मानस चिंतन,जब तें रामु ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाए ॥

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मानस चिंतन,जब तें रामु ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाए ॥

परम पूज्य संत श्री डोंगरे जी महाराज कहा करते थे जिन परिवारों मे अयोध्या काण्ड के मंगलाचरण की यह आठ चौपाईयाँ प्रतिदिन गाई, सुनी और आचरण में लाई जाती हैं उन घरों से दरिद्रता दूर भाग जाती है और सुख, समृद्धि, शांति का आगमन होता है। 


जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।

भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।।

रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।।
मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।।

कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।।
सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।।

मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।।
राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।

श्री गुरुजी के चरण कमलों की रज से अपने मन रूपी दर्पण को साफ करके मैं श्री रघुनाथजी के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फलों को (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को) देने वाला है।

श्री गुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसजो दायकु फल चारि ॥

जब से श्री रामचन्द्रजी विवाह करके घर आए, तब से (अयोध्या में) नित्य नए मंगल हो रहे हैं और आनंद के बधावे बज रहे हैं। 

जब तें रामु ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाए ॥

आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥
प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥

जब से राम विवाह करके घर आए, तब से सब प्रकार का आनंद अयोध्या नगरी में आ गया । प्रभु के विवाह में जैसा आनंद उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और सर्पों के राजा  शेष जी भी नहीं कह सकते। (मंगल =शुभ, अच्छा) (मोद= मानसिक आनंद)  (बधाए= बधाई=उत्सव,खुशी) (गिरा= सरस्वती, शारदा, वाणी) (अहिनाहू=सर्पों के राजा शेष जी) (उछाह= उत्साह,हर्ष) 

भुवन चारिदस भूधर भारी ।सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी ॥

पहाड़ों पर सदा पानी बरसाता रहता है इसलिए चौदहों भुवन को पहाड़ों से उपमा दी।चौदहों लोक रूपी बड़े भारी पर्वतों पर पुण्य रूपी मेघ सुख रूपी जल बरसा रहे है अधिक बरसात के कारण नदी में बाढ़ आ गयी। जैसे समुद्र  का जल अप्रकट रीति से मेघ बन  कर सर्वत्र बरसता है और सभी को तृप्त करता हुआ पुनः नदियों के माध्यम से समुद्र में आ जाता है  वैसे दशरथ जी के सुकृत से सभी लोकों में सुख हुआ और अयोध्या में भी आया क्योकि-  

सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं॥

रामजी के विवाह का आनंद उत्सव अयोध्या के साथ साथ चौदह भुवनों अर्थात चौदह लोकों में हो रहा है। (भुवन=लोक)  (चारिदस= चौदह) (सुकृत=पुण्य) (उछाह= उत्साह,हर्ष) क्योकि 

भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू॥
रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई । उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई ॥

अयोध्या इन्द्र की अमरावती से भी बढ़कर थी, अयोध्या  का वैभव कवि से कहते नहीं बनता और देवताओं से देखते नहीं बनता। ऋद्धि-सिद्धि और सम्पत्ति रूपी सुहावनी नदियाँ रामजी  के आने पर ही अयोध्या रूपी समुद्र में मिल रही थी। जहाँ पर रामजी है वही पर छीर सागर होता है बाबा तुलसी ने अवध को समुद्र एवं रिधि सिधि संपति को गंगा यमुना सरस्वती कहा  (अंबुधि=समुद्र, सागर) (रिधि सिधि= समृद्धि और सफलता) (उमगि=उमड़कर,उत्साह,उल्लास)

जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए॥ 

पर राम जानकी विवाह से चौदह भुवनों में आनंद की वर्षा हो रही है  

जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।। 
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।

और अधिक वर्षा के कारण नदियों में बाढ़ आ गई और वे बड़े वेग से अयोध्या रुपी समुद्र में आ गई है जबकि  समुद्र में तो अगाध जल है सागर को कभी जल की कमी नहीं है। और वह चाहता भी नहीं पर नदियों के पास समुद्र के अलावा अन्य कोई रास्ता भी नहीं होता।  वैसे ही  श्रीचक्रवर्ती जी को प्रजा से धन-संचय की कामना नहीं है तो भी  प्रजा प्रयोजन भर धन रखकर अतिरिक्त धन स्वयं राजा के यहाँ  पहुँचाती है।

मनिगन पुर नर नारि सुजाती । सुचि अमोल सुंदर सब भाँती ॥

समुद्र में दूषितऔर अमूल्य रत्न दोनों ही  होते है,  क्योंकि समुद्र  प्रकृति द्वारा उत्पन्न  है पर अयोध्या तो दिव्य है अयोध्या के नर नारी सभी उत्तम आचरण वाले है जो सब प्रकार से पवित्र, अमूल्य और सुंदर हैं। 

कहि न जाइ कछु नगर बिभूती । जनु एतनिअ बिरंचि करतूती ॥

नगर का ऐश्वर्य कुछ कहा नहीं जाता। ऐसा जान पड़ता है, मानो ब्रह्माजी की कारीगरी बस इतनी ही है। सब अयोध्या वासी श्री रामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को देखकर सब प्रकार से सुखी है। (सुजाती=उत्तम आचरण वाले ,पुण्यात्मा) (सुचि=शुचि=पवित्र )

सब बिधि सब पुर लोग सुखारी । रामचंद मुख चंदु निहारी ॥
मुदित मातु सब सखीं सहेली । फलित बिलोकि मनोरथ बेली ॥

सब माताएँ और सखी-सहेलियाँ अपनी मनोकामना  रूपी लता  को फली  फूलती  हुई देखकर आनंदित हैं। 

राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ । प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ ॥

श्री रामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को देख-सुनकर राजा दशरथजी बहुत ही आनंदित होते है।
परिवार चाहे छोटा हो या बड़ा हो चाहे धनड्य या दरिद्र हो छोटी बड़ी समस्या हर घर में होती है बहुत से संतो ने समस्या निवारण में इन चौपाई के पाठ का विशेष योगदान बताया है (सूत्र) मंत्र जप करने में दो बातों का विशेष ध्यान रखना जरूरी है पहला  शुद्ध उच्चारण और दूसरी  श्रद्धा भगवान ने स्वयं कहा भी है  

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥ 

यदि इन आठ चौपाइयों के नित्य पाठ करने  के उपरांत भी दरिद्रता दूर नहीं  होती है अथवा सुख, समृद्धि, शांति नहीं मिलती, इसका अर्थ यही है, कि भक्त द्वारा  इसका सिर्फ गायन तो कर रहे हैं परंतु उसे अपने जीवन में उतार नहीं रहे हैं।हम सभी को घर अयोध्या जैसा वातावरण तो चाहिए, परंतु अयोध्या बनाने का सोच नहीं रहे है। हम सभी को घर में पुत्र राम तो चाहिए परंतु कोई कौशल्याऔर दशरथ बनना नहीं चाहता। किसी भी सिद्ध मंत्र से फल न प्राप्त होने का मूल कारण यही है कि हम मंत्र की मूल भावना को चरितार्थ नहीं कर रहे हैं अपितु सिर्फ उसका बिना मन से अनुसरण कर रहे हैं।

बाल्मीक के जाप से ये निकला परिणाम। 
श्रद्धा होनी चाहिए मारा कहो या राम ।।

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