मानस चिंतन,जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥

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मानस चिंतन,जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥

हम सभी कक्षा एक से  केवल और केवल यही  गाते आ रहे है 
जीवन हो शुद्ध सरल अपना,शुचि प्रेम-सुधा रस बरसावें॥
छल, दंभ-द्वेष, पाखंड-झूठ,अन्याय से निशिदिन दूर रहें।


जरा  विचार करे की  क्या हम इस पर चल रहे है ? हम क्या कर रहे है महादेव राम जी के बारे में सब जानते है। लेकिन पार्वती जी अनभिज्ञ है, वो उनकी परीक्षा लेती है भगवान राम के सरल व सहज स्वभाव के  समक्ष अपनी भूल का अहसास होता है। (सहज= सुगम) (वृषकेतु=महादेव)

जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥

कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥

(सूत्र) अपना परिचय देना हो या प्रश्न करना हो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी की शैली बड़ी अद्भुत है। यद्यपि उन्होंने सीता जी के वेष में आईं सती जी को पहचानकर अपनी सर्वज्ञता स्पष्ट कर दी है। लेकिन अपना परिचय देने में सांसारिक मर्यादा का पालन करना नहीं भूलते हैं.पहले प्रभु ने हाथ जोड़कर सती को प्रणाम किया और पिता सहित अपना नाम बताया। फिर कहा कि वृषकेतु शिवजी कहाँ हैं? आप यहाँ वन में अकेली किसलिए फिर रही हैं? पुनःश्रीराम जी इसी तरह हनुमान जी से मिलने पर बोले 

कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए॥
आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥

श्री रामजी ने कहा- हम कोसलराज दशरथजी के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन आए हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। (वन में) राक्षस ने (मेरी पत्नी) जानकी को हर लिया। हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए 

जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥
कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए॥

आपन चरित कहा हम गाई।
संत कहते है की जिसकी पत्नी का हरण हो गया हो इस अवस्था मै श्री रामचंद्रजी कितना सहज (सरल)भाव से अपनी घटना को गा कर सती को और हनुमान जी को बता रहे है। ऐसी सहजता धीरज केवल और केवल  परमात्मा ही कर सकता है

निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि कपट छल छिद्र न भावा

मुझे कपट, छल, निन्दयी नहीं बल्कि निर्मल और शुद्ध हृदय वाले लोग भाते हैं। (सूत्र) इसलिये निर्मल ह्रदय से प्रभु को भजिये और सबको प्यार करिये किसी से द्वेष मत रखिये।

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥
काम आदि मद दंभ न जाके।तात निरंतर बस में ताके॥

सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥

वन गमन के पिता के आदेश की पूरी कथा बताकर वे वाल्मीकि से सहज ही पूछ बैठते हैं, मुनिवर वह जगह बताइये जहां मैं सीता और लक्ष्मण के साथ कुछ समय व्यतीत कर सकूं। वाल्मीकि सुन कर मुस्करा पड़ते हैं। सकल ब्रह्माण्ड का स्वामी, सर्वव्यापी का यह मासूम प्रश्न वाल्मीकि को मानो निःशब्द कर देता है, अब वे क्या उत्तर दें?  कौन सी जगह उन्हें बता दी जाये जहां वे न रहते हों  बहुत दुविधाजनक जनक सवाल है। राम तो कण कण में व्याप्त हैं  कोई जगह उनसे अछूती रह गयी हो तो  बताई जाये। वाल्मीकि साधु साधु कह पड़ते हैं 

शूर्पणखा एवं रावण दोनों ही बहन भाई है दोनों का मिशन अच्छा था। परन्तु सफल नहीं हो सके दोनों ही एक ही तरह की गलती कर बैठे  रावण सीता (भक्ति) को पाना चाहता है परन्तु भगवान की उपेक्षा कर। शूर्पणखा राम (भगवान) को पाना चाहती है पर सीता (भक्ति) को छोड़ कर जबकि बिना भक्ति के भगवान की प्राप्ति  हो ही नहीं  सकती। दोनों ने दंभ ही  किया था रावण साधु रूप धारण कर गया शूर्पणखा रूचिर रूप धरा कर गई थी।  एक का सिर काटा गया एक की नाक काटी गई। (दंभ=धोका, फ़रेब,घमंड, अहंकार, अभिमान)

