मानस चिंतन,नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥

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मानस चिंतन,नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥

सप्तऋषि ने पार्वती को भटकाने के लिए बहुत कुछ कहा:-जो स्त्री-पुरुष नारद की सीख सुनते हैं वे घर-बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी अर्थात विरक्त (बाबा जी) हो जाते हैं। नारद के मन में कुछ है और बाहर दिखाने को कुछ और ही है। कपटी’ कहकर दूसरे चरण में कपट का कारण कहते हैं जैसे नारद स्वयं घरवार रहित है वैसे ही किसी के भी घर बार न रह जाय। बसा बसाया घर देख उसे उजाड़ने की (टोह= खोज) में लगे रहते है। उनका मन तो कपटी है, शरीर पर सज्जनों के चिह्न हैं। वे सभी को अपने  जैसा बनाना चाहते हैं। देह में ऊपर से तिलक, कंठी,माला धारण दिये हुए, वीणा लिये श्री राम यश गाते रहते हैं।ये सज्जनो के चिन्ह रखते हैं, पर कर्तव्य तो निराला ही है कि सज्जन तो बिछुड़ों को मिलाते हैं और ये फोड़ते हैं। (जे सुनहिं) ऐसा कोई भी नहीं है जिसने नारद जी की सलाह मानी हो और उसका घर ना बिगड़ा हो (सूत्र) नारद तो अपने जैसा ही सारे संसार को सुखी बनाना चाहते है पर संसार स्वयं सुखी होना नहीं चाहता। (सरिस=समान,तुल्य) (अवसि=अवश्य ही)


नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥

(अवसि =अवश्य ही) भिखारी होने का अर्थ घर घर जाकर भीख मांगनी पड़ती है या दुख होता है पर्वती आप अपने को देखो आपका घर छुड़वाया तप करने के लिए वन में भेजा और तप भी किसके लिए ? भिखारी से विवाह करने के लिए, जिसमें एक भी गुण नहीं है।(सरिस=समान)

मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥

नारद के वचनों पर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेषवाला, नर-कपालों की माला पहनने वाला, कुलहीन, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखने वाला है! (निर्गुन=गुणरहित त्रिगुणातीत) (त्रिगुणातीत= जो तीनों गुणों सत, रज और तम से परे हो) (निलज=निर्लज्ज=लज्जा रहित) (कुबेष= बुरे वेषवाला) (कपाली=नर-कपालों की माला पहनने वाला) (अकुल=परिवार रहित) (अगेह=बिना घर का) (दिगंबर=नंगा, नग्न) (ब्याली=सर्पी को धारण करने वाला, शिव)

तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥
निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥

सप्तऋषि पार्वती से कहा:-अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिए अच्छा वर विचारा है। वह बहुत ही सुंदर, पवित्र, सुखदायक और सुशील है, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं!

अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा॥
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला॥

सप्तऋषि पार्वती से कहा:-वह दोषों से रहित, सारे सद्गुणों की राशि, लक्ष्मी का स्वामी और वैकुण्ठपुरी का रहने वाला है। हम ऐसे वर को लाकर तुमसे मिला देंगे। (सूत्र) (नार+द=नारद) (नार=ज्ञान) जो ज्ञान दे उसका नाम ‘नारद,है! (श्रीपति=लक्ष्मी के पति भगवान विष्णु)

दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥
अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी॥

यह सुनते ही पार्वतीजी हँसकर बोलीं-

नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरउँ॥

(सूत्र) हम सभी को माता पार्वती का उपदेश कि गुरु वाक्य पर शिष्य का ऐसा ही दृद विश्वास रहना चाहिये। विश्वास का धर्म दृणता है,वह अवश्य फलीभूत होगा इसमें संदेह नहीं । शिष्य में आचार्याभिमान होना परम गुण है,गुरुनिष्ठ भक्तों की कथाएँ भक्तमाल में भी प्रसिद्ध हैं।सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥ का भाव कि मनुष्यों ही की कौन  कहे देवताओं को भी स्वप्नमें भी सुख और सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। देवराज इंद्र  और चन्द्रमा ये लोकपाल भी ग़ुरु की अवज्ञा करने से दुखी ही हुए! ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं, पर गुरु से विरोध करने पर जगत में कोई भी बचानेवाला नहीं है। अतएव गुरु के वचन पर दृढ् रहना ही कर्तव्य है।

गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥
राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥

यही तो प्रताप भानु ने कपटी मुनि से कहा- गुरु के क्रोध से, कहिए, कौन रक्षा कर सकता है? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं,पर गुरु से विरोध करने पर जगत में कोई भी बचाने वाला नहीं है।

राखइ गुर जौं कोप बिधाता ।गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता ॥

यही तो कबीर दास ने भी कहा। जो लोग गुरु और भगवान को अलग समझते हैं, वे सच नहीं पहचानते।अगर भगवान अप्रसन्न हो जाएँ,तो आप गुरु की शरण में जा सकते हैं। लेकिन अगर गुरु क्रोधित हो जाएँ, तो भगवान भी आपको नहीं बचा सकते।

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

(सूत्र) श्री पार्वती जी  अपने वाक्यों द्वारा उपदेश दे रही हैं कि मनुष्य को अपने उपास्य में दृंढ रहना चाहिये, अन्य में चित्त लगाना उचित नहीं। यहाँ किस सुन्दरता के साथ उत्तर दिया गया है, वह देखने ही योग्य है। शिवजी में आप जो दोष समझे हुए हैं, जो आप अवगुण बताते हैं, वे गुण ही है अवगुण नहीं हैं-यह वाद-विवाद वे नहीं करती । न तो परम श्रद्धा (श्रद्धास्पद=पूजनीय) के गुण-दोष-विवेचन पर बहस करती और न ही विष्णु के विरुद्ध एक शब्द मुख से निकालना उचित  है। वे सप्तर्षियों की बात मान लेती हैं कि ठीक है, शिवजी में दोष -ही-दोष हैं और विष्णुजी में गुण -ही-गुण हैं, पर में करूँ तो  क्या करूँ? मेरा मन तो शिवजी ही में रम गया है, हमें गुण-दोष से कोई सरोकार ही नहीं रह गया। अतः वें ही मुझे प्रिय लगते हैं, दूसरा नहीं। साहब-यह प्रेम की सीमा है।

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥

यही तो मीरा ने भी कहा!

मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई॥

तुलसी दास ने कहा-गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं, किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है। (यदि ऋषि लोग कहें कि तुम एक के बचन पर दृढ़ रहकर हम सात का अपमान क्यों करती हो?तो उसका उत्तर उमा जी देती है) हे मुनीश्वर आप पहले मिलते तो आप ही के उपदेश सिर पर चढ़ाकर सुनती। अर्थात्‌ सम्मति देने या मानने का समय अब हाथ से निकल गया। अब मैं जन्म संभु हित हारा! में वर्तमान स्थिति कही और आगे भविष्य की भी यही परिस्थिति प्रतिज्ञापूर्वक कहती हैं -जन्म कोटि!

गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।।
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥

अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥

इस जन्म में तप करते-करते प्राण छूट गये तो दूसरे जन्म में फिर उन्हीं के लिये तप करूँगी, फिर भी न. मिले तो तीसरे जन्म में फिर शिव जी ही के लिये तप करूँगी, इसी तरह जब तक वे नहीं मिलेंगे हठ न छोड़ेगी, बराबर प्रयास करूँगी | साहब -यह प्रेम की सीमा है । रहउँ कुवारी॥ का भाव की प्रतिज्ञा न छोडूगी हताश होकर संकल्प के प्रतिकूल विवाह न करूँगी। (रगर=हठ,जिद) (त्राता=रक्षा करनेवाला) (रगर=हठ,जिद)

जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥

महराज इष्ट से आचार्य का दर्जा बहुत बड़ा है तभी तो बाल्मीक जी ने रामजी से कहा  

तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।। 
राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥

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