मानस चिंतन,नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥

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मानस चिंतन,नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥

वाल्मीकि रामायण के बाद दूसरी रामकथा तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस में भरद्वाज रामकथा के रसिक हैं। तुलसी ने अपने महाकाव्य के याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद के माध्यम से संत समाज में रामकथा का प्रचार प्रदर्शित किया गया है। मानस के अनुसार, भरद्वाज का आश्रम प्रयाग में है।चरक संहिता के अनुसार, भरद्वाज ने इंद्र से आयुर्वेद और व्याकरण का ज्ञान पाया था उन्हें ब्रह्मा, बृहस्पति एवं इंद्र के बाद व्याकरण का सर्वोच्च चौथा प्रवक्ता माना गया है भरद्वाज इतने महान हैं कि स्वयं श्रीराम उन्हें शीश नवाते हैं किंतु मानस में राम परमेश्वर रूप हैं, अतः परमात्मा के उपासक भरद्वाज उनके रहस्य को जानने के लिए भोले बनकर याज्ञवल्क्य से प्रश्न करते और परमेश्वर रूप राम का गुणानुवाद सुन कर सुख पाते  हैं भृगु से उन्हें धर्मशास्त्र का उपदेश  मिला था। महर्षि चरक ने उन्हें अपरिमित आयु वाला महर्षि कहा है। (अपरिमित= बे-हिसाब, अगणित)


भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥

इतना श्रेष्ठ मुनि जो महर्षि वाल्मीकि का शिष्य है एवं सप्तऋषियों में भी है क्या पूछ रहा है राम कौन है ? जो तापस अर्थात तपस्वी है,तप से तन को कसते है सम दम दया निधाना है अर्थात भीतर बाहर की इन्द्रीयों को कसते है। यह भी तप है!  इन्द्रियों को बस में करने और दुष्कर्मो से बचने के विचार से बस्ती छोड़ कर शरीर को कठिन उपवास व्रत  नियम से शरीर को कष्ट दिए जाने की रीति प्राचीन काल से चली आ रही है इसी को तप कहते है। दूसरों के लिए  दया के  तो खजाना समुद्र  है। (दम =कर्म इन्द्रियों को वश में करना)

सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥

इन विशेषणों से सूचित किया है कि ये कर्मकांडी है (सूत्र) केवल तप (शारीरिक कष्ट) मनुष्य का कर्तव्य नहीं है इन्द्रियों का निग्रह भी जरूरी है नहीं तो वह तप तामसिक हो जायेगा और लाभ की जगह हानि की संभावना बड़ जाती है अनेक ऋषियों की प्रार्थना करने पर भरद्वाज स्वर्ग जाकर आयुर्वेद सीख आये थे! ये बाल्मीक जी के शिष्य थे! (निग्रह=वश में करना) परमारथ पथ=परलोक का मार्ग-क्या है? 
लक्ष्मण जी निषाद से तो यही कहा

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा॥

सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।
राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।।

इस जगत रूपी रात्रि में योगी लोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपंच (मायिक जगत) से छूटे हुए हैं। इस जगत में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए, जब संपूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाए। “परमार्थ पथ”-परलोक का मार्ग, यथार्थ परम तत्व की प्राप्ति या जानने का मार्ग। परमार्थ क्या है? राम की प्राप्ति के लिए जितने भी साधन कहे गए वे सभी परमार्थ पथ ही है ! जो कर्मकांड में परम सुजान है वही परमार्थ पथ को निभा सकता है और उसी के पास आकर  राम जी पूछते है किसी अन्य  से नहीं। (परमारथ= परम+अर्थ = वस्तु,पदार्थ) (पाहीं= पास,निकट) (पाहि= रक्षा करो) (मग=रास्ता, मार्ग) (जामिनि= रात) (बियोगी= बिछुड़ा हुआ) (प्रपंच= मायिक जगत) (केहि= किसे,किसको, किसी प्रकार, किसी भाँति) (सुजान =चतुर, जानकर,कुशल) 
रामजी क्या पूछ रहे है?

