मानस चिंतन,नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥

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मानस चिंतन,नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥

भगवान परशुराम कहते है कि यह धनुष भगवान विष्णु का है, आखिर यह संदेह मिटे कैसे, हे राम, क्या मैं जो देख रहा हूं वह सच है। यह धनुष लीजिए, इसका संधान कीजिए। शारंग, भगवान विष्णु के धनुष का नाम है। यह धनुष, भगवान शिव के धनुष पिनाक के साथ, विश्वव्यापी निर्माता विश्वकर्मा ने तैयार किया गया था। एक बार, भगवान ब्रह्मा जानना चाहते थे कि उन दोनों में से बेहतर तीरंदाज कौन है, विष्णु या शिव, तब ब्रह्मा ने दोनों के बीच झगड़ा पैदा किया, जिसके कारण एक भयानक द्वंद्वयुद्ध हुआ। उनके इस युद्ध के कारण पूरे ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ गया। लेकिन जल्द ही विष्णु ने अपने बाणों से शिव को पराजित किया। ब्रह्मा के साथ अन्य सभी देवताओं ने उन दोनों से युद्ध को रोकने के लिए आग्रह किया और विष्णु को विजेता घोषित किया क्योंकि वह शिव को पराजित करने में सक्षम थे। क्रोधित भगवान शिव ने अपने धनुष पिनाक को एक राजा को दे दिया, जो सीता के पिता राजा जनक के पूर्वज थे। भगवान विष्णु ने भी ऐसा करने का निर्णय किया, और ऋषि ऋचिक को अपना धनुष शारंग दे दिया।समय के साथ, शारंग, भगवान विष्णु के अवतार और ऋषि ऋचिक के पौत्र परशुराम को प्राप्त हुआ। परशुराम ने विष्णु के अवतार भगवान राम को शारंग दे दिया। राम ने इसका प्रयोग किया और इसे जलमण्डल के देवता वरुण को दिया। महाभारत में, वरुण ने शारंग को खांडव-दहन के दौरान भगवान कृष्ण (विष्णु के अवतार) को दे दिया। गोलोक धाम में वापिस जाने के पहले , श्रीकृष्ण ने इस धनुष को महासागर में फेंककर वरुण को वापस लौटा दिया। परशुराम को बड़ा गर्व था कि शिव जी के अस्त्र शस्त्र धारण करने का समर्थ तो केवल मुझ में ही है  तो फिर धनुष तोड़ने वाला कौन पैदा हुआ  (सूत्र ) मान भंग होने का बहुत बड़ा दुख होता है अतः बिना सोचे समझे फरसा लेकर  युद्ध करने आ गये, भृगु ने तो भगवान विष्णु की छाती में लात मारी थी परशुराम तो उस कुल के सूर्य है अतः अपमान करने में संकोच नहीं करेंगे  पर रामजी ने परशुराम जी  को शांत किया। भगवान के कथन सुनकर परशुराम के मन में संदेह पैदा हो गया कि ये राजकुमार है या परमेश्वर निश्चित नहीं कर पाते वो कथन है। रामजी ने त्रिलोक विजयी धनुष को तोड़ा है और अपने को दास कह रहे है साधारण जीव जब कोई बड़ा कार्य करता है तो अभिमान आ ही जाता है राम जी तो ईश्वर होने के संकेत तो दे रहे पर क्रोध के कारण परशुराम समझ नहीं सके बाबा तुलसी दास ने सुन्दर ही कहा है।


नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥ 
हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥ 

परशुराम क्रोध के कारण जनक जी को मूर्ख कह रहे है जनक जी साधारण नहीं है श्रीमद्भागवत पुराण के रचनाकार व्यास जी ने भी अपने पुत्र शुकदेव को ज्ञान प्राप्त व भ्रम दूर करने के लिए राजा जनक के पास भेजा।

अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।।

रामजी ने दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत नम्रता से कहा- हे नाथ आपके दास को छोड़ कर धनुष तोड़ने का समर्थ किस में है।

अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।।

वाणी के लिए तो कबीर जी की सुन्दर व्याख्या –

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये। 
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥

परशुराम क्रोध के कारण समझ ना सके उन्होंने तो यही समझा कि धनुष राम जी से भला क्या टूटेगा ये  तो तोड़ने वाले की तरफ से निहोरा कर रहे है। सुनो राम सहसबाहु ने मेरे पिता को मारा था और अब  शंकर जी  का  धनुष तोड़ा जो मेरे गुरु है  अतः पितृ द्रोही और गुरु द्रोही दोनों बराबर के शत्रु होते है अतः जिस प्रकर  मैंने सहसबाहु को मारा उसी प्रकार  धनुष तोड़ने वाले को मरुँगा।  

सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥

राम ने कहा आप सिर रूप और में चरण रूप हूँ आप उत्तमांग रूप ऊँचे और में अधमांग रूप नीचे हूँ युद्ध तो बराबरी से होता है यह विनीत वचन है!

हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा॥
राम मात्र लघुनाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा॥

(सूत्र) राम मात्र पद से नाम जापको को श्री रामजी के मुखार बिन्द से उपदेश हो रहा  है कि दो अक्षर का मन्त्र है! इसमें और कुछ न मिलावें। लघु कहने का भाव  कि मन्त्र जितना ही छोटा होता  है! उतना ही उसका प्रभाव अधिक प्रभावी है। (सूत्र) जिसका जाप स्वयं देवों के देव महादेव भी निरंतर करते हैं। राम नाम महामंत्र है। पर राम जी की दीनता,उदारता  देखो उसको अपने मुख से  छोटा बता रहे है।

महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥

रामजी ने कहा-

देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥

अगर आप मेरे भाई लक्ष्मणजी से नाराज हो तो-

करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी।।
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना।।

बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ।।
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा॥

इस पर आपका रोष और मेरा अभिमान व्यर्थ है क्योंकि धनुष तो पुराना है।

राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी॥
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं केहि हेतु करौं अभिमाना॥

और लक्ष्मणजी ने भी यही कहा-

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥

और जैसे ही राम जी ने कहा- परशुराम जी को कन्फर्म हो गया इतना ब्राह्मण के प्रति आदर केवल नारायण में ही हो सकता है! (सूत्र) जब तक क्रोध का पर्दा पड़ा रहेगा तब तक कुछ भी दिखलाई नहीं देगा। 

बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥
सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥

हे राम! आपके वचन से तो आपका अवतार होना निश्चय हुआ, परन्तु अब कर्म से भी  निश्चय करना  चाहता हूँ। 

राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥

इस कारण लक्ष्मी पति विष्णु जी का जो यह धनुष मेरे  पास है !इसे लो ओर खेंच कर चढ़ा दो तो हमारा संदेह दूर हो परशुराम का वह धनुष स्वतः ही राम के पास पहुंचता है जहँ संदेह है वहां विश्वास नहीं रह सकता परशुराम यहाँ तो आत्म विश्वास को भी खो बैठे थे! धनुष का अपने से चल कर जाने का भाव एक तो धनुष पहले से टूटा पड़ा है। दूसरा में तो इन्ही का धनुष हूँ! धनुष देते समय जो तेज उनमे था वह भी रामजी में चला गया परशुराम जी निस्तेज से हो गए।
 (भगवान ने   परशुरामजी जी को धनुष  देते  समय कह दिया था कि  जो धनुष को चढ़ावे उसको पूर्ण अवतार  जानना ओर तप करने चले जाना) अब यह तो आप ही  चढ़  गया तो फिर परशुरामजी ने विष्णु रूप से  भी परे राम जी को पहचान लिया अतः अब  दुर्वचन कहने का खेद हुआ अतः छमा मांगी  उनका ईश्वरीय अंश भी राम में लय  हो गया।
इसके बाद पुनः भगवान परशुराम के मुंह से निकल पड़ता है: हे रघुकुलरूपी कमल वन के सूर्य! हे राक्षसों के कुलरूपी घने जंगल को जलानेवाले अग्नि! आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गौ का हित करनेवाले! आपकी जय हो। हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम के हरनेवाले! आपकी जय हो। हे रघुकुल के पताका स्वरूप राम! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। ऐसा कहकर परशुराम तप के लिए वन को चले गए। (कोह=अर्जुन वृक्ष, क्रोध,गुस्सा) (बनज=कमल) (कृसानू= लौ, आग, प्रकाश) (अग्याता= अनजाने में) (छमामंदिर= क्षमा के मंदिर) (भृगुकुल केतु=भृगुवंश की पताका रूप परशुराम) (दनुज=राक्षस,दानव)

जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन, दनुज कुल दहन कृसानू।

हे रघुबंस कमल वन के सूर्य = जिस तरह से कमल वन सूर्योदय के उदय से विकसित होता है उसी  तरह आपके अवतरण  से रघुवंश प्रफुल्लित हो रहा है दनुज कुल इस समय वन की भांति सघन और विस्तृत हो रहा है उसके लिए आप अग्नि है वन का नाश जिस भांति अग्नि से होता है  अग्नि  में वह समर्थ है कि वन के विस्तार अनुसार अपनी शक्ति या यो कहे प्रचंडता कम ज्यादा कर शक्ति है इस समय निशाचरों द्वारा विप्र धेनु का अहित हो रहा है उनके लिए आप दनुज बन कृषानु है (बनज=कमल) (भानु=सूर्य) (कृसानू=कृशानु= अग्नि, आग)

जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी।।
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा॥

परशुराम शिव जी के परम भक्त है इस कारण दोनों भाइयों को अपने इष्टदेव का  मन मानस का हंस कह रहे है परशुराम बताना चाहते है की मैं अपने एक मुख से आपके यश को   क्या कहू  जिनके  अनेक मुख है अर्थात  शेष महेश आपका यशोगान नहीं कर सकते।

अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता॥
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू

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