मानस चिंतन,पार्वती विवाह, जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥

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मानस चिंतन,पार्वती विवाह, जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥

भृंगी के अवाहन पर सभी भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल, डाकिनी, जोगिनी, शिव जी की बारात में शामिल हुए शिव जी अपने पूरे समाज को देखकर मन ही मन विष्णु जी की इच्छा को पूरी करते है अब तो बारात वर के योग्य हो गई है ऐसी बारात को देख कर देवता प्रसन्न हो रहे है शंकर जी के गण विलक्षण है किसी का तो  मुख ही नहीं है,  किसी किसी के तो कई मुख है, किसी किसी के तो हाथ पैर नहीं है, और किसी किसी के बहुत से हाथ पैर है,कोई केकड़े जैसा बहुत हाथ पैर वाला है। किसी किसी की आँख ही नहीं है और किसी किसी के सिर ही नहीं है, कोई कोई तो बहुत  मोटा है और  कोई अत्यन्त दुर्बला पतला है। कोई तो काला है और कोई कोई तो बहुत गोरा है बाबा ने सारे संसार के उपेक्षित वर्ग जिसको कोई पूछता नहीं है उसको अपने विवाह में बुलवाया। सभी गणो की आवाज बकरे, उल्लू , भेड़िये जैसी है।  किसी ने पूछा  बाबा आपके तो बड़े बड़े मंदिर है पर मंदिरों को छोड़ कर मरघट में क्यों रहते हो? बाबा ने कहा मरघट ही वह जगह है जहाँ परिवार मित्र प्रिय सभी मिलकर अपने प्रीतम को मरघट में छोड़ कर लौट जाते है और मुड़ कर देखते तक नहीं है उनको में ही  सम्भलता हूँ।   (नाद=आवाज) (वृक=भेड़िया) (अज=अजन्मा, शिव, ब्रह्मा, चंद्रमा, ईश्वर,बकरा)


 जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥

नाचहिं नाना रंग तरंग बढ़ावहिं । 
अज उलूक बृक नाद गीत गन गावहिं ।।

नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई॥
करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना॥

बारात को नगर के निकट आई सुनकर नगर में चहल-पहल मच गई, जिससे उसकी शोभा बढ़ गई। अगवानी करने वाले लोग श्रृंगार करके तथा नाना प्रकार की सवारियों को सजाकर आदर सहित बारात को लेने चले। (खरभरु=खलबली ) (अगवाना= अतिथि का स्वागत करना)

हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी॥
सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे॥

देवताओं के समाज को देखकर सब मन में प्रसन्न हुए और विष्णु भगवान को देखकर तो बहुत ही सुखी हुए, किन्तु जब शिवजी के दल को देखने लगे तब तो उनके सब वाहन (सवारियों के हाथी, घोड़े, रथ के बैल आदि) डरकर भाग चले। (बिडरि=डरकर)

धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने॥
गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता॥

(सूत्र) सयाना कौन? सियाने का अर्थ अधिक उम्र वाला व्यक्ति नहीं, जो व्यक्ति अपने जीवन की विपरीत से  विपरीत परिस्थतियों में भी प्रभु की कृपा का दर्शन करें वही सियाना कहलाता है। बाबा तुलसी ने इस विवाह में तीन रसों का दर्शन कराया है सयानें में शांत रस , देवताओं में  हास्य रस, और बालकों में भयानक रस है। घर पहुँचने पर जब माता-पिता पूछते हैं, तब वे भय से काँपते हुए शरीर से कहते है।

कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता॥
बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा॥