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।

प्रभु तो हमेशा से ही भक्तों के अधीन है तभी तो रास्ता पूछ रहे है हे राम आप तो पूरे जगत  के मार्ग दर्शक है आपका मार्ग दर्शक कौन बनेगा ? और मुनि जी ने ऐसा कहा भी 

मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।।

भगवान में भ्रम या संसय होना कोई विशेष बात नहीं है भरद्वाज जी जैसे संत जो परम सुजान है! को संसय हो गया। अतः याज्ञवल्क्य जी से पूछ रहे है? हे नाथ! मेरे मन में एक बड़ा संदेह है, वेदों का तत्त्व सब आपकी मुट्ठी में है (अर्थात आप ही वेद का तत्त्व जानने वाले होने के कारण मेरा संदेह निवारण कर सकते हैं) पर उस संदेह को कहते मुझे भय और लाज आती है। भय इसलिए कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है और लाज इसलिए कि इतनी आयु बीत गई पर अब तक ज्ञान न हुआ, यदि अपने मन की बात नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है क्योंकि इस तरह तो आजीवन   अज्ञानी बना रहूंगा। (अकाजा= अनर्थ,हानि, कार्य का बिगड़ जाना) (करगत= हाथ में आया हुआ, हस्तगत हाथो में प्राप्त,मुठ्ठी में) (संसउ=दो या कई बातो में से किसी एक का भी मन में ना बैठना) (तत्त्व= सिद्धांत= वास्तविक सार वस्तु) 

नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥

(बड़=का भाव है की संसय समान्य नहीं है क्योकि यह अपने आप समझने समझाने से नहीं जाता) यदि संसय समान्य होता तो अपने ही समझने समझाने से चला जाता नहीं तो अन्य ऋषि विवेकी के समझाने से चला जाता अतः आप जैसे परम विवेकी से ही संसय जा सकता है।

नाना भाँति मनहि समझावा।प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥

भय लाजा=परम महर्षि बाल्मीक के शिष्य होने के बाद भी भरद्वाज को  बोध नहीं हुआ, जब सूर्य से यग्वालिक जी को विद्या प्राप्त हुई तब विद्यार्थी इनसे बड़े उग्र प्रश्न करने लगे ये बात जब सूर्य को बताई तब सूर्य भगवान ने यह वरदान दिया की जब कोई तुमसे उग्र प्रश्न करेगा तब उसका सिर फट जायेगा) मुनि को कोई संसय नहीं था ये तो जगत को बोध करने के लिए संसय हुआ लाला भगवानदास जी कहते है की भारतद्वाज जी को संदेह नहीं था। जब तक आप अपना अज्ञान, दीनता, भय, संसय प्रकट ना करो तब तक कोई ऋषि पूरे तत्व का मर्म नहीं बताता इस विचार से केवल और केवल सत्संग के लिए भारतद्वाज जी ने ऐसा कहा भक्ति तत्व इतना  (सूक्ष्म=छोटा) है। की इन सिद्धांतों को बराबर पूछते कहते सुनते रहना चाहिए यदि एक ही बार वेद शास्त्र पड़ कर समझ लेने से काम चलता तो शिव जी आदि संत क्यों उसकी चर्चा करते और क्यों सत्संग के लिए ऋषियों के यहाँ बार बार जाया करते? और फिर शंकर ने भी राम से यही माँगा! (श्रीरंग= विष्णु,लक्ष्मीपति) (अनपायनी= विश्लेषरहित, स्थिर,दृढ़,इसका अर्थ होता है कि उसमें अपाय न हो।अपाय माने नाश) 

बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥

(सूत्र) राम तत्व का परम का ज्ञाता होने पर भी अभिमान ना करें गुरु से सदैव जिज्ञासा करते रहे।यही भक्ति शंकर ने हनुमान रूप में पुनः राम से मांगी।

