनने को नहीं मिलती, सत्संग के बिना मोह नहीं भागता और मोह के गए बिना श्री रामचंद्रजी के चरणों में दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता

सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई।।
अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा।

जिसके हृदय में भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते । सब साधनों का फल सुंदर हरि भक्ति ही है। उसे संत के बिना किसी ने नहीं पाया। ऐसा विचार कर जो भी संतों का संग करता है, हे गरुड़ जी उसके लिए श्री रामजी की भक्ति सुलभ हो जाती है।

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।
बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान 

गिरिजे! संत समागम के समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वह (संत समागम) श्री हरि की कृपा के बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं। एक क्षण का सत्संग भी दुर्लभ होता है और एक क्षण के सत्संग से मनुष्य के विकार नष्ट हो जाते है। हे गिरजा ये रामजी ने भी कहा है

प्रथम भगति संतन कर संगा । दूसरि रति मम कथा प्रसंगा
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।

पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।

भक्ति स्वतंत्र है और सब सुखों की खान है। परन्तु सत्संग (संतोके संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते। और पुण्य समूह के बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति (जन्म-मरणके चक्र) का अन्त करती है।

सत्संग महिमा,रामचरितमानस के सुन्दर कांड, से

मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥

महाकपि हनुमान जी ने लंकिनी को  एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर ल़ुढक पड़ी। जब जब किसी संत का प्रहार होता है तो विवेक जाग्रत होता ही है। (हनुमान जी एक संत भी है) इसका प्रमाण विभीषण के वचनों में है  और हरी की कृपा के बिना मिलते भी नहीं है

अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।

तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

लंकिनी बोली  रावण को जब ब्रह्माजी ने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसों के विनाश की यह पहचान बता दी थी हे-तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्री रामचंद्रजी के दूत (आप) को नेत्रों से देख पाई

लंकिनी हाथ जोड़कर हनुमान जी से बोली 

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।

हे तात ! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाये। तब भी वे सब सुख मिलकर भी दूसरे पलड़े में रखे हुए उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो क्षण मात्र के सत्संग से मिलता है।’ सत्संग की बहुत महिमा है, सत्संग तो वो दर्पण है जो मनुष्य के चरित्र को दिखाता है और साथ-साथ चरित्र को सुधारता भी है। सत्संग से मनुष्य को जीवन जीने का तरीका पता चलता है। सत्संग महिमा,रामचरितमानस के अरण्य कांड,से

रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥

शूर्पणखा सुन्दर रूप धरकर प्रभु के पास जाकर और बहुत मुस्कुराकर वचन बोली- न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है न मेरे समान स्त्री। विधाता ने यह संयोग (जोड़ा) बहुत विचार कर रचा है। 

नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥

शूर्पणखा को दंड लक्ष्मण ने दिया  बिना नाक-कान के वह विकराल हो गई। (उसके शरीर से रक्त इस प्रकार बहने लगा) मानो (काले) पर्वत से गेरू की धारा बह रही हो। वह विलाप करती हुई रावण के पास गई और रावण को दिव्य शिक्षा दी। नीति के बिना राज्य और धर्म के बिना धन प्राप्त करने से, भगवान को समर्पण किए बिना उत्तम कर्म करने से और विवेक उत्पन्न किए बिना विद्या पढ़ने से परिणाम में श्रम ही हाथ लगता है। विषयों के संग से संन्यासी, बुरी सलाह से राजा, मान से ज्ञान, मदिरा पान से लज्जानम्रता के बिना (नम्रता न होने से) प्रीति और मद (अहंकार) से गुणवान शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं (लक्ष्मण जी भक्ति के आचार्य भी है ) (सूत्र)  लंकनी को संत के द्वारा और शूर्पणखा को आचार्य के द्वारा एक पल का सत्संग मिला उस सत्संग से दोनों की विचार धारा ही बदल गई। 

राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ॥

संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥
 प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहिं बेगि नीति अस सुनी॥

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