मानस चिंतन,राम जी के जीवन में (कई बेहतरीन योग फिर भी इतना संघर्ष)जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।

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मानस चिंतन,राम जी के जीवन में (कई बेहतरीन योग फिर भी इतना संघर्ष)जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।

तुलसीदास जी ने कहा-योग, लग्न, ग्रह, वार, तिथि इत्यादि सभी अनुकूल हो गये, हितकर हो गये सहायक हो गये, सखा और मित्र हो गये। सभी जड़ और चेतन हर्षयुक्त हो गये, रोमांचित, पुलकित और प्रसन्नचित्त हो गये क्योंकि श्रीराम का केवल जन्म लेना ही सकल सुखानुभूति का शुभारंभ है, सम्पूर्ण सुखशांति और समृद्धि का मूल आधार है, समस्त सखानन्दधाम का आदि कारण है।(सकल=समस्त)(मूल=कारण) 


जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥

तुलसी बाबा ने कहा – जिस दिन राम जन्म की स्तुति होती है सारे तीरथ, सुख- समृद्धि स्वयं ही आ जाती है।

जेहिं दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहां चलि आवहिं।

तुलसी बाबा ने पार्वती के विवाह पर भी यही कहा-  

बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा। ।

ज्योतिष शास्त्र ही सनातन वेद का नेत्र है। भगवान के प्राकटय पर योग, लग्न एवं ग्रह आदि में  अनुकूलता आ गई ।यह  कोई आश्चर्य की बात नहीं। भगवान जिन पर भी  कृपा करते हैं, उनके लिये भी ग्रह-नक्षत्र की अनुकूलता स्वतः ही आ जाती है । यहाँ  योग, लगन, ग्रह ,बार, तिथि ,आदि पांचो के  नाम देकर सूचित  किया कि पंचांग  मे जो उत्तम विधि है वह सभी अनुकूल हुए।
सकल भए अनुकूल। का भाव यह है कि योग, लग्न और  ग्रह आदि  ये सब के सब  एक ही काल में अनुकूल नहीं होते, अनुकूल और  प्रतिकूल दोनों ही  रहते है। इसका अर्थ यह  कि जो योग प्रतिकूल भी थे, वे भी भगवान के प्राकटय के समय सब अनूकूल हो गए। इसका कारण बताया कि राम जनम सुखमूल है। (सूत्र) राम का जन्म ही सब मंगल की खान है। वशिष्ठ जी भी बोले -हे राजन! अब देर न कीजिए, शीघ्र सब सामान सजाइए। शुभ दिन और सुंदर मंगल तभी है, जब श्री रामचन्द्रजी युवराज हो जाएँ, अर्थात उनके अभिषेक के लिए सभी दिन शुभ और मंगलमय हैं।

बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु॥

नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा।।

तुलसीदास जी ने कहा (मधु मास-चैत्र मास यह सब (मासो=माह) में पुनीत है ऐसा सभी पुराणों में लिखा है) भगवान ने स्वयं कहा है कि ऋतु के कुसुमाकर वसन्त मैं हूँ (कुसुमाकर=वसंत, फुलवारी)(अभिजित=इस नछत्र में तीन तारे मिल कर सिंघाड़े के आकर के होते है यह महूर्त ठीक मध्य समय आता है (अभिजित=विजयी) महूर्त लिखने का भाव यह है इस महूर्त में जन्म होने से मनुष्य राजा होता है) ( हरिप्रीता=इस शब्द के अर्थ में मतभेद है? 1 साधारण अर्थ तो यह है जो हरी को प्रिय है इसी लिए भगवान सदा इसी महूर्त में अवतार लेते है 2 हरी=पुनर्वसु नछत्र प्रीता=प्रीति नामक योग में बाल्मीक और अध्यात्म रामायण में यह स्पष्ट है की राम अवतार सदा पुनर्वसु नछत्र में होता है यह अवतार का प्रधान नछत्र माना जाता है 3 हिरण कश्यप जो किसी से जीता नहीं जा सकता था उसे भगवान ने इसी महूर्त में मारा इससे इस महूर्त को हरी का प्रिय कहा। (लोक=लोग) (पावन काल= में जन्म कह कर जनाया की सबको पवित्र करेंगे) (मधु=शहद मदिरा, शराब,मकरंद,वसंत ऋतु,चैत ) 