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥

उपासना में जहाँ परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण नहीं है, वह भक्ति “व्यभिचारिणी” है। भूख लगी तो भोजन प्रिय हो गया, प्यास लगी तो पानी प्रिय हो गया, जहाँ जिस चीज की आवश्यकता है वह प्रिय हो गयी, ध्यान करने बैठे तो परमात्मा प्रिय हो गया, यह भक्ति “व्यभिचारिणी” है। जब तक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य विषयों में भी आकर्षण है, तब तक जो भी भक्ति की वह “व्यभिचारिणी” है। संसार में प्रायः जो भक्ति हम देखते हैं, वह “व्यभिचारिणी” ही है। जब सर्वत्र सर्वदा सब में परमात्मा के ही दर्शन हों वह भक्ति “अव्यभिचारिणी” है। भूख लगे तो अन्न में भी परमात्मा के दर्शन हों, प्यास लगे तो जल में भी परमात्मा के दर्शन हों, जब पूरी चेतना ही नाम-रूप से परे ब्रह्ममय हो जाए तब हुई भक्ति “अव्यभिचारिणी” है। वहाँ कोई राग-द्वेष और अभिमान नहीं रहता है। वहाँ सिर्फ और सिर्फ भगवान ही होते हैं। जिनमें “अव्यभिचारिणी” भक्ति का प्राकट्य हो गया है, वे इस पृथ्वी पर प्रत्यक्ष देवी देवता हैं। यह पृथ्वी उनको पाकर सनाथ हो जाती है। जहाँ उनके पैर पड़ते हैं वह भूमि पवित्र हो जाती है। वह कुल और परिवार भी धन्य हो जाता है जहाँ उनका जन्म हुआ है। (व्यभिचारिणी= दुराचार करनेवाली स्त्री अस्थिर बुद्धि, बुद्धि जो स्थिर न रहे)
भरद्वाज जी ने कहा-हे नाथ!संत लोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरु के साथ छिपाव करने से हृदय में निर्मल ज्ञान नहीं होता।मेरे इस मत से तो वेद पुराण, संत, मुनि तीनों ही सहमत है।

संत कहहिं असि नीति, प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
होइ न बिमल बिबेक उर, गुर सन किएँ दुराव॥

गुरु के बिना जो ज्ञान होता वह निर्मल नहीं होता जैसे सती जी ने जगत गुरु शिव जी से दुराव करने से सती जी में विमल विवेक नहीं हुआ और परिणाम में सती जी को देह भी छोड़नी पड़ी।   

सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥

सती जी जब पार्वती बनी तब कहा भी है।

तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना॥

(सूत्र) रामजी का स्वरूप भली प्रकार समझ पड़ना ही निर्मल ज्ञान है और यह सदगुरु की कृपा करुणा से ही सम्भव है,अन्यथा नहीं (संजम= संयम) (बिमल विवेक= शुद्ध निर्मल ज्ञान) 

तुलसीदास हरि गुरु करुना बिनु, बिमल विबेक न होई।
बिन विबेक संसार घोर निधि, पार न पावै कोई ।।

सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई।।

नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।।

पर महराज आज तो समाज में स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञान के सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर बहुत थोड़े लाभ के लिए ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते है ऐसा मनमुखी ज्ञान मलिन होता है।

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।
कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात॥

रामजी अपने आचरण से हम सभी को तो यही उपदेश दे रहे है पुष्पवाटिका में सीताजी से मिलन के बाद हृदय में सीता के सौंदर्य की सराहना करते हुए दोनों भाई गुरु के पास गए। राम ने विश्वामित्र से सब कुछ कह दिया, क्योंकि उनका सरल स्वभाव है, छल तो उसे छूता भी नहीं है। 

राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं॥

नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥

रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥

रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। संतो का मत बिना पूछे राम तत्व नहीं कहना चाहिए! ऐसा सत्संग व्यर्थ है। (सूत्र) बिना पूछे सलाह देना भी व्यर्थ ही है कृपानिधि मोही॥ का भाव कि ऐसा प्रश्न करने पर क्रोध की संभावना है कि कही आप क्रोधित ना हो जाय जैसे शंकर जी सती पर हुए! 

एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥

परन्तु रामजी के चरित्र को देख कर मुझे मोह  क्यों हो गया?  भरद्वाज बोले मुझे तो रामजी में एक नहीं तीन तीन दोष दिख रहे है! 1 काम- मुझे रामजी में काम भी दिख रहा है तभी तो नारी का वियोग हुआ 2 क्रोध- राम जी में क्रोध भी दिख रहा है, क्रोध आया तो युद्ध में रावण को मार डाला 3 लोभ- राम जी में लोभ भी दिख रहा है तभी स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ पड़े! मेरा प्रश्न ये कि यदि इनमे तीनो दोष है तो शंकर जी इनका नाम कैसे जपते है?

एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥

भरद्वाज जी ने कहा जब राम जी अवधेस कुमार है और नारी के विरह में रोते फिर रहे तब ब्रह्म कैसे हो सकते है?

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥

ये नारी विरह की पराकाष्ठा है। पर हे नाथ मैने तो सुना है परमात्मा में

कबहूँ जोग,बियोग न ताके।देखा प्रकट बिरह दुख ताके।।

तो शंकर जी इनका नाम जपते कैसे है?

संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥

अतः यही राम है या कोई और?

प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि??।
सत्य धाम सर्वज्ञ तुम्ह, कहहु बिबेक बिचारि?।।

“जाहि जपत त्रिपुरारि” त्रिपुर दैत्य तीनो लोको में एक एक रूप से रहता था। इसको वरदान था कि जब कोई इसके तीनो रूपों को एक साथ ही परास्त करेगा तब यह मारा जायेगा। तीनो लोक में इसके किले थे जिसमे अमृत रहता था शिव जी ने संग्राम बहुत किया पर मारा नहीं पाए तब शिव जी ने राम जी का ध्यान किया तब राम जी ने वत्स रूप से अमृत पी लिया तब शिवजी से त्रिपुर का संहार हुआ। इसी से त्रिपुरारी का विशेषण दिया। अतःत्रिपुर दैत्य को मरने में जिन राम का सहयोग लिया क्या वे ही राम है या यही अवधेश कुमार राम है या कोई और है। जो त्रिपुर को जीतने वाले है और काम क्रोध जिनके वश में है, तो भला शंकर ऐसे कामी क्रोधी लोभी को क्यों भजने लगे? (सूत्र) केवल और केवल भारी समर्थ सेवको के द्वारा ही (स्वामी प्रभु) का ईश्वरत्व प्रकट होता हैअन्यथा नहीं।

हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥

“कि अपर कोउ’ का भाव कि शिवजी के इष्ट देव का चरित्र अज्ञानता का नहीं हो सकता अतः मेरी समझ में तो उनके राम तो कोई और ही है! भरतद्वाज जैसे मुनियो को सगुन चरित्र देख कर ही मोह हुआ! 

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोई।
सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होई॥

निर्गुण रूप अत्यंत सुलभ (सहज ही समझ में आ जाने वाला) है, परंतु (गुणातीत दिव्य) सगुण रूप को कोई नहीं जानता, इसलिए उन सगुण भगवान के अनेक प्रकार के सुगम और अगम चरित्रों को सुनकर मुनियों के भी मन को भ्रम हो जाता है।
भरद्वाज जी ने कहा हे नाथ! 

जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥

जैसें मिटै मोर भ्रम भारी।भारतद्वाज जी ने अपने में मोह, भ्रम, और संसय तीनो कहे है जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। (यहाँ) इसी प्रकार पार्वतीजी, गरुणजी, और गोस्वामीजी,  इन तीनो ने अपने अपने में इन तीनो (मोह, भ्रम, और संसय) का होना बताया है। पार्वतीजी, गरुणजी, तुलसीदासजी हे नाथ! मुझे नादान समझकर मन में क्रोध न लाइए जिस तरह मेरा मोह दूर हो, वही कीजिए। (जनि= मत,नहीं) (बिदित= जाना हुआ, जिसे जाना-समझा जा चुका हो, अवगत, ज्ञात,मालूम)

ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।।
अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू।।

पार्वती जी कहा हे नाथ! अब भी मेरे मन में कुछ संदेह है। आप कृपा कीजिए, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ।

अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें।।

शंकर जी का उत्तर

तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हिहु प्रस्न जगत् हित लागी॥

हे पार्वती! मेरे विचार में तो राम की कृपा से तुम्हारे मन में स्वप्न में भी शोक, मोह, संदेह और भ्रम कुछ भी नहीं है। (तव= तुम्हारा,तुम्हारे)

राम कृपा तें पारबति, सपनेहुँ तव मन माहिं।
सोक मोह संदेह भ्रम मम, बिचार कछु नाहिं॥ 

गरुण जी हे काकभुशुण्डि जी- यदि मुझे अत्यंत मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता? मैं अब उस भ्रम (संदेह) को अपने लिए हित करके समझता हूँ। कृपानिधान ने मुझ पर यह बड़ा अनुग्रह किया।

देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी॥
सोई भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना॥
जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही॥

काकभसुंडजी हे- नाथ! आप सब प्रकार से मेरे पूज्य हैं और श्री रघुनाथजी के कृपापात्र हैं। (मिस= बहाना,ढोंग, बहाने से)

सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे।।
तुम्हहि न संसय मोह न माया।मो पर नाथ कीन्हि तुम्ह दाया॥
पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही॥

तुलसीदास जी को संसय -रामकुमार जी का भाव यहाँ कोई श्रोता नहीं है अतः “निज” शब्द बडे महत्व का है। ‘निज’ का अर्थ है.“अपना” जो गोस्वामी जी में भी लग सकता है एवं अन्य लोगों मे भी जो भी इसे सुने। ‘मेरे अपने! तथा “उनके अपने।? इसी भाव से ‘मम’ शब्द न देकर निज! शब्द का प्रयोग किया है। जैसा कुछ मुझ में बुद्धि और विवेक का बल है, मैं हृदय में हरि की प्रेरणा से उसी के अनुसार कहूँगा। मैं अपने संदेह,अज्ञान और भ्रम को हरनेवाली कथा रचता हूँ, जो संसाररूपी नदी के पार करने के लिए नाव है। “कहहु सो कथा” भाव कि  रामकथा कहकर ही संशय, मोह और भ्रम दूर कीजिये,अन्य उपायो से नहीं।

निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी।।

जागबलिक ने कहा हे भरद्वाज जी आपने जगत के कल्याण के लिए प्रश्न किया।आपको कोई संशय नहीं है मुस्कुराने का कारण चतुराई ही है तुमको रघुनाथ जी की प्रभुता विदित है तुम मन, क्रम, वचन, से रामचंद्र जी के भगत हो राम जी के गूढ़ गुणों को (गुप्त रहस्य) को सुनना चाहते हो इसी से ऐसे प्रश्न किये है जैसे मानो अत्यंत मूर्ख हो। (मूढ़ा=मूर्ख) (गूढ़ा=छिपा हुआ,गुप्त रहस्य) (सूत्र) ऐसेइ=ऐसे ही दूसरा भाव इसी प्रकार से  कहने का भाव पार्वती और भाद्वाज दोनों के संसय को एक तरह का ही बताया! मुस्कुराने का कारण “चतुराई”  है।

जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई।।
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारि मैं जानी॥

चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा।।

जागबलिक जी ही नहीं हॅसे स्वयं रामजी भी सुतीछन मुनि कि इसी तरह की चतुराई पर हॅसे। 

देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसे द्वौ भाई॥

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