मानस चिंतन,राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥

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मानस चिंतन,राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥

प्रभु श्री राम स्वयं विष्णु के अवतार थे। उनके पास असीम शक्तियां थी, परंतु उन्होंने कभी भी इसका दुरूपयोग नहीं किया। प्रभु श्री राम सदैव सभी को साथ लेकर चले। चाहें वह उनकी पत्नी सीता हो या भाई लक्ष्मण, इनके अलावा श्री राम हनुमान, सुग्रीव, और कई लोगों को साथ लेकर ही लंका पर विजय प्राप्त की। राम जी ने सभी की सलाह से कार्य किये। रामजी ने भरद्वाज मुनि के आश्रम में जाते है जो प्रयाग राज में गंगा जमुना सरस्वती के संगम पर स्थित है! राम भरद्वाज जी से वन का मार्ग प्रेम से पूछते है! मुनि जी से राम स्वामी सेवक भाव रखते हुए नाथ सम्बोधन देते है! ऐश्वर्या छुपाते देखकर मुनि जी मन ही मन हंसे कि हम से रास्ता पूछते है।अतः उत्तर देते हैं कि सभी रास्ते तुम्हारे लिए सुगम है।जिसने जग (दुनिया) को तीन पग से नाप दी उसके लिए दुर्गम क्या हैं। (पाहीं=पास,निकट) (मग=रास्ता, मार्ग)


राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥

भरद्वाज मुनि मन में हँसकर श्री रामजी से कहते हैं कि आपके लिए सभी (मग=मार्ग) सुगम हैं।

मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं।सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।s

राम जी बाल्मीक मुनि के आश्रम में आते है और उनसे विनम्रता पूर्वक हे मुनि वह स्थान बताइये जहाँ में लक्ष्मण सीता सहित रहूँ।

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ॥
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौं कछु काल कृपाला॥

बाल्मीक मुनि- राम की भांति भांति प्रसंसा करते है,और अंत में कहते है।

सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।

हे राम आप चित्रकूट पर्बत पर निवास करे,वहां आपके लिए सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत हैऔर सुन्दर वन है हाथी, सिंह, हिरन और पछियो का विहार स्थल है। (सुपास=सुख,आराम ,सुभीता) (सुभीता=वह स्थिति जिसमें किसी काम को करने में कोई कठिनाई न हो, सुविधाजनक स्थिति) (विहग= पक्षी,चिड़िया)

चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥
सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥

राम ने शबरी से सीता का पता पुछा हे भामिनि! अब यदि तू गजगामिनी जानकी की कुछ खबर जानती हो तो बता।यहाँ श्री जानकी जी का हुलिया भी सूचित करते हैं! जानकी जी जनक की कन्या हैं,और श्रेष्ट हाथी की जैसी उनकी चाल है! यहाँ “करिबरगामिनी” पद जनकसुता का विशेषण है। एक तरह से भगवान सीता जी का हुलिया बताते है। यहाँ यह सबरी के लिए सम्बोधन नहीं हो सकता क्योकि सबरी में भगवान माता का भाव रखते है। (गामिनी= प्राचीन काल की एक प्रकार की नाव-यह नाव 96 हाथ लंबी, 12 हाथ चौड़ी और 9 हाथ ऊँची होती थी और समुद्रों में चलती थी । ऐसी नाव पर यात्रा करना अशुभ और दुखदायी समझा जाता था) (करि=हाथी) (वर=उत्तम, श्रेष्ठ)

जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥

राम हे वीर वानरराज सुग्रीव और लंकापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्र को किस प्रकार पार किया जाए? जिस कार्य मे श्री रामजी की न्यूनता होती देखते है, उसे श्री लक्ष्मण जी नहीं सह सकते। सागर के समीप रामजी द्वारा धरना देने मे उनकी न्यूनता है! (तव=तुम्हारा) (सायक= तीर,बाण) (कोटि= करोड़ों) (गंभीरा=गहरा) (गाई=सविस्तार व्याख्या करना,गाना) (कादर=भीरु, डरपोक,व्याकुल, परेशान,आर्त,अधीर,विवश) (जलधि= समुद्र) (सायक=तीर, बाण)

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
सखा कही तुम्ह नीति उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥

रामजी ने लक्ष्मण से हँसकर बोले- ऐसे ही करेंगे,मन में धीरज रखो।

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥

श्री राम विभीषण की सलाह मानकर समुद्र से तीन दिन तक विनिती करते है लेकिन उसके कान पर जू तक नहीं रेंगती, तव वे लक्ष्मण की सलाह मानकर उस पर कोप करते है।

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥

रामजी ने कहा

इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई॥
कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई॥

जामवन्त ने  रामजी से  कहा-हे सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाले) हे सबके हृदय में बसने वाले (अंतर्यामी) हे बुद्धि,बल, तेज,धर्म और गुणों की राशि! (रघुराई=रघुवंसियो के राजा) (रासी=ढेर)

सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी॥
मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालि कुमारा॥

श्री राम जामवंत की सलाह को महत्व देते है।

नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना॥
बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा॥

रामजी ने कहा शत्रु से वही बातचीत करना, जिससे हमारा काम हो और उसका कल्याण हो।(बतकही=बातचीत)

काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई॥

श्री रामचंद्रजी ने सब मंत्रियों को पास बुलाया और कहा- लंका के चार बड़े विकट दरवाजे हैं। उन पर किस तरह आक्रमण किया जाए, इस पर विचार करो। (बाँका=टेढ़ा, तिरछा,अनोखा एवं सुंदर) (अनी=सेना, समूह)

लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा॥
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन।।
करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा।।
जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका।।

श्री राम युद्ध में रावण के मस्तक काट रहे थे काटते ही सिरों का समूह पुनः बढ़ जाता, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है। वैसे ही सेवा से कभी-कभी अहंकार बढ़ जाता है। रावण विद्वान था, तपस्वी था, फिर भी भगवान की इच्छा को समझ नहीं पा रहा था। साधु और शैतान के बीच यही अंतर होता है। शैतान भगवान की बात को न सुनता है, न समझता है, पर साधु तो संकेत पकड़ लेता है। ईश्वर की इच्छा से जरा भी अलग न चलने का नाम ही संतत्व है। । शिवजी कहते हैं – हे उमा! जिस प्रभु कि केवल और केवल इच्छा मात्र से काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवक बिभीषण  की प्रीति की परीक्षा ले रहे हैं। तब श्री रामचंद्रजी ने विभीषण की ओर देखा।

काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा॥

विभीषणजी ने कहा- हे सर्वज्ञ! हे चराचर के स्वामी! हे शरणागत के पालन करने वाले  हे देवता और मुनियों को सुख देने वाले सुनिए। (चराचर =संसार जड़ और चेतन) (पियूष=अमृत,सुधा,दूध)

सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥
नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥

मुनि वशिष्ठजी बोले-श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसर के अनुसार विचार करके वचन बोले- हे सर्वज्ञ! हे सुजान! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञान के भण्डार राम! सुनिए-। (अनुहार=अनुकूल, अनुसार)

बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी॥
सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥

मुनि वशिष्ठजीबोले-आप सबके हृदय के भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भाव को जानते हैं, जिसमें पुरवासियों का, माताओं का और भरत का हित हो, वही उपाय बतलाइए।

सब के उर अंतर बसहु, जानहु भाउ कुभाउ।
पुरजन जननी भरत हित, होइ सो कहिअ उपाउ॥

मुनि के वचन सुनकर श्री रघुनाथजी कहने लगे- हे नाथ! उपाय तो आप ही के हाथ है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो,मैं उसी शिक्षा को माथे पर चढ़ाकर करूँ।

सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ॥ नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौं सिख सोई॥

फिर हे गोसाईं! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरह से सेवा में लग जाएगा (आज्ञा पालन करेगा)। मुनि वशिष्ठजी कहने लगे- हे राम! तुमने सच कहा। पर भरत के प्रेम ने विचार को नहीं रहने दिया।

पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं॥
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा॥

इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरत की भक्ति के वश हो गई है। मेरी समझ में तो भरत की रुचि रखकर जो कुछ किया जाएगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा। (बहोरि बहोरी=बार-बार,पुनः)

तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी॥
मोरें जान भरत रुचि राखी। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी॥

मुनि वशिष्ठजीबोले-पहले भरत की विनती आदरपूर्वक सुन लीजिए, फिर उस पर विचार कीजिए। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदों का निचोड़ (सार) निकालकर वैसा ही (उसी के अनुसार) कीजिए।

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥
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