मानस चिंतन,परहित,परहित बस जिन्ह के मन माहीं ।तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥

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मानस चिंतन,परहित,परहित बस जिन्ह के मन माहीं ।तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥

संत  कहते  है आत्म कल्याण से मनुष्य पर  प्रभु की कृपा नहीं हो सकती। शास्त्रों ने भी लोक कल्याण को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म कहा है। लोक कल्याण के कारण  ही देवऋषि नारद के लिए भगवान के द्वार हमेशा खुले रहते है। परोपकार का भाव रखना बहुत अच्छा है लेकिन उस परोपकार के बदले उपकार का भाव रखना लालसा है। लालसा आते ही परोपकार का  सामर्थ्य कम हो जाता है। (ध्यान से सोचिए), सत्य लगेगा। परहित केवल और केवल नि:स्वार्थ होना चाहिए। परहित करने में प्रेम, सद्भाव और सहिष्णुता जैसे सभी सकारात्मक भाव समाहित हैं, जो धर्म के अंग हैं।(उपकार=भलाई= सहायता) (समाहित= व्यवस्थित रूप में एकत्र किया हुआ,व्यवस्थित) (सहिष्णुता=सहनशीलता)
जहां  स्वार्थ का भाव आ गया, वहां परहित रहता ही नहीं। यदि किसी की भलाई, बदले में कुछ लेकर की तो वह भलाई नहीं एक प्रकार का व्यापार है। परहित तो वह है, जिसमें दधीचि मुनि ने  देवताओं की रक्षा के लिए अपनी अस्थियां दे देते हैं।  स्वयं का बलिदान कर दिया  हैं।  राजा दिलीप  गाय को बचाने के लिए अपने शरीर को सिंह का भोजन बना दिया। और परहित तो वह है, जिसमें विलाप करती हुई जानकी को रावण के चंगुल से बचाने के लिए संघर्ष करते हुए जटायु अपने प्राण न्यौछावर कर देते हैं। ऐसी कई कथा है।

परोपकारशून्यस्य धिक् मनुष्यस्य जीवितम् ।
जीवन्तु पशवो येषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥

परोपकार रहित मानव के जीवन को धिक्कार है।ऐसे मनुष्य से तो वे पशु धन्य है, जिनका  मरने के बाद चमड़ा हड्डी भी उपयोग में आते है।

सत्रु मित्र सुख, दुख जग माहीं। मायाकृत परमारथ नाहीं॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं।।

तुलसीदास जी कहते हैं देवता, आदमी, मुनि सभी  की यही रीति है कि सब के  सब  अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु ही प्रेम करते हैं इस संसार में सभी शत्रु और मित्र तथा सुख और दुख, माया झूठे हैं वस्तुतः वे सब बिलकुल नहीं हैं।

परहित बस जिन्ह के मन माहीं ।तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥

तनु तजि तात जाहु मम धामा ।देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥

स्वार्थ तो सब के मन में रहता ही है पर जिस मनुष्य के मन में परहित दूसरों  के कल्याण की भावना होती है, ईस्वर सदा उसके मन, वाणी, कर्म मे बसते है! जटायू जी ने परहित कर्म कर माता सीता के लिए अपने  प्राण दिए अंततः उनकी मुक्ति हेतु पूर्ण ब्रम्ह प्रभु राम आये! प्रभु के प्रिय होने का नियम है लोक कल्याण से ही अपना कल्याण ही संभव है पूर्णकाम को कोई कुछ दे भी तो नहीं सकता पूर्णकाम  के लिए राम धाम है जहां से फिर लौटना नहीं पड़ता

सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥
जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज तें गति पाई॥

जटायू जी बोले वही (आप) प्रभु राम  मेरे नेत्रों के विषय होकर सामने खड़े हैं। हे नाथ! अब मैं किस कमी (की पूर्ति) के लिए देह को रखूँ? नेत्रों में जल भरकर श्री रघुनाथजी कहने लगे- हे तात! आपने अपने श्रेष्ठ कर्मों से (दुर्लभ) गति पाई है। तुमने परहित के लिए प्राण दिए है सद्गति तुम्हारे हिस्से की चीज है गीधराज राम से  (राखौं देह नाथ केहि खाँगें)  कह चुके है

रामायण का  दृश्य  कि गीधराज जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं, भगवान रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं। महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान कृष्ण हँस रहे हैं और रामायण में जटायु जी हँस रहे हैं और भगवान राम रो रहे हैं बोलो, भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं? अंत समय में जटायु को भगवान श्री राम की गोद की शय्या मिली, लेकिन भीषण पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली। जटायु अपने कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहा है, राम जी की शरण में, राम जी की गोद में और दूसरी तरफ बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं ।ऐसा अंतर क्यों? ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था, विरोध नहीं कर पाये थे। दुःशासन को ललकार देते, दुर्योधन को ललकार देते, लेकिन द्रौपदी रोती रही, सभा में किसी में इतना बल नहीं था की भीष्म का मुकाबला कर सके  लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे।

राम जी ने हनुमान जी और अपने भाइयों से  कहा- हे भाई! दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है। यही पाप भीष्म का था जिसके करण  मरते समय बाण की शय्या मिली। 

हे तात! समस्त पुराणों और वेदों का यह निर्णय (निश्चित सिद्धांत) मैंने तुमसे कहा है, इस बात को पण्डित लोग जानते हैं। (कोविद= प्रकांड विद्वान) (सरिस=समान, तुल्य) (अधमाई= अधमता,नीचता) 

परहित सरिस धरम नहिं भाई ।पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥

परोपकार की भावना मनुष्य को महानता की ओर ले जाती है। परोपकार से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है।

तदपि करब मैं काज तुम्हारा।श्रुति कह परम धरम उपकारा।।

गोस्वामी जी देवताओं के लिए सुरन्ह शब्द का प्रयोग करते हैं अर्थात् स्वार्थ ने इतना अंधा कर दिया है कि वे सहायता के लिए कामदेव की अस्तुति करते हैं पर उन्हें कामदेव का क्या होगा इसकी चिंता नहीं है। देवताओं को अपने स्वार्थ में इतनी शीघ्रता है कि कामदेव प्रकट हुए कि कुशल क्षेम नहीं बल्कि सीधे अपनी विपत्ति सुनाने लगे। पर शिव विरोध करने से कामदेव पर कितनी भारी विपत्ति आएगी वे उस पर ध्यान नहीं देते हैं। देवताओं को देखकर, उनके व्यवहार पर रामजी को हंसी आ जाती है कि देखो स्वर्ग में रहने वालों की ऐसी सोच है। आज तारकासुर के अत्याचार के पीछे  इन्हीं देवताओं का हाथ है पर अपनी गलती नहीं कहते बल्कि विपत्ति कह रहे हैं। देवता बड़े पूज्य हैं, ऊंच निवास है और नश्वर सुख के लिए कामदेव  को महा विपत्ति में ढकेल रहे हैं।

परहित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही।।

कामदेव कहते हैं कि जो लोग परोपकार के लिए अपने शरीर का त्याग करते हैं संत सदा उनकी प्रशंसा करते हैं। ऐसे विरले होते हैं जो परोपकार के लिए अपने प्रिय शरीर को त्याग करते हैं क्योंकि सामान्यतः सभी को अपना शरीर बहुत प्रिय होता है।

सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥

शरीर का त्याग तो जटायु ने किया और मारीच ने भी किया, और जटायु रावण के हाथों मर कर भी परम भाग्यवान हुए। मारीच यद्यपि श्रीराम जी के हाथों मरा पर कोई उसकी प्रशंसा नहीं करता क्यों ? मारीच भले ही श्रीराम जी के हाथों मुक्त हो गया पर संत जन उसके मार्ग को अर्थात स्वार्थ को कभी उचित नहीं कहते। क्योकि मारीच ने माया का मृग बनकर तन से छल किया फिर लक्ष्मण जी का नाम पुकार कर वचन से छल किया पर मारीच के मन में शुद्ध प्रेम होने के कारण प्राण त्याग करते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया और प्रेम सहित रामजी का स्मरण किया रामजी ने वह गति (अपना परमपद) दिया जो मुनियों को भी दुर्लभ है

अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना॥

अंत में बाबा तुलसी ने भी  मारीच को खल कहा-

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा॥

अतः संत जन उसके मार्ग को अर्थात स्वार्थ को कभी उचित नहीं कहते।

हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।
हेतु रहित-राम जी पूर्ण काम है माता सीता ने कहा भी 
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥ 

स्वार्थ तो तभी होता है जब कोई कामना होती है और जो पूर्ण काम है उसमें स्वार्थ हो ही नहीं सकता माता पिता सभी स्वार्थ से हितकारी होते है पर आप और आपके भक्त निष्काम होते है और बिना हेतु के परोपकार करते है यह तो आपका सहज स्वाभाव है

स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं।।

गोपियाँ उद्धव जी से कह रही है-बंधुओं के सिवाय  मित्रता किसी ना किसी प्रयोजन से की जाती है कार्य हो जाने पर उस मित्रता का अंत हो जाता है  स्त्री से पुरुष की मित्रता, भॅवर का फूलों पर अनुराग, स्वार्थ मित्रता के उदाहरण है, (सूत्र) मनुष्य के निर्धन होने पर वेश्या उस मनुष्य को, असमर्थ होने पर प्रजा राजा को, विद्या प्राप्त होने पर विद्यार्थी  गुरु को, दक्षिण पा जाने पर यजमान को, फल न रहने पर पक्षी वृक्ष को, भोजन कर लेने के बाद अतिथि उस घर को, वन जल जाने के बाद मृग उस वन को, स्वतः ही त्याग देते है संसार में ऐसी ही स्वार्थ मित्रता देखी जाती है। 

जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई॥

(सूत्र) स्वार्थ का व्यापार ही संसार में चलता है और यही इस संसार की रीति है मित्र परोपकारी होते है एक दूसरे का स्वार्थ साधन करते है परन्तु परमार्थ साधन की मित्रता कहीं भी दिखाई नहीं देती।
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