बच्चों ने कहा बारात नहीं यह तो यमराज की  सेना है दूल्हा  पागल है, एक तो बैल पर सवार है, दूसरे  बैल की पूछ की ओर मुख किये है, दूल्हे ने आभूषणो की जगह सर्पो, मनुष्यों की खोपड़ियों की माला पहनी है और पूरे शरीर पर राख लपेटे है। सर्प और मुंडमाल ही उसके भूषण है, वह नंगा, जटाधारी और भयंकर है। जिसके पास  घोड़ा नहीं होता वह भी विवाह  में  घोड़ा मांग लेता है। जिसकी बारात में लक्ष्मीपति आवें उसे घोड़ा न मिले यह कैसे हो सकता है। पर समर्थ होते हुए भी  बैल  पर चढ़कर विवाह करने आया है अतः इसमें कोई शक नहीं कि दूल्हा पागल है | उसमें और भी पागल के लक्षण  है। यदि गहना नहीं होता तो  बिना गहने ही आता। सर्प  खोपड़ी ओर राख कौन सा गहना है। उसके साथ में भूत, प्रेत  पिशाच, योगनियों  और राक्षस है। अतः जो इस बारात को देखने के बाद जीवित रहेगा वह सचमुच में  बड़ा ही पुण्यशाली होगा और वही उमा  का विवाह  देख सकेगा। क्या कहें, कोई बात कही नहीं जाती। यह बारात है या यमराज की सेना? (बौराह=पागल)  (छारा=राख ,भस्म ) (बसह=बैल ,नंदी ) (असवारा=सवार) 

कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥

मैना सोने का थाल लेकर हर्ष के साथ शिवजी का परछन करने चलीं।  परिछ्न ( परि अर्चन) यह  एक रीति है कि महिलायें  वर के पास जाकर वर को दही अछत का टीका लगाती  है, और आरती उतरती है। जब महादेवजी को भयानक वेष में देखा तब तो स्त्रियों के मन में बड़ा भारी भय उत्पन्न हो गया। (अर्चन=पूजा) (अछत=जिसके  खंड या टुकड़े न हुए हों, अखंडित,चावल)

मैना जी दुखी होकर पार्वती से कहती है। 

जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा॥

जिस विधाता ने तुमको ऐसा सुंदर रूप दिया, उस मूर्ख ने तुम्हारे दूल्हे को बावला कैसे बनाया? जो फल  कल्पवृक्ष मे लगना चाहिए वह जबरदस्ती बबूल में लग रहा है। बेटी मैं तुमको लेकर  पहाड़ से कूद पडूँगी,  आग मे जल  जाऊंगी, समुद्र मे डूब जाऊगी। घर जाय चाहे अपयश हो पर में तो जीते जी शिव जी से विवाह नहीं  होने दूगी। रोष में मैना रानी अपनी पुत्री को अमृत फल विधि ब्रह्मा को कल्पवृक्ष और शिवजी की तुलना बबूल से कर रही है बबूल में सिर्फ काटे होते है। इस वर में भी सर्प, विभूति, मुण्डमाला , बाघम्बर, जटा ये सभी कण्टक ही कण्टक है  । कल्पवृक्ष से तो  सभी का मनोरथ पूर्ण होते है और बबूल  से मनोरथ भंग होता है। अज्ञानता या परिस्थितियों के कारण  ऐसा कहने वाले का कोई दोष नहीं है क्योंकि 

अति आरत, अति स्वारथी, अति दीन  दुखारी।
इनको बिलगु न मानिये, बोलहिं न बिचारी॥

नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा॥

मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया सप्तषियो ने तो विष्णु से विवाह कराने का प्रस्ताव भी रखा था सप्तषियों महात्माओं ने तो स्पष्ट कह दिया था।

सप्तषियों ने तो ठीक ही  कहा था । 

सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह।
नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह॥

नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई॥

चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥

पर नारद  के उपदेश पर मेरी बेटी दृण रही नारद का कहा हुआ  तप जहर हो गया। फल यह हुआ कि पागल वर मिला। नारद जी वर के दोष से परिचित थे। जानबूझकर नारद ने  उल्टा उपदेश दिया। भला तप तो ऐसा वर नही मिलने के लिए करना चाहिए था   मिलने के लिए नहीं, और नारद ने पार्वती को ऐसा उपदेश दिया कि जिससे उसने बावले वर के लिए तप किया।

साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया॥
पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा॥

सचमुच उनके न किसी का मोह है, न माया, न उनके धन है, न घर है और न स्त्री ही है,नारद तो  सबसे उदासीन है। इसी से वे दूसरे का घर उजाड़ने वाले हैं। उन्हें न किसी की लाज है, न डर है। भला, बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा को क्या जाने।

करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥

माता  को परेशान  देखकर पार्वती जी ने विबेक सहित  कोमल वाणी से कहा  हे माता ! ऐसा विचार कर  कर  सोच नहीं करो क्योंकि जो विधाता लिखता है वह टल नहीं सकता मेरे कर्म ( प्रारब्ध) में जो  वावला पति लिखा है तो फिर क्यों दूसरों  को क्यों दोष  दिया जाये? क्या तुमसे विधाता के लिखे हुए अंक मिट सकते है? यह संभव नहीं है तो  फिर  हे  माता आप वृथा ही  कलंक मत लो।  

कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥

तब हे माता तुमसे क्या मिटेगा। इस समाचार को सुनकर हिमांचल जी , नारद ऋषि और  सप्तषि के साथ तुरन्त घर गये।

तब नारद सबही समुझावा। पूरुब कथा प्रसंगु सुनावा॥
मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी॥

तब नारदजी ने पूर्वजन्म की कथा सुनाकर सबको समझाया और कहा कि हे मैना! तुम मेरी सच्ची बात सुनो, तुम्हारी यह लड़की साक्षात जगतजननी भवानी है।

अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि॥
जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि॥

ये अजन्मा, अनादि और अविनाशिनी शक्ति हैं। सदा शिवजी के अर्द्धांग में रहती हैं। ये जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली है और अपनी इच्छा से ही लीला शरीर धारण करती है।

जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई॥
तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं॥

पहले ये दक्ष के घर जाकर जन्मी थीं, तब इनका सती नाम था, बहुत सुंदर शरीर पाया था। वहाँ भी सती शंकरजी से ही ब्याही गई थीं। यह कथा सारे जगत में प्रसिद्ध है।

 एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा॥
भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा॥

एक बार इन्होंने शिवजी के साथ आते हुए (राह में) रघुकुल रूपी कमल के सूर्य श्री रामचन्द्रजी को देखा, तब इन्हें मोह हो गया और इन्होंने शिवजी का कहना न मानकर भ्रमवश सीताजी का वेष धारण कर लिया। सतीजी ने जो सीता का वेष धारण किया, उसी अपराध के कारण शंकरजी ने उनको त्याग दिया। फिर शिवजी के वियोग में ये अपने पिता के यज्ञ में जाकर वहीं योगाग्नि से भस्म हो गईं। अब इन्होंने तुम्हारे घर जन्म लेकर अपने पति के लिए कठिन तप किया है ऐसा जानकर संदेह छोड़ दो, 

पार्वतीजी तो सदा ही शिवजी की प्रिया (अर्द्धांगिनी) है।

पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥
बेदमन्त्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥

जब महेश्वर (शिवजी) ने पार्वती का पाणिग्रहण किया, तब (इन्द्रादि) सब देवता हृदय में बड़े ही हर्षित हुए। श्रेष्ठ मुनिगण वेदमंत्रों का उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजी का जय-जयकार करने लगे।

अंत में माता ने दिव्य  उपदेश पार्वती के माध्यम से सभी नारियों को दिया हे पार्वती! तू सदाशिवजी के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिए पति ही देवता है। 

करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा॥
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥

फिर बोलीं कि विधाता ने जगत में स्त्री जाति को क्यों पैदा किया? पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता। नारी बाल्य अवस्था में पिता के, प्रौढ़ अवस्था में पति के, और वृद्ध अवस्था में पुत्र के आधीन रहती है क्योकि इसका स्वतंत्र रहना हानिकारक है। 

कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहूँ सुखु नाहीं॥

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