पवित्र चैत्र का महीना, नवमी तिथि, शुक्ल पक्ष, और भगवान का प्रिय अभिजित मुहूर्त, अभिजीत मुहूर्त ठीक मध्य में  होता है। दोपहर के समय न बहुत सर्दी, न धूप (गरमी), वह पवित्र समय सब लोकों को शांति देनेवाला है।(सूत्र) मध्य दिवस माने सुख और दुख के बीच। सुख के साथ सुखी रहोगे दुख के साथ दुखी रहोगे। तो कभी भी आनंद प्राप्त नहीं होगा। जबकि आनंद (राम) तो मध्य में मिलता है।(सूत्र) कृष्ण ने गीता  का ज्ञान  दोनों सेना  के बीच में दिया था। महाभारत के युद्ध में अर्जुन का रथ न कौरव के पक्ष में न ही पांडव के बीच में था दोनों सेनाओं के बीचों बीच था। तब अर्जुन गीता का ज्ञान पाया था। (गीता माने कृष्ण का हृदय) 

भगवत कृपा से अर्थ, धर्म, मोक्षादि की प्राप्ति तो साधारण बात है। इसी कृपा के सहारे सन्त तुलसीदास जी जैसे परम भागवत महाकवि ने महान संकट झेलकर  (भवसागर=संसार सागर ) से उद्धार करने के लिए  श्री राम चरित मानस जैसे  पावन सेतु का निर्माण किया। पर फिर भी भगवान के प्राकटय में (कई बेहतरीन योग फिर भी जीवन में  इतना संघर्ष) क्यों ?
महर्षि वशिष्ठ से भरत जी ने पूछा प्रभु आप तो संसार के सबसे श्रेष्ठ मुनि व महाज्ञानी हैं।हमारे कुल गुरु है आपने राम के राजतिलक का ऐसा मुहूर्त कैसे निकाल दिया कि महाराज दशरथ की मृत्यु हुई, राम वनवास गए, और पूरी अयोध्या चौपट हो गई। वशिष्ठ जी ने भरत के माध्यम से हम सभी को सन्देश दिया कि हानि, लाभ, जीवन, मरन, जस, अपजस, किसी भी व्यक्ति के वश या हाथ  में नहीं है।  (सूत्र) जब हमारे हाथ में कुछ है ही नहीं तो अहंकार किस बात का? (भावी=होनहार,प्रभु इच्छा)

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहहु मुनिनाथ ।
हानि लाभ जीवन मरन जस अपजस विधि हाथ।।

वशिष्ठ जी खूब विचार कर कहा कि भावी तो अत्यंत प्रबल है यह तो होगी ही इसका कोई समाधान नहीं होता इन छह भावी पर (हरि इच्छा भावी बलवाना) कहा और मानस में घटित भी हुई हानि हुई अयोध्या वासियों को, लाभ हुआ देवताओं और ऋषि मुनियों को, जीवन मिला सुग्रीव और विभीषण को, मरन हुआ रावण और निशाचरों का, जस मिला भरत और लछ्मण को, अपजस मिला कैकई और मंथरा को

जनम मरन सब दु:ख सुख भोगा। हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा॥
काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं॥

सुमंत्र जी ने महराज दशरथ जी से भी कहा-जन्म-मरण, सुख-दुख के भोग, हानि-लाभ, प्यारों का मिलना-बिछुड़ना,ये सब हे महराज ! काल और कर्म के अधीन रात और दिन की तरह स्वतः होते रहते हैं। इनको रोका नहीं जा सकता । (बरबस=न चाहते हुए भी,स्वतः) 
जब सभी कुछ विधाता के हाथ है तो हमारे हाथ में है क्या? हमारे हाथ में केवल और केवल कर्म है  श्री कृष्ण ने कहा (कर्तव्य करो पर फल की आशा मत रखो)

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करहि सो तस फल चाखा।।
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥

पर जीव का स्वभाव है कि बिना फल (स्वारथ,लाभ) के कोई कर्म करता ही नहीं  बाबा तुलसी ने सुन्दर शब्दो में व्याख्या की है!

सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।

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