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥

ईश्वर परमसत्ता (श्री राम) का सहज स्वभाव है कि वे अपने भक्त में अभिमान कभी नहीं रहने देते, भगवान अभिमान को दूर करते हैं, पर मनुष्य फिर अभिमान कर लेता हैअभिमान करते-करते उम्र बीत जाती है इसलिये हरदम ‘हे नाथ! हे मेरे नाथ!’ पुकारते रहो और भीतर से इस बात का खयाल रखो कि जो कुछ विशेषता आयी है, भगवत कृपा  से आयी है। यह अपने घर की नहीं है। ऐसा नहीं मानोगे तो बड़ी दुर्दशा होगी क्योंकि अभिमान जन्म-मरण रूपी संसार का मूल है और अनेक प्रकार के क्लेशों तथा समस्त दुखों का मूल है। (सूत्र) केवल और केवल अभिमान व्यक्ति को (गर्त=नर्क)  में पहुंच देता है

सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥

मेरा मन जो स्वभाव से ही वैराग्य रूप (बना हुआ) है, (इन्हें देखकर) इस तरह मुग्ध हो रहा है, जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोर। हे प्रभो! इसलिए मैं आपसे सत्य (निश्छल) भाव से पूछता हूँ। हे नाथ! बताइए, छिपाव न कीजिए। वन में रहने वाले कोल-भील भी भगवान के  विग्रहको देखकर मुग्ध हो जाते हैं

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।

रामचरितमानस में श्री राम ने जीवन में सफल होने की कई बाते बताई है। इसी में उन्होंने बताया कि हमें किस तरह के इंसान से किस तरह की बातें  करनी चाहिए। जिससे कि हम हमेशा सफल रहें। 

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।

(सूत्र) मूर्ख से प्रार्थना, बेईमान व्यक्ति से प्यार से बात, कंजूस से दान की बात  कभी भी न करें

सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी॥

समस्त जगत के स्वामी श्री रामजी सुंदर मतवाले श्रेष्ठ हाथी की सी चाल से स्वाभाविक ही चले। श्री रामचन्द्रजी के चलते ही नगर भर के सब स्त्री-पुरुष सुखी हो गए और उनके शरीर रोमांच से भर गए

सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा।।
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ।।

सीता स्वयंवर में जब सब राजा एक-एक करके धनुष उठाने का प्रयत्न कर रहे थे, तब श्रीराम संयम से बैठे ही रहे। जब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा हुई तभी वे खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके धनुष उठाया। गुरुदेव के आदर और सत्कार में श्रीराम कितने विवेकी और सचेत थे इसका उदाहरण तब देखने को मिलता है, जब उनको राज्योचित शिक्षण देने के लिए उनके गुरु वसिष्ठजी महाराज महल में आते हैं। सदगुरु के आगमन का समाचार मिलते ही श्रीराम सीता जी सहित दरवाजे पर आकर गुरुदेव का सम्मान करते हैं

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥
मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥

भरत जी कहते है मै अपने स्वामी का स्वभाव मैं जानता हूँ। वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझ पर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेल में भी कभी उनकी रीस (अप्रसन्नता) नहीं देखी। बचपन में ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मन को कभी नहीं तोड़ा (मेरे मन के प्रतिकूल कोई काम नहीं किया)। मैंने प्रभु की कृपा की रीति को हृदय में भलीभाँति देखा है (अनुभव किया है)। मेरे हारने पर भी खेल में प्रभु मुझे जिता देते रहे हैं

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥

रामचन्द्रजीने कहा पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता। यदि वह (रावण का भाई) निश्चय ही दुष्ट हृदय का होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?

जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥

रामचन्द्रजीने कहा जिसकी अलौकिक सुंदरता देखकर स्वभाव से ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। वह सब कारण (अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें,किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मंगलदायक (दाहिने) अंग फड़क रहे हैं 

रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥

रघुवंशियों का यह सहज (जन्मगत) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्ग पर पैर नहीं रखता। मुझे तो अपने मन का अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने (जाग्रत की कौन कहे) स्वप्न में भी पराई स्त्री पर दृष्टि नहीं डाली है